नई दिल्ली: रावण को लेकर देश के हर कोने में अलग-अलग तरह की मान्यताएं है. कहीं पर रावण की पूजा की जाती है तो कहीं पर रावण का वध. लेकिन आज हम आपको ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं जिस गांव के लोग रावण को अपना दामाद मानते है. इन सब में सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि यहां भी विजयदशमी के दिन रावण की पूजा की जाती है लेकिन दहन नहीं किया जाता बल्कि रावण का वध कुछ अलग अंदाज में किया जाता है. कुछ शहर ऐसे भी हैं जहां रावण के पुतले को या तो अगले दिन जलाया जाता है या जलाने के बजाए उसका वध किया जाता है. ऐसे ही दो शहर एमपी के भी हैं. जहां रावण की पूजा होती है. ये हैं मंदसौर और विदिशा के पास रावणग्राम. यहां रावण वध या दहन को लेकर कई मान्यताएं हैं.
 
मंदसौर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में इसका नाम मन्दोत्तरी हुआ करता था. ऐसी मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी मंदसौर की थी, इसी लिहाज से मंदसौर रावण का ससुराल है. मंदसौर में नामदेव समाज की महिलाएं आज भी रावण की मूर्ति के सामने घूंघट करती हैं और रावण के पैरों पर लच्छा (धागा) बांधती हैं.
 
ऐसा माना जाता है कि धागा बांधने से बीमारियां दूर होती हैं. यहां दशहरे के दिन रावण की पूजा की जाती है. हर साल दशहरे पर रावण के पूजन का आयोजन मंदसौर के नामदेव समाज द्वारा किया जाता है.
 
 
हर साल दशहरे पर नामदेव समाज दशपुर नगरी के दामाद रावण की पूजन करती हैं. सुबह पूजा के बाद शाम को ये रावण का प्रतीकात्मक वध करते हैं. मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के कारण रावण की प्राचीन प्रतिमा टूट गई थी जिसकी 2003 में स्थानीय प्रशासन ने मरम्मत की थी.
 
ऐसे होता है दामाद का वध
 
दशहरे के दिन सब लोग खानपुरा के एक मंदिर में इकट्ठे होते हैं.
मंदिर से रामजी की सेना के रूप में लोग रावण प्रतिमा स्थल पर पहुंचते हैं. प्रतिमा का पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. 
 
 
इसके बाद समाज के लोग रावण से प्रार्थना करते हैं कि आप हमारे दामाद हैं लेकिन आपने सीता हरण का अपराध किया इसलिए राम सेना आपका वध करने आई है. कृपया इसकी अनुमति दें. 
 
गोधुली बेला होते ही प्रतिमा स्थल पर कुछ देर के लिए अंधेरा कर दिया जाता है. इसके बाद रोशनी कर रावण के वध की घोषणा की जाती है और फिर रामजी की जीत का जश्न मनाते हुए लोग अपने घर लौट जाते हैं.

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