नई दिल्ली : अगर जन्म पत्रिका में काल सर्प का योग है और कुष्ठ रोग से परेशान हैं तो सेम नागराज मंदिर मे इसका समाधान है. उत्तराखंड के टिहरी में उत्तरकाशी सीमा पर है सेम नागराज मंदिर. 
 
यहां पर श्री कृष्ण की नागराज मे रूप में पूजा होती है. यहां के पुजारी का दावा है कि यहां के जल से स्नान करने से कुष्ठ रोग दूर होता है. उत्तराखंड मे पांचवा धाम माना जाता है सेम नागरज मंदिर.
 
आज के वैज्ञानिक दौर मे अगर कहें कि चर्म रोग जैसे असाध्य कुष्ठ रोग का निवारण उत्तराखंड के इस मंदिर मे होता है तो आपको हैरानी होगी. लेकिन, यहां के लोगों को ऐसा ही मानना है. 
आखिर ऐसा क्यों है और इसकी कहानी क्या है ये नीचे बता रहे हें. 
 
क्या है पूरी कहानी
पुराणों में जिक्र आता है कि द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका छोड़ कर उत्तराखंड के रमोलागढ़ी मे आकर यहां मंदिर मे मूर्ति रूप मे स्थापित हो गए थे और ऐसा उन्हें कालिया नाग को दर्शन देने कि अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए करना पड़ा था.
 
द्वापर में श्रीकृष्ण उत्तराखंड मे ब्राह्मण के वेश मे पहुंचे थे. उस वक्त यहा रमोल गढ़ के गढ़पति गंगू रमोला का राज था जब ब्रह्मण वेश धारी कृष्ण ने उन्हें मंदिर के लिए स्थान मांगा तो गंगू ने साफ इंकार कर दिया था. ब्रह्मण वेश धारी कृष्ण नाराज होकर पौड़ी चले गए लेकिन उनके प्रकोप से गंगू की सभी दुधारू पशु बीमार हो गए और इलाके मे अकाल पड़ गया. तब गंगू की पत्नी इसे भगवान ब्रह्मण वेश धारी कृष्ण का श्राप बताकर उनकी आराधन करने की सलाह देती है. 
 
 
इसके बाद गंगू रमोला श्री कृष्ण को प्रसन्न करने में सफल हो जाता है. उसे वरदान मिला था कि उत्तराखंड के रमोलीगढ़ मे जहां श्री कृष्ण की नाग के रूप मे पॅजा होती है वहा। नागराज श्री कृष्ण की पूजा करने वालों की पॅजा तभी पूरी मानी जाएगी जब वे गंगू रमोला की भी पूजा करेंगे. तब से यही परंपरा आज भी कायम है.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

देश और दुनिया की ताजातरीन खबरों के लिए हमे फॉलो करें फेसबुक,गूगल प्लस, ट्विटर पर और डाउनलोड करें Inkhabar Android Hindi News App