नई दिल्ली : आज माघ पूर्णिमा और संत रविदास जयंती है. जूते बनाने का काम करने वाले रविदास जी ने समाज को जो आईना दिखा गए वह शायद ही कोई कर पाएगा. 
 
संत रविदास से जुड़ी बहुत कहानियां भी हैं जो मौके-मौके पर समाज को एक सीख देती हैं. उन्हीं में से एक मन चंगा तो कठौती में गंगा वाली कहानी भी है. कभी रविदास से कोसों दूर रहने वाले ब्राह्मण आज उसी रास्ते से प्रेम के साथ गुजरते हैं जिस रास्ते पर कभी रविदास जी बैठकर जूता बनाते थे.
 
 
एक समय की बात है कि रविदास से एक ब्राह्मण ने गंगा स्नान के लिए कहा तब रविदास ने कहा कि उनके पास समय नहीं है इसलिए वे गंगा नहाने नहीं जा सकते हैं.
 
हालांकि रविदास ने ब्राह्मण से एक गुजारिश की और कहा, ‘पंण्डित जी आप गंगा स्नान के लिए जा रहे हैं तो मेरा एक काम कर दीजिए. ये सुपारी लेते जाइए और गंगा जी को दे दीजिएगा.’
 
 
पहले तो ये बात पण्डित के लिए किसी मजाक से कम नहीं थी लेकिन पण्डित जी ने स्नान करने के बाद जैसे ही गंगा में सुपारी डालते हुए कहा कि गंगा मैया ये सुपारी रविदास ने आपके लिए भेजी है.
 
यह सुनते ही गंगा जी ब्राह्मण के सामने प्रगट हुई और एक कंगन देकर कहा कि यह रविदास को दे दीजिएगा. पण्डित जी का मन कंगन को देखकर विचलित हो गया और उन्होंने कंगन अपने पास रख लिया और कुछ दिन बाद अपने राज्य की रानी को कंगन भेंट कर दिया.
 
 
कंगन देखकर रानी का भी मन विचलित हो गया और उन्होंने पण्डित से और कंगन की मांग कर डाली. उसके बाद घबराए हुए पण्डित जी रविदास के पास पहुंचे और अपनी व्यथा बताई.
 
उसके बाद रविदास ने अपनी कठौती में जल भर कर मां गंगा का आवाहन किया. उसके बाद गंगा मैया प्रगट हुईं और विनती करने पर दूसरा कंगन भी भेंट किया. तभी से यह कहावत प्रचलित हुई कि मन चंगा तो कठौती में गंगा.

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