Mata Sita Brother Name: सीता हरण के बाद उन्हें रावण द्वारा तमाम तरह की यातनाएं झेलनी पड़ीं. रावण ने कई उन्हें छूने की कोशिश की. बावजूद इसके उनकी जुवां पर सिर्फ भगवान श्रीराम का ही नाम था. उनमें किसी भी चीज का डर नहीं था. लंका में माता सीता के निर्भय रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण था उनका अटूट विश्वास और धर्म की शक्ति. वैसे तो रावण किसी स्त्री को उसकी मर्जी के बिना छू नहीं सकता था. क्योंकि, रावण को नलकुबेर से एक श्राप मिला था, कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसका विनाश हो जाएगा. इसके बाद भी रावण सीता को तरह से छूने की कोशिश कर रहा था.
कहा जाता है कि लंका में रावण जब भी सीता के करीब आने का प्रयास करता था तो सीता माता अपने भाई की ओट लेते हुए उसे मुंहतोड़ जवाब देती थीं. ऐसे लोग जानना चाहते हैं कि, आखिर वो कौन था, जिसके दम पर माता सीता रावण से कभी नहीं डरीं? हमेशा रावण को मुंहतोड़ जवाब दिया. इस बारे में प्रख्यात कवि कुमार विश्वास ने एक भाई का जिक्र किया है. आइए जानते हैं क्या कहते कवि कुमार विश्वास-
लंका में सीताजी ने किसको बताया भाई
एक वीडियो में कवि कुमार विश्वास बहन और भाई का सुंदर प्रसंग बताते हैं. वे कहते हैं एक बहन सूपर्णखा है जिसे बदला पूरा होने की फिक्र है, फिर भाई का नाश ही क्यों न हो जाए. उसी वजह से रावण को सीता माता का हरण करना पड़ा था. वहीं, दूसरी तरफ माता सीता हैं जिन्होंने एक छोटे से तिनके को अपना भाई माना. कुमार कहते हैं कि, सीता हरण के बाद जब रावण उनके पास जाता है और कहता है कि मेरा प्रणय (प्रेम) प्रस्ताव स्वीकार कर लो. क्योंकि, उस राम में क्या रखा है वो तो जंगली है उसे मैं मार दूंगा. इसके बाद भी जब माता सीता नहीं मानीं तो वह कहता कि मैं तुझे बल पूर्वक उठा लूंगा. इसपर माता सीता जिस चटाई पर बैठी थीं उसी से एक तिनका तोड़ा और कहा अरे मू्र्ख पहले इस तिनका (भाई) को पार करके तो दिखा.
गौरतलब हो कि, माता सीता भूमि से पैदा हैं इसलिए उनका नाम भूमिजा है. तिनका भी भूमि से पैदा है. ऐसे वह सीता माता का भाई हुआ. कहा भी गया है कि ‘तृण धरि ओट कहति वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही’. इस तरह से माता सीता ने तिनके को अपने भाई बताया.
मंगल देव को भी बताया गया माता सीता का भाई
धार्मिक कथाओं के मुताबिक, माता सीता के विवाह के समय सभी वरिष्ठ लोग मौजूद थे. देवलोक से देवता भी आशीर्वाद देने पहुंचे थे. वैदिक मंत्रों का जप के साथ विवाह की परंपराएं चल रहा थीं. फिर पुरोहित ने रस्में करने के लिए माता सीता के भाई को बुलावा दिया. अब सब सोचने लगे कि भाई के रूप में कौन खड़ा होगा.
इस विलंब को देखकर माता पृथ्वी भी दुखी हो गईं. तब मंगलदेव समारोह के बीच खड़े होकर बोले कि, यह रस्म मुझे निभाने दें. असल में वह थे जो वेश बदलकर आए थे. बता दें कि, पृथ्वी से माता सीता का जन्म हुआ और मंगल देव भी पृथ्वी के ही पुत्र थे. ऐसे में मंगल देव माता सीता के भाई हुए. वहीं, दूसरी कथा में राजा जनक के छोटे भाई के एक पुत्र लक्ष्मीनिधि को भी माता सीता का भाई बताया गया.