Prayagraj Shaktipeeth Alopi Devi Temple: आपने देवी के ऐसे मंदिर तो जरूर देखे होंगे, जहां माता की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित होती है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे शक्तिपीठ के बारे में सुना है, जहां मूर्ति के बजाय पालने और पवित्र कुंड की पूजा की जाती है? प्रयागराज से जुड़ा आलोक संकरी शक्तिपीठ इसी अनोखी परंपरा और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के बीच खास महत्व रखता है. यहां देवी की आराधना का तरीका सामान्य मंदिरों से बिल्कुल अलग बताया जाता है. सबसे ज्यादा चर्चा उस मान्यता की होती है, जिसके अनुसार मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी यहां रखा पालना अपने आप हिलता है. यही वजह है कि इस स्थान को लेकर भक्तों के मन में आस्था के साथ कौतूहल भी बना रहता है. पढ़िए मंदिर से जुड़ी रोचक कथा-
मूर्ति नहीं, पालने की होती है पूजा
प्रयागराज स्थित अलोपी बाग में अलोपी देवी का एक ऐसा मंदिर है, जहां कोई मूर्ति स्थापित नहीं है. इस शक्तिपीठ से जुड़ी मान्यता इसे दूसरे देवी मंदिरों से अलग बनाती है. यहां किसी पारंपरिक प्रतिमा की जगह पालने यानी झूले और पवित्र कुंड को देवी स्वरूप मानकर पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है. श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर यहां पहुंचते हैं और देवी की आराधना करते हैं. खासतौर पर संतान सुख की कामना से आने वाले भक्तों के लिए भी इस स्थान की विशेष मान्यता बताई जाती है. भक्तों का विश्वास है कि मां के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती.
कपाट बंद होने के बाद हिलता है पालना?
इस मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता पालने के अपने आप हिलने की है. कहा जाता है कि, मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी पालने में हलचल देखी जाती है. इसी वजह से श्रद्धालुओं के बीच यह धारणा प्रचलित है कि रात में स्वयं देवी पालने में विराजती हैं. हालांकि, पालने के अपने आप हिलने की इस घटना का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. इसे मुख्य रूप से स्थानीय धार्मिक आस्था और मंदिर से जुड़ी मान्यता के रूप में देखा जाता है.
शक्तिपीठ से जुड़ी है माता सती की कथा
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शक्तिपीठों का संबंध माता सती और भगवान शिव की कथा से माना जाता है. कहा जाता है कि राजा दक्ष के यज्ञ में हुए अपमान के बाद माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे. भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को अलग किया और जहां-जहां उनके अंग या आभूषण गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना मानी गई. प्रयागराज को भी धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. क्योंकि, यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम है.
कैसे पहुंचे यहां
वैसे तो प्रयागराज से सभी वाकिफ है. संगम पर कभी न कभी तो जाना ही हुआ होगा. अलोपीबाग मंदिर जाने के लिए आपको पहले प्रयागराज जाना होगा. ट्रेन से जाने के लिए पहले प्रयागराज जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुंचे. वहां पहुंचकर किसी भी ऑटो की मदद से आप आसानी से अलोपीबाग पहुंच जाएंगे. आप बस से भी प्रयागराज आ सकते हैं और यहां ऑटो करके अलोपीबाग मंदिर पहुंच सकते हैं.