Pitru Paksha 2026 Kutup Kal: पितृ पक्ष में श्राद्ध करते समय आपने अक्सर देखा होगा कि पूजा-पाठ और ब्राह्मण भोज के लिए दोपहर का समय चुना जाता है. आखिर ऐसा क्यों है? क्या इसके पीछे कोई खास धार्मिक मान्यता है? सनातन परंपरा में श्राद्ध कर्म के लिए दिन के एक विशेष काल को महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे कुतुप काल या कुतुप मुहूर्त कहा जाता है. मान्यता है कि इस समय किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व होता है. यही वजह है कि पितरों के निमित्त भोजन कराने से लेकर श्राद्ध के कई प्रमुख कर्म इसी अवधि में करने की परंपरा चली आ रही है. अब सवाल है कि आखिर, क्या है कुतुप मुहूर्त? पितृ पक्ष में इसका इतना महत्व क्यों बताया गया है? इस बारे में बता रहे हैं उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री-
क्या होता है कुतुप काल?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में दिन को अलग-अलग काल और मुहूर्त में बांटा गया है. कुतुप काल दिन के उस विशेष समय को कहा जाता है, जो सामान्य तौर पर दोपहर के आसपास आता है. श्राद्ध कर्म के लिए इसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस समय पितरों के लिए किए गए कर्म उन्हें समर्पित करने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं. श्राद्ध की तिथि पर पहले संकल्प, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं. इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है. कई परंपराओं में भोजन और श्राद्ध कर्म को कुतुप काल के आसपास पूरा करने पर विशेष जोर दिया जाता है.
दोपहर में ही क्यों कराया जाता ब्राह्मण भोज?
धार्मिक मान्यताओं में अपराह्न काल और कुतुप मुहूर्त को पितरों से जुड़े कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है. ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध के दौरान विधि-विधान से किया गया भोजन पितरों को समर्पित होता है और ब्राह्मण को भोजन कराना उसी श्रद्धा और समर्पण का हिस्सा है. यही कारण है कि श्राद्ध में अपनी सुविधा के अनुसार सुबह या रात में भोजन कराने के बजाय संबंधित श्राद्ध तिथि के कुतुप काल और अपराह्न समय को प्राथमिकता देने की परंपरा है.
क्या हर जगह एक ही समय होता है?
कुतुप मुहूर्त का सटीक समय हर स्थान पर एक जैसा नहीं होता. यह सूर्योदय और सूर्यास्त के समय तथा स्थानीय पंचांग के आधार पर बदल सकता है. इसलिए श्राद्ध की तिथि तय करने के साथ स्थानीय पंचांग में दिए गए कुतुप काल और अपराह्न काल को देखना उचित माना जाता है.
कुतुप मुहूर्त का धार्मिक महत्व
‘कुतुप’ शब्द का संबंध शुभ और पवित्र समय से जोड़ा जाता है. श्राद्ध में समय का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि यह कर्म केवल पूजा नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा है. पितृ पक्ष में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज इसी भावना के साथ किए जाते हैं.