Home > धर्म > रहस्यमयी है नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ, जहां गिरा था भगवान विष्णु का दिव्य चक्र, यहां आज भी नहीं पड़ा कलयुग का प्रभाव

रहस्यमयी है नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ, जहां गिरा था भगवान विष्णु का दिव्य चक्र, यहां आज भी नहीं पड़ा कलयुग का प्रभाव

Naimisharanya Tirth: भारत में ऐसे अनेक प्राचीन और रहस्यमयी तीर्थ हैं, जिनका उल्लेख वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है. इन पवित्र स्थलों से जुड़ी मान्यताएं आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का आधार हैं. इन्हीं पवित्र स्थलों में एक है उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ. आइए जानते हैं इससे जुड़ी रोचक जानकारियां-

By: Lalit Kumar | Published: July 9, 2026 2:31:48 PM IST



Naimisharanya Tirth: भारत में ऐसे अनेक प्राचीन और रहस्यमयी तीर्थ हैं, जिनका उल्लेख वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में मिलता है. इन पवित्र स्थलों से जुड़ी मान्यताएं आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का आधार हैं. कहीं, स्वयंभू देवताओं के प्रकट होने की कथा सुनाई जाती है, तो कहीं दिव्य चमत्कारों और ऋषि-मुनियों की तपस्या के प्रसंग प्रसिद्ध हैं. इन्हीं पवित्र स्थलों में एक है उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ. मान्यता है कि यहीं भगवान विष्णु का दिव्य सुदर्शन चक्र धरती पर गिरा था और इसी स्थान पर 88 हजार ऋषि-मुनियों ने एकत्र होकर पुराणों का श्रवण किया. हैरान करने वाली बात यह है कि, यहां आज भी कलयुग का प्रभाव नहीं पड़ा है. यही वजह है कि नैमिषारण्य को सनातन धर्म के सबसे प्राचीन, पवित्र और रहस्यमयी तीर्थों में गिना जाता है. आइए जानते हैं नैमिषारण्य के चक्रतीर्थ से जुड़ी रोचक जानकारियां- 

कैसे पड़ा चक्रतीर्थ नाम?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय ऋषि-मुनियों ने भगवान ब्रह्मा से ऐसी पवित्र भूमि बताने का आग्रह किया, जहां वे कलियुग के प्रभाव से दूर रहकर तपस्या कर सकें. तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का दिव्य चक्र छोड़ा और कहा कि जहां यह चक्र रुक जाएगा, वही स्थान सबसे पवित्र होगा. कहा जाता है कि, यह दिव्य चक्र वर्तमान नैमिषारण्य में आकर धरती में समा गया. जिस स्थान पर चक्र गिरा, वहां जल का कुंड प्रकट हुआ, जिसे आज चक्रतीर्थ के नाम से जाना जाता है.

88 हजार ऋषियों की तपोभूमि

धार्मिक मान्यता है कि, चक्रतीर्थ के आसपास 88 हजार ऋषि-मुनियों ने वर्षों तक यज्ञ, तप और वेदों का अध्ययन किया. इसी स्थान पर सूत जी महाराज ने ऋषियों को महापुराणों का विस्तृत वर्णन सुनाया. इसलिए नैमिषारण्य को ज्ञान, तप और भक्ति का केंद्र माना जाता है.

कभी नहीं सूखता चक्रतीर्थ का जल

स्थानीय मान्यता के अनुसार, चक्रतीर्थ के कुंड का जल वर्षभर बना रहता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां स्नान करने से पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. अमावस्या, पूर्णिमा, सोमवती अमावस्या और विशेष धार्मिक अवसरों पर यहां हजारों श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं.

84 कोसी परिक्रमा का भी है महत्व

नैमिषारण्य में 84 कोसी परिक्रमा का विशेष धार्मिक महत्व है. श्रद्धालु चक्रतीर्थ से परिक्रमा शुरू कर कई प्राचीन मंदिरों और आश्रमों के दर्शन करते हैं. माना जाता है कि श्रद्धापूर्वक यह परिक्रमा करने से अनेक तीर्थों के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है.

देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु

चक्रतीर्थ के अलावा यहां ललिता देवी शक्तिपीठ, व्यास गद्दी, हनुमानगढ़ी, दधीचि आश्रम और मनु-सतरूपा तपस्थली जैसे कई पवित्र स्थल भी मौजूद हैं. इसी कारण नैमिषारण्य को उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक तीर्थों में गिना जाता है.

आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम

नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ केवल एक जलकुंड नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, तपस्या और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि इस पवित्र भूमि पर किया गया स्नान, पूजा और दान विशेष फलदायी होता है. यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी इस तीर्थ की महिमा आज भी श्रद्धालुओं के मन में उसी आस्था के साथ जीवित है.

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