Maihar Mata Temple: भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं, चमत्कार और अनसुलझे रहस्य लोगों को हैरान कर देते हैं. वहां होने वाली घटनाएं तर्क से परे नजर आती हैं. इनमें कुछ मंदिर वास्तव में ऐसे हैं, जिनके बारे में सुनने के बाद इन्हें करीब से देखने और जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है. ऐसा ही एक रहस्यमयी मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिले में है. जी हां, त्रिकूट पर्वत पर विराजमान मां शारदा का मैहर धाम देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है. यहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इस मंदिर की सबसे रहस्यमयी मान्यता वीर योद्धा आल्हा से जुड़ी है.
कहा जाता है कि, महोबा के पराक्रमी योद्धा आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक कठोर तपस्या कर मां शारदा को प्रसन्न किया था. इतना ही नहीं, स्थानीय लोगों का विश्वास है कि आज भी ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले आल्हा ही मां शारदा की पूजा करने आते हैं. यही वजह है कि मंदिर के पट खुलने से पहले गर्भगृह में पूजा के चिह्न दिखाई देने की मान्यता आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है. जानिए मंदिर से जुड़ी कुछ और रोचक जानकारियां-
शारदा मां का धाम क्यों कहलाता है मैहर?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव जब माता सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को अलग किया. जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. माना जाता है कि मैहर में माता सती का हार (माला) गिरा था. इसी कारण इस स्थान का नाम ‘माई का हार’ पड़ा, जो समय के साथ बदलकर मैहर कहलाया.
महोबा के योद्धा आल्हा की 12 वर्षों की तपस्या
लोककथाओं और बुंदेलखंड की वीरगाथाओं के अनुसार, महोबा के वीर योद्धा आल्हा मां शारदा के अनन्य भक्त थे. उन्होंने त्रिकूट पर्वत पर लगातार 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां शारदा ने उन्हें दर्शन दिए और अजेय होने का आशीर्वाद प्रदान किया. कहा जाता है कि, इसी वरदान के कारण आल्हा ने अनेक युद्धों में अद्भुत पराक्रम दिखाया और उनका नाम इतिहास के महान योद्धाओं में शामिल हो गया.
आल्हा आज भी करते हैं पहली पूजा!
मैहर मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता यही है कि, आल्हा आज भी मां शारदा की पूजा करने आते हैं. मंदिर के पुजारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो वहां ताजे फूल, जल और पूजा के निशान दिखाई देते हैं. इसी कारण यह विश्वास प्रचलित है कि सबसे पहली पूजा स्वयं आल्हा करते हैं. हालांकि, इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है.
1063 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं भक्त
मां शारदा का मंदिर त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए पारंपरिक रूप से 1063 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. वर्तमान में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोपवे की व्यवस्था भी उपलब्ध है, जिससे बुजुर्ग और दिव्यांग श्रद्धालु भी आसानी से दर्शन कर सकते हैं.
नवरात्र में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु मां शारदा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. पूरे मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है. भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मां शारदा की आराधना करने पर ज्ञान, साहस और मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है.