Kedarnath Shivling Mystery: देश भर के मंदिरों में शिवलिंग गोलाकार रूप में दिखाई देता है, लेकिन केदारनाथ धाम में स्थित शिवलिंग त्रिकोणाकार है. इसका आकार किसी बैल की पीठ या कूबड़ जैसा दिखाई देता है. मान्यता के अनुसार, पांडवों से बचने के लिए भगवान शिव बैल का रूप लेकर धरती में समाने लगे थे, तभी उनकी पीठ का हिस्सा यहां प्रकट हुआ, जो आज केदारनाथ शिवलिंग के रूप में पूजित है.
अधिकतर मंदिरों में शिवलिंग गोलाकार रूप में दिखाई देता है, लेकिन केदारनाथ धाम में स्थित शिवलिंग त्रिकोणाकार है. इसका आकार किसी बैल की पीठ या कूबड़ जैसा दिखाई देता है. यही अनोखा स्वरूप इसे बाकी ज्योतिर्लिंगों से अलग बनाता है. मान्यता है कि इस शिवलिंग की ऊंचाई और चौड़ाई लगभग 12 फीट है. मंदिर परिसर में माता पार्वती और पांडवों से जुड़ी आकृतियां भी भक्तों को द्वापर युग की कथा की याद दिलाती हैं.
पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने ही कुल के विनाश से बेहद दुखी थे. युद्ध में हुए रक्तपात के कारण वे स्वयं को पाप का भागी मानने लगे. इस दोष से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भगवान शिव की शरण लेने का निश्चय किया और हिमालय की ओर प्रस्थान किया.कहा जाता है कि भगवान शिव पांडवों से सीधे मिलना नहीं चाहते थे. उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्होंने बैल का रूप धारण कर लिया और अन्य पशुओं के बीच जाकर छिप गए. लेकिन भीम ने अपने बल से उस बैल को पहचान लिया. जैसे ही उन्होंने बैल की पूंछ पकड़ने की कोशिश की, भगवान शिव धरती में समाने लगे. उस समय बैल का पिछला हिस्सा यानी कूबड़ बाहर रह गया. यही स्थान आगे चलकर केदारनाथ धाम के रूप में प्रसिद्ध हुआ.
भगवान शिव का जीवंत प्रतीक
इसी वजह से यहां का शिवलिंग त्रिकोणाकार और बैल की पीठ जैसा माना जाता है. कथा के अनुसार, भगवान शिव के शरीर के अन्य अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें आज पंचकेदार के नाम से जाना जाता है.तुंगनाथ मंदिर में उनकी भुजाएं प्रकट हुईं, रुद्रनाथ मंदिर में मुख, मदमहेश्वर मंदिर में नाभि और कल्पेश्वर मंदिर में जटाएं प्रकट हुईं. वहीं बैल का सिर पशुपतिनाथ मंदिर में प्रकट होने की मान्यता है.इसी पौराणिक कथा के कारण केदारनाथ धाम को केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भगवान शिव की दिव्य लीला का जीवंत प्रतीक माना जाता है.
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