Chaturmas 2026: सनातन धर्म में चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना, संयम और भक्ति का विशेष काल माना जाता है. यह अवधि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी तक चलती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने तक पाताल लोक में निवास करते हैं. यही कारण है कि इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है. वर्ष 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू होकर 20 नवंबर तक रहेगा. इसके पीछे एक रोचक और प्रेरणादायक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध भगवान विष्णु, वामन अवतार और राजा बलि से है.
25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास
हिंदू पंचांग के अनुसार चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है. यह चार महीने का ऐसा धार्मिक काल होता है, जिसे तप, जप, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. वर्ष 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई से प्रारंभ होकर 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ समाप्त होगा. इस दौरान भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने की मान्यता के कारण सभी प्रमुख मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है.
राजा बलि से जुड़ी है चातुर्मास की शुरुआत
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय असुरराज राजा बलि ने अपनी शक्ति, पराक्रम और तप के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया था. राजा बलि केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि अपनी दानवीरता के लिए भी प्रसिद्ध थे. राजा बलि के बढ़ते प्रभाव को देखकर इंद्र सहित सभी देवता चिंतित हो गए. जब देवताओं के लिए संकट बढ़ा तो वे भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की.
देवताओं की रक्षा के लिए लिया वामन अवतार
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया. एक ब्राह्मण बालक के रूप में वे राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे. दानवीर राजा बलि ने वामन देव का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनसे मनचाहा दान मांगने को कहा. तब वामन देव ने केवल तीन पग भूमि दान में मांगी. राजा बलि ने बिना किसी संकोच के यह मांग स्वीकार कर ली.
दो कदम में नाप लिए पृथ्वी और स्वर्ग
जैसे ही राजा बलि ने तीन पग भूमि देने का वचन दिया, भगवान वामन ने अपना विराट स्वरूप धारण कर लिया. उन्होंने पहले कदम में पूरी पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे कदम में स्वर्ग लोक को अपने अधीन कर लिया. अब तीसरे कदम के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा था. तब राजा बलि ने अपना वचन निभाने के लिए अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया.
तीसरे पग के साथ पहुंचे पाताल लोक
राजा बलि की सत्यनिष्ठा और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तीसरा कदम उनके सिर पर रखा. इसके साथ ही राजा बलि पाताल लोक पहुंच गए. भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति, समर्पण और दानशीलता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें वरदान मांगने का अवसर दिया.
राजा बलि ने मांगा अनोखा वरदान
जब भगवान विष्णु ने वरदान मांगने को कहा, तब राजा बलि ने कोई धन, राज्य या शक्ति नहीं मांगी. उन्होंने विनम्रता से कहा कि जब भी वे आंखें खोलें या निद्रा से जागें, उन्हें केवल भगवान विष्णु के दर्शन हों. इसके लिए उन्होंने भगवान से अपने साथ पाताल लोक में निवास करने का अनुरोध किया.
भक्त की इच्छा पर पाताल लोक गए भगवान विष्णु
राजा बलि की भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने “तथास्तु” कह दिया और उनके साथ पाताल लोक में रहने लगे. लेकिन भगवान विष्णु के पाताल लोक में चले जाने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं. वहीं दूसरी ओर सृष्टि का संतुलन भी प्रभावित होने लगा, क्योंकि सृष्टि के पालनहार भगवान अपने धाम से दूर थे.
माता लक्ष्मी ने निकाला समाधान
कथा के अनुसार, देवर्षि नारद ने माता लक्ष्मी को एक उपाय बताया. इसके बाद माता लक्ष्मी एक साधारण महिला का रूप धारण कर पाताल लोक पहुंचीं. उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बना लिया. राजा बलि ने बहन के रूप में उनका सम्मान किया और उपहार मांगने के लिए कहा.
भगवान विष्णु की वापसी के लिए रखा अनुरोध
राजा बलि के आग्रह पर माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और उनसे भगवान विष्णु को बैकुंठ लौटाने का वरदान मांगा. राजा बलि एक ओर बहन को दिए वचन से बंधे थे, तो दूसरी ओर भगवान विष्णु को अपने पास रखना चाहते थे. ऐसे में एक विशेष समाधान निकाला गया.
ऐसे शुरू हुई चार महीने पाताल लोक में रहने की परंपरा
भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया कि वे हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में निवास करेंगे. यही अवधि आगे चलकर चातुर्मास के नाम से प्रसिद्ध हुई. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी समय भगवान योगनिद्रा में रहते हैं और चार महीने बाद देवउठनी एकादशी पर पुनः जागते हैं.
चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?
चूंकि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य शुभ कार्यों को करने से बचा जाता है. हालांकि धार्मिक दृष्टि से यह समय अत्यंत पवित्र माना जाता है. इस दौरान जप, तप, व्रत, कथा श्रवण, दान और भगवान के स्मरण का विशेष महत्व बताया गया है. चातुर्मास को केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का अवसर भी माना जाता है. संत-महात्मा और साधक इस समय विशेष नियमों का पालन करते हैं. मान्यता है कि इन चार महीनों में किया गया तप, ध्यान और भक्ति कई गुना अधिक फल प्रदान करता है. इसलिए श्रद्धालु इस अवधि को आध्यात्मिक जागरण और आत्मशुद्धि का समय मानते हैं.