10
Chaturmas Me Kya Nahi Khana Chahiye 2026: देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है. यह चार महीने पूजा-पाठ, व्रत और संयम के लिए विशेष माने जाते हैं. इस दौरान सिर्फ शुभ कार्यों पर ही नहीं, बल्कि खान-पान पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर महीने कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करने का विधान बताया गया है.
हिंदू धर्म में मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने बाद देवउठनी एकादशी पर जागते हैं. इस पूरे समय को चातुर्मास कहा जाता है. इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते. वहीं भक्त जप, तप, दान, व्रत और सात्विक जीवनशैली अपनाने का संकल्प लेते हैं.
चातुर्मास में किन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास के दौरान मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और अन्य तामसिक भोजन से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. कई परंपराओं में शहद और गुड़ का सेवन भी सीमित या वर्जित माना गया है. इसके अलावा हर महीने अलग-अलग खाद्य पदार्थों का त्याग करने का भी विधान बताया गया है.
सावन में इन चीजों से करें परहेज
चातुर्मास का पहला महीना सावन होता है. इस दौरान हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खाने की सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इसका संबंध बारिश के मौसम से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि इस समय इन सब्जियों में कीटाणुओं और सूक्ष्म जीवों की संभावना अधिक मानी जाती है.
भाद्रपद में दही से दूरी रखने की सलाह
चातुर्मास के दूसरे महीने भाद्रपद में दही और उससे बने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करने की परंपरा है. कई धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है. आयुर्वेद भी वर्षा ऋतु में दही का सेवन सीमित रखने की सलाह देता है.
अश्विन में दूध का सेवन क्यों नहीं किया जाता?
तीसरे महीने यानी अश्विन में दूध का त्याग करने का विधान बताया गया है. मान्यता है कि इस समय संयम का पालन करने से व्रत और पूजा का अधिक फल मिलता है. कई लोग आवश्यकता होने पर दूध से बने विकल्पों का सीमित उपयोग करते हैं, हालांकि यह अलग-अलग परंपराओं पर निर्भर करता है.
कार्तिक में उड़द और बैंगन का त्याग
चातुर्मास के अंतिम महीने कार्तिक में उड़द की दाल और बैंगन न खाने की सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यताओं में इसे सात्विक जीवनशैली का हिस्सा माना गया है. कई परिवार आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं.
आयुर्वेद भी बताता है इन नियमों की वजह
आयुर्वेद के अनुसार बारिश के मौसम में पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर हो जाती है. इसलिए तली-भुनी, भारी और देर से पचने वाली चीजों से बचने की सलाह दी जाती है. मौसम के अनुसार खान-पान में बदलाव करने से शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. यही कारण है कि चातुर्मास के दौरान कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करने की परंपरा भी देखने को मिलती है.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.