Ravan Janm Rahsya: भगवान राम और रावण रामायण के प्रमुख पात्र हैं. भगवान राम को धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है. उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने हर परिस्थिति में धर्म का पालन किया. वहीं रावण एक अत्यंत विद्वान, शिवभक्त और शक्तिशाली राजा था, लेकिन उसका अहंकार और अधर्म उसे पतन की ओर ले गया. आमतौर पर लोग भगवान राम के जन्म से जुड़ी तमाम बातें जानते हैं, लेकिन, बहुत कम ही लोग रावण के जन्म के बारे में जानते होंगे. इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि, रामलीला में इसका मंचन न होना. हालांकि, रामायण में इसका जिक्र जरूर मिलता है. यहां बता दें कि, लंकापति रावण जन्म से ब्राह्मण था. उसके पिता ऋषि विश्रवा एक महान ऋषि और विद्वान थे, जबकि उसकी माता कैकेसी राक्षस कुल से थीं. यही मिश्रित वंश रावण के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा रहस्य माना जाता है.
बाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण के अंदर सत्व, रज और तम तीनों ही गुण विद्मान थे. उसमे तमोगुण सबसे अधिक और सत्व गुण सबसे कम था. ऐसा माना जाता है कि उसका जन्म 3 श्राप के कारण हुआ था. एक श्राप सनकादिक बाल ब्राह्मणों ने दिया था. इसी तरह अलग-अलग जगह दो श्राप का और भी जिक्र मिलता है. अब सवाल है कि आखिर, रावण ब्राह्मण पुत्र होकर भी उसमें राक्षसत्व वाले गुण कैसे आए? कौन से श्राप बने रावण जन्म के रहस्य? राक्षस कुल की कैकेसी कैसी बनी रावण के पिता महर्षि विश्रवा की पत्नी? आइए जानते हैं इन सवालों के बारे में-
रावण में कैसे आए राक्षसत्व वाले गुण?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षस पुत्री कैकेसी ने एक शक्तिशाली संतान प्राप्त करने के उद्देश्य से विश्रवा से विवाह किया था. कहा जाता है कि, उसने संतान प्राप्ति के लिए अशुभ समय चुना था. इसी कारण जन्म लेने वाली संतानों में राक्षसी प्रवृत्तियां प्रबल रहीं. रावण के साथ उसके भाई कुंभकर्ण और विभीषण भी जन्मे, जिनमें से विभीषण ने धर्म का मार्ग अपनाया, जबकि रावण और कुंभकर्ण में असुर प्रवृत्ति अधिक दिखाई दी.
क्या रावण में जन्म से राक्षसत्व वाले गुण थे?
रावण बचपन से ही अत्यंत विद्वान, वेदों का ज्ञाता और शिवभक्त था. उसने कठोर तप कर भगवान शिव से कई वरदान प्राप्त किए. लेकिन ज्ञान और शक्ति के साथ उसमें अहंकार भी बढ़ता गया. यही अहंकार उसे धर्म से भटका कर अधर्म की ओर ले गया. रावण का जीवन इस बात का उदाहरण है कि जन्म से अधिक व्यक्ति के कर्म और संस्कार उसके चरित्र को निर्धारित करते हैं. एक ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद, रावण ने अपने अहंकार और गलत निर्णयों के कारण राक्षसी प्रवृत्तियों को अपनाया.
रावण की माता कैकेसी और पिता विश्रवा से कैसे हुआ विवाह
बाल्मीकि रामायण के अनुसार, पौराणिक काल में माली, सुमाली और मलेवन नाम के 3 क्रूर दैत्य भाई हुआ करते थे. तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें बलशाली होने का वरदान दिया. वरदान मिलते ही तीनों स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक में देवताओं सहित ऋषि-मुनियों और मनुष्यों पर अत्याचार करने लगे. अत्याचार जब काफी बढ़ गया तब ऋषि-मुनि और देवतागण भगवान विष्णु के पास गए और व्यथा सुनाई. इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि मैं इन दुष्ट राक्षसों का अवश्य विनाश करूंगा. यह बात जब माली, सुमाली और मलेवन ने सुनी तो उन्होंने अपनी सेना लेकर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया.
भगवान विष्णु को रण क्षेत्र में पाताल लोक भाग गए राक्षस
राक्षसों का अत्याचार देख भगवान विष्णु इंद्रलोक आकर राक्षसों का नरसंहार करने लगे. रण क्षेत्र में उनके आने के कुछ क्षण बाद ही सेनापति माली सहित बहुत से राक्षस मारे गए और शेष लंका की ओर भाग गए. उसके बाद शेष बचे राक्षस सुमाली के नेतृत्व में लंका को त्याग कर पाताल में जा बसे. बहुत दिनों तक सुमाली और मलेवन परिवार के साथ पाताल में ही छुपा रहा.
राक्षसों ने देवताओं पर विजय पाने के लिए बेटी को बनाया मोहरा
सुमाली और मलेवन ने एक दिन सोचा कि हम राक्षसों को देवताओं के भय से यहां कितने दिनों तक छुपकर रहना पड़ेगा? ऐसे में कौन सा उपाय किया जाए, जिससे देवताओं पर विजय प्राप्त की जाए. कुछ क्षण बाद उसे कुबेर का ध्यान आया. तब उसके मन में ये विचार आया कि क्यों न वो अपनी पुत्री का विवाह ऋषि विश्रवा से कर दे, जिससे उसे कुबेर जैसे तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हो जाएगी. इस पर सुमाली अपनी पुत्री कैकेसी के पास पहुंचा और बोला हे पुत्री तुम विवाह के योग्य हो चुकी हो. परन्तु मेरे भय की वजह से कोई तुम्हारा हाथ मांगने मेरे पास नहीं आता. इसलिए राक्षस वंश के कल्याण के लिए मैं चाहता हूं कि तुम परमपराक्रमी महर्षि विश्रवा के पास जाकर उनसे विवाह कर पुत्र प्राप्त करो.
कैसे हुआ कैकेसी का महर्षि विश्रवा से विवाह
कैकेसी राक्षसी होते हुए भी धर्मपरायण स्त्री थी. उसने अपने पिता की इच्छा को पूरा करना अपना धर्म माना और विवाह के लिए स्वीकृति दे दी. इसके बाद कैकेसी महर्षि विश्रवा से मिलने पाताल लोक से पृथ्वीलोक को चल पड़ी. महर्षि विश्रवा के आश्रम तक आते-आते कैकेसी को शाम हो चुकी थी. आश्रम पहुंचकर कैकेसी ने सबसे पहले महर्षि का चरण वंदन किया और फिर मन की इच्छा बतलाई. इस पर महर्षि विश्रवा ने कहा, हे भद्रे मैं तेरी ये अभिलाषा पूर्ण कर दूंगा किंतु तुम कुबेला में मेरे पास आई हो, अत: मेरे पुत्र क्रूर कर्म करने वाले होंगे. उन राक्षसों की सूरत भी भयानक होगी. महर्षि विश्रवा के वचन सुन कैकेसी उनको प्रणाम कर बोली आप जैसे ब्राम्हणवादी दौर मैं ऐसे दुराचारी पुत्रों की उत्पत्ति नहीं चाहती. अतः आप मेरे ऊपर कृपा करें. तब महर्षि ने कैकेसी से कहा कि तुम्हारा तीसरा पुत्र मेरी ही तरह धर्मात्मा होगा.
इस तरह कैकेसी को हुई संतान की प्राप्ति
महर्षि से विवाह के पश्ताच कैकेसी ने वीभत्स राक्षस रूपी पुत्र को जन्म दिया, जिसके शरीर का रंग काला और आकार पहाड़ के सामान था. इसलिए महर्षि विश्रवा ने कैकेसी के सबसे बड़े पुत्र का नाम दशग्रिव रखा, जो बाद में रावण के नाम से तीनों लोकों में जाना गया. उसके बाद कैकेसी के गर्भ से कुम्भकरण का जन्म हुआ उसके समान लम्बा-चौड़ा दूसरा कोई प्राणी न था. तदन्तर बुरी सूरत की सुपर्णखा उत्पन्न हुई सबके पीछे कैकेसी के सबसे छोटे पुत्र धर्मात्मा विभीषण ने जन्म लिया.
2 श्राप भी बने रावण जन्म के कारण
सनकादिक बाल ब्राह्मणों का शृाप: ऐसा माना जाता है कि रावण और उसका भाई कंभकर्ण पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय-विजय थे. एक समय की बात है बाल ब्राह्मण वैकुंठ जाने के लिए प्रवेश द्वार पहुंचे, जहां जय-विजय पहले से ही मौजूद थे. बाल ब्राह्मणों ने अंदर जाने की मंशा जाहिर की तो जय-विजय ने उन्हें जाने से रोक दिया. इसी से नाखुश बाल ब्राह्मणों ने दोनों को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया.
नारद शृाप से शिव गण बने राक्षस: मान्यताओं के मुताबिक, एक बार नारद मुनि को अहंकार हो गया कि वह माया को जीत चुके हैं. भगवान विष्णु उनके अहंकार को समझ गए. उन्होंने माया से एक नगर बनाया. नारद मुनि माया के प्रभाव में उस नगर में पहुंच गए और वहां के राजा से मिले. राजा ने मुनि को अपनी कन्या का हाथ दिखाया और विवाह योग्य वर के बारे में पूछा. कन्या को देख नारद मुनि उस पर मोहित हो गए. उन्होंने राजा से कहा कि कन्या का स्वयंवर रचाइए, योग्य वर मिल जाएगा. इसपर नारद वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु से कहा कि प्रभु संसार में आप से सुंदर कोई नहीं है. मुझे हरिमुख (यानी आप अपना रूप दे दीजिए दे दीजिए. भगवान ने पूछा- क्या दे दूं, नारद बोले- हरिमुख, प्रभु हरिमुख. संस्कृत में हरि का एक अर्थ बंदर भी होता है. नारद जी यही रूप लेकर स्वयंवर पहुंच गए.
वहां शिवजी ने, विष्णुजी के कहने पर अपने दो गणों को भेज रखा था. स्वयंवर में नारद मुनि उछल-उछल कर अपनी गर्दन आगे कर रहे थे कि कन्या उन्हें देखे और उनके गले में वरमाला डाल दे. उनकी यह हरकत देख शिवजी के गण भेष बदलकर पहुंचे और उन्होंने उनका उपहास उड़ाना शुरू कर दिया. कहने लगे- कन्या को देखकर बंदर भी स्वयंवर के लिए आ गए. इस पर नारद जी ने दोनों को शृाप दिया कि तुमने मुझे बंदर कहा, जाओ तुम लोगों को मृत्युलोक में बंदर ही सबक सिखाएंगे. फिर शिवजी के ये दोनों गण रावण और कुंभकर्ण बने.
इसके बाद नारद ने देखा कि कन्या ने जिसके गले में वरमाला डाली वह खुद ही श्रीहरि हैं. तब नारद ने उन्हें शृाप दिया कि जिस तरह तुम मेरी होने वाली पत्नी को ले गए और मैं वियोग-विलाप कर रहा हूं, एक दिन तुम्हारी भी पत्नी का हरण होगा और तुम विलाप में वन-वन भटकोगे. इस तरह राम और रावण का जन्म होना तय हो गया.