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Aghori: अघोरी कौन हैं? आखिर श्मशान में ही क्यों करते है अपनी साधना; कैसे शुरू हुई यह रहस्यमयी परंपरा?

Aghori Tradition: अघोर शब्द का संबंध ऐसी अवस्था से माना जाता है जिसमें नफरत, डर और भेदभाव का स्थान नहीं होता. अघोरी भगवान शिव को अपना आराध्य मानते हैं और जीवन में उन चीजों का सामना करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें समाज सामान्य तौर पर अशुभ या अपवित्र मानता है.

By: Shristi S | Published: September 1, 2026 5:21:06 PM IST



Who are Aghoris: हिंदू धर्म की विविध साधना परंपराओं में भगवान शिव को संहार, वैराग्य और परम चेतना के प्रतीक के तौर में देखा जाता है. इसी शिव-उपासना की एक बेहद रहस्यमयी और कठोर धारा है ‘अघोर’. अघोरी साधुओं का जीवन आम धार्मिक परंपराओं से बिल्कुल अलग दिखाई देता है. 

राख से ढका शरीर, जटाएं, श्मशान के बीच साधना और मृत्यु के प्रतीकों के साथ उनका जुड़ाव लोगों के मन में उत्सुकता और डर साथ में पैदा करता है. लेकिन अघोर दर्शन का मूल विचार भय पैदा करना नहीं, बल्कि डर और भेदभाव से ऊपर उठना है.

कौन होते हैं अघोरी?

अघोर शब्द का संबंध ऐसी अवस्था से माना जाता है जिसमें नफरत, डर और भेदभाव का स्थान नहीं होता. अघोरी भगवान शिव को अपना आराध्य मानते हैं और जीवन में उन चीजों का सामना करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें समाज सामान्य तौर पर अशुभ या अपवित्र मानता है.

मानवशास्त्रीय अध्ययनों के मुताबिक, अघोर साधना  में मृत्यु और श्मशान का महत्व इसलिए है क्योंकि साधक को जीवन की नश्वरता और जन्म-मृत्यु के चक्र पर चिंतन करना होता है. विद्वान जोनाथन पैरी ने अघोरी साधना को मृत्यु और श्मशान का के चक्र से मुक्ति की आकांक्षा से जोड़ा है.

श्मशान में ही क्यों करते हैं साधना?

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट अघोर परंपरा से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध स्थान मान जाता है. श्मशान अघोरियों के लिए केवल मृत शरीरों का अंतिम संस्कार स्थल नहीं, बल्कि वैराग्य और आत्मचिंतन का स्थान है. यहां मृत्यु को सामने देखकर साधक सांसारिक मोह और शरीर की नश्वरता पर ध्यान केंद्रित करता है. हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि हर अघोरी हमेशा श्मशान में ही रहता है. अघोर परंपरा से जुड़े आश्रम और सामाजिक-सेवा के केंद्र भी विकसित हुए हैं. शोधकर्ता रॉन बैरेट ने आधुनिक अघोर परंपरा में उपचार और सेवा से जुड़े बदलावों का भी उल्लेख किया है.

कैसे शुरू हुई अघोरी परंपरा?

अघोर की जड़ें व्यापक शैव और तांत्रिक परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं. इतिहास में कापालिक जैसे कुछ शैव संन्यासी भी श्मशान, खोपड़ी और कठोर साधनाओं से जुड़े रहे हैं, हालांकि कापालिक और आधुनिक अघोरी परंपरा को बिल्कुल समान मानना उचित नहीं हैं.

आधुनिक अघोर परंपरा में बाबा कीनाराम का विशेष महत्व है. वाराणसी स्थित उनकी परंपरा और आश्रम ने अघोर साधना को संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शोध के मुताबिक, कीनाराम की परंपरा के उत्तराधिकारी सदियों से इस धारा को आगे बढ़ाते रहे हैं.

क्या अघोरी काला जादू करते हैं?

अघोरियों को लेकर काला जादू, चमत्कार और अलौकिक शक्तियों से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं. लेकिन इन दावों को प्रमाणित तथ्य के तौर में नहीं देखा जा सकता. अघोर को समझने का बेहतर तरीका इसे एक ऐसी कठोर आध्यात्मिक परंपरा के रूप में देखना है, जिसका केंद्र मृत्यु के भय, सामाजिक भेदभाव और सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठकर मुक्ति की तलाश है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. Inkhabar इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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