नई दिल्ली. योगी जी पहली परीक्षा में पास हुए, बीजेपी की बम बम, अब गुजरात की बारी है, बीजेपी का यूपी में क्लील स्वीप जैसी तमाम खबरें आप चैनल्स, अखबार और सोशल मीडिया पर देख रहे होंगे. यूपी निकाय चुनावों में प्रचंड जीत के बाद ये जाहिर भी था, लेकिन अभी आम आदमी को ये समझ नहीं आ रहा कि अखिलश ने ढंग से प्रचार क्यों नहीं किया, राहुल ने यूपी में ज्यादा चिंता क्यों नहीं दिखाई? इन सबका जवाब एक ही लाइन में निहित है कि जितना आप सबको दिख रहा है कि बीजेपी ने ये पाया, वो पाया, उससे कहीं ज्यादा बीजेपी ने खो दिया है और ये वापस पाना आसान नहीं. एक अनुमान के मुताबिक बूथ स्तर के तीस फीसदी से अधिक पन्ना प्रमुख तक ने इन चुनावों में बगावत कर दी, बीजेपी के विधायक तक भी पार्टी का सिम्बल फॉर्म छीनते पाए गए. जिस पार्टी को अमित शाह और सुनील बंसल की जोडी ने पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दोबारा से खड़ा किया था और योगी ने अपनी ऊर्जा से बांध रखा था, इस निकाय चुनाव ने उसको छिन्न भिन्न कर दिया है.

इस बात को आप तब समझ पाएंगे जब कुछ जिलों से इन निकाय चुनावों के दौरान आईं कुछ खबरों पर नजर डालेंगे. सबसे पहले जहां बीजेपी हारी, उन दो बड़े निगमों मेरठ और अलीगढ़ की बात. अलीगढ़ में एक पुराने एबीवीपी कार्यकर्ता को टिकट मिला, जमीन से जुड़े हैं और पैसों से बहुत मजबूत नहीं. उस सीट पर बीजेपी वार्ष्णेय को टिकट देते आई है, आशुतोष वार्ष्णय और उनकी पत्नी मेयर रह चुके हैं. इस बार टिकट डा. राजीव अग्रवाल को मिला. लग रहा था आसान जीत है, क्योंकि कल्याण सिंह का ग्रह जिला है, उनका नाती संदीप यूपी सरकार में मंत्री है, हाल ही में ठा. जयवीर सिंह बीजेपी में शामिल हुए हैं. मुस्लिम वोट सपा, बीएसपी और कांग्रेस में बंट सकते हैं. टिकट का ऐलान होते ही महानगर की महिला मोर्चा की अध्यक्षा संगीता वार्ष्णय ने निर्दलीय नॉमिनेशन भरने का ऐलान कर दिया, कहा हमारे पौने दो लाख वोट हैं. बमुश्किल उन्हें मना लो लिया गया, लेकिन वार्ष्णेय वोट उसी शिद्दत से नहीं मिले, रहा सहा काम गर्वनर सिंह लोधे ने निर्दलीय भरकर कर दिया, करीब 6000 वोट उन्हें मिले. कहा जा रहा है कि राजीव अग्रवाल कल्याण सिंह के बेटे राजू की पसंद नहीं थे, इसलिए गर्वनर पर हाथ रखकर लोधे वोट काटे गए.

मेरठ में जिस दिन मेयर और पार्षदों के नामों का ऐलान हुआ, भाजपाइयों में आपसी विवाद शुरू हो गया. महानगर अध्यक्ष करुणेश नंदन गर्ग के आवास को घेर लिया गया. आरोप लगे कि कर्मठ कार्यकर्ताओं की बजाय बाहरी लोगों को पैसे लेकर टिकट दे दिए गए हें. ये मेरठ था जहां सीएम योगी की सभा में काले झंड़े दिखाए गए, दरअसल सुमित गुर्जर एनकाउंटर के बाद उसके चाहने वाले इस बात से नाराज थे कि संगीत सोम ने सुमित को एक कुख्यात अपराधी बताया था. तो मेरठ के मवाना में रवि गोला को टिकट मिलने पर वरिष्ठ बीजेपी नेता अशोक चौधरी निर्दलीय मैदान में उतर गए. हस्तिनापुर के बीजेपी विधायक दिनेश खटीक को कार्यकर्ताओं ने घेर लिया कि सभासद की टिकट का वायदा करने के बावजूद क्यों नहीं दी.

शिकोहाबाद नगर पालिका में भाजपा से चेयरमैन पद की प्रत्याशी मनोरमा गुप्ता के बनाए जाने के बाद भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सुमन प्रकाश मिश्रा ने पार्टी से बगावत कर अपनी पत्नी रीना मिश्रा को चुनाव मैदान में उतार दिया. शिकोहाबाद से जिला मंत्री रहे ब्रजेश यादव उर्फ बाजा अपनी पत्नी गीता यादव को चुनाव लड़ा रहे है. पार्टी हाईकमान ने इसे गंभीरता से लेते हुए इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है. टूंडला नगर पालिका क्षेत्र में पार्टी की जिला मंत्री नीलम दिवाकर एवं भाजपा अनुसूचित मोर्चा के जिला संयोजक सुशील चक पार्टी प्रत्याशी होने के बाबजूद पालिका अध्यक्ष का चुनाव लडे. जिला अध्यक्ष बीएल वर्मा ने इन दोनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया.

फतेहपुर में सदर विधायक विक्रम सिंह ने क्षेत्रीय मंत्री अविनाश सिंह से बदसलूकी की, अपने समर्थकों को देने के लिए सिम्बल फॉर्म तक छीन लिए. इससे प्रदेश बीजेपी के नेता काफी नाराज हुए और महामंत्री अशोक कटारिया ने उन्हें कारण बताओ नोटिस तक जारी कर दिया. इतना ही नहीं वाराणसी में 17 नेताओं का निष्कासन और बरेली में 22 लोगों को पदमुक्त कर दिया गया. लगभग हर जिले में बीजेपी ने दस से बीस कर्मठ कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाला है, और जरूरी नहीं है कि वो सब गलत ही हों, हो सकता है पार्टी ने गलत आदमी को टिकट दी हो, जिसके चलते उन्होंने बगावत की हो.

झांसी भी अछूता नहीं रहा, वहां मेयर प्रत्याशी रामतीर्थ सिंघल को टिकट दिया गया. उनके विरोध में कई बीजेपी कार्यकर्ता ही सड़क पर उतर आए. कार्यकर्ताओं ने दो दिन तक बीजेपी कार्यालय में प्रदर्शन किया. मथुरा में मेयर प्रत्याशी मुकेश आर्यबंधु ने नामांकन के आखिरी दिन पर्चा दाखिल किया. उसके एक दिन पहले ही कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया. अब भी कार्यकर्ता उनसे नाराज हैं. मथुरा में ही गऊघाट के एक वार्ड में भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष मीरा मित्तल को टिकट दिए जाने पर रविवार को क्षेत्रीय महिलाओं ने आतिशबाजी कर खुशी जाहिर की तो यहां टिकट मांग रहे योगेश आवा के समर्थकों ने विरोध में नारेबाजी की. धौलीप्याऊ क्षेत्र में बनाए गए प्रत्याशी को पुराना कांग्रेसी बताकर विरोध किया गया.

नगर निगमों के अलावा नगर पालिकाओं में भी विरोध जमकर हुआ. उरई नगर पालिका सीट से दिलीप दुबे को टिकट दिया गया, वहां अनिल बहुगुणा ने उनके खिलाफ नामांकन कर दिया. बहुगुणा ने अपनी ताकत दिखाने के लिए नामांकन जुलूस में पूरी ताकत झोंक दी और खूब भीड़ जुटाई. ललितपुर में रजनी साहू को टिकट दिया गया. यहां भी हाल ही में बीएसपी से बीजेपी में आए रमेश कुशवाहा ने अपनी पत्नी कमला देवी को मैदान में उतार दिया. बरेली की नवाबगंज नगरपालिका चुनाव में फर्जी वोटिंग पर बसपा-भाजपा के बीच पथराव के बाद भाजपाइयों पर पुलिस के लाठीचार्ज से आहत पार्टी जिलाध्यक्ष रवींद्र सिंह राठौर फूट-फूटकर रोए. जिलाध्यक्ष बसपा चेयरमैन प्रत्याशी शहला ताहिर की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे. इसके विरोध में भाजपाइयों ने थाने के अंदर प्रदर्शन भी किया लेकिन जब पुलिस के आला अफसरों समेत भाजपा के भी बड़े नेताओं ने जिलाध्यक्ष की नहीं सुनी तो वह स्वयं को असहाय समझकर फूट-फूटकर रोने लगे. उनका रोने का सोशल साइट्स पर वीडियो वायरल हो गया.

ऐसा नहीं है निकाय स्तर पर केवल बीजेपी में ही विरोध या वगावत हुई, बाकी पार्टियों मे भी हुई, लेकिन उनके यहां कम दावेदार थे, कयोंकि जीतने की उम्मीदें कम थीं. इलाहाबाद में जब फिर से नंदी गुप्ता की पत्नी को ही टिकट दे दिया गया तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया. विजय मिश्रा को जैसे ही कांग्रेस ने अपना मेयर प्रत्याशी बनाया, नगर कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया. फिर भी कांग्रेस को इस तरह की गुटबाजी का शिकार कम होना पड़ा. वैसे भी उनके पास खोने को कुछ है भी नहीं, अमेठी सीट पर हार ही बड़ी खबर बन गई.

अब इन सब खबरों का आप मूल्यांकन करेंगे तो पाएंगे कि फिर से बीजेपी ने जीतने वालें कैंडिडेट्स को टिकट दिया और खामियाजा भुगता अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं की बगावत या विरोध से. और ये खामियाजा बीजेपी को हर शहर, हर कस्बे और हर बूथ या वार्ड में भुगतना पड़ा है. आप किसी भी वार्ड की रिपोर्ट मंगा लीजिए. ये बड़ी वजह थी जिसके चलते निकाय चुनावों में पार्टियां मैदान में सिम्बल के साथ उतरने से बचती हैं. ज्यादातर निर्दलीय ही अपनी साख के आधार पर चुनाव जीतते हैं, तभी तो निगम पार्षदों में बीजेपी की जीत का प्रतिशत केवल 44.15 है, जो नगर पालिका परिषद अध्यक्षो में केवल 29.29 प्रतिशत ही रह जाता है, नगर पालिका परिषद सदस्यों में तो ये और गिरकर केवल 14.26 प्रतिशत ही रह जाता है. हालांकि बाकी पार्टियों का और भी बुरा हाल है.

ऐसे में जबकि बीजेपी जीत की खुशियां मना रही है, उसके बडे नेताओं को इस बात का भी आभास है कि उन्होंने क्या क्या और किस किस को खो दिया है और वो पहली फुरसत में इससे उबरने की भी रणनीति बनाएंगे. बीजेपी के यूपी प्रवक्ता डा. चंद्रमोहन बताते हैं कि, ‘’जिला स्तर पर बहुत लोगों के खिलाफ एक्शन लिया गया है, प्रदेश स्तर पर भी क्योंकि पार्टी की नींवही अनुशासन पर रखी है. ये जरूर है कि भावावेश में कई बार कार्यकर्ता गलत फैसला ले लेते हैं और कई बार स्थानीय स्तर पर पार्टी से भी आकलन में गलती होती है. लेकिन हम पुराने कार्यकर्ताओं को किसी भी कीमत पर खोएंगे नहीं, ऐसे हर मामले की समीक्षा होगी और अगर गलती कार्य़कर्ता की है और वो उसे महसूस भी करता है तो उसके लिए पार्टी के दरवाजे हमेशा के लिए खुले हैं.‘’ हालांकि अगले 6 महीने में ये कवायद करके नाराज कार्यकर्ताओं को वापस उसी मोड में नहीं लाया गया तो 2019 में मोदीजी के लिए दिक्कत जरूर हो सकती है.

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