नई दिल्ली. काशी और बनारस के नाम से मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी से चुनाव लड़ने का माहौल बनाकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव ना लड़ने का फैसला 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने वाला साबित हो रहा है. राजीव गांधी और सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी में कांग्रेसी कार्यकर्ता इंदिरा गांधी की छवि देखते थे. कांग्रेसियों को लगता था कि राहुल गांधी से कांग्रेस के बुरे दिन नहीं गए तो प्रियंका गांधी ही उनके अच्छे दिन लाएंगी. सप्ताह-दस दिन से वाराणसी से प्रियंका गांधी के लड़ने की खबर से जोश में आए कांग्रेस कार्यकर्ता अब पप्पू बन गए हैं और बीजेपी के नेता से लेकर कार्यकर्ता तक सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों पर उन्हें यह कहकर ललकार रहे हैं कि तुम क्या लड़ोगे, तुम्हारी तो नेता मोदी से डरकर भाग गई.

कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता अब ये सफाई दे रहे हैं कि प्रियंका गांधी ने चुनाव लड़ने से इनकार इसलिए किया है ताकि वो एक सीट पर फोकस करने के बदले पार्टी महासचिव के तौर पर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटों पर ध्यान दे सकें. इस लॉजिक से तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी अमेठी और वायनाड से लड़ने की बजाय पूरे देश में कांग्रेस कैंडिडेट्स को लड़ाने पर ध्यान देना चाहिए था. सफाई ये भी दी जा रही है कि पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ये परंपरा डाली कि कांग्रेस विपक्ष के बड़े नेताओं के खिलाफ मजबूत कैंडिडेट नहीं देगी ताकि संसद में विपक्ष के भी अच्छे नेता जीतकर आ सकें और संसदीय बहस में हर राजनीतिक विचारधारा की बात मजबूती से सामने आए.

एक तरफ राहुल गांधी के सलाहकार सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि ये फैसला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी पर छोड़ा था और प्रियंका गांधी ने खुद निर्णय लिया है कि वो अभी चुनाव नहीं लड़ेंगी बल्कि लड़ाएंगी. दूसरी तरफ सोनिया गांधी के करीबी राजीव शुक्ला कह रहे हैं कि प्रियंका गांधी तो लड़ने को तैयार थीं, पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने मना कर दिया. वाराणसी से लड़ने की चर्चा खुद प्रियंका गांधी ने शुरू की थी और एक सप्ताह से भी ज्यादा समय से चली इस चर्चा में राहुल गांधी से लेकर रॉबर्ट वाड्रा तक ने इसका खंडन करने के बदले मीडिया को इस तरह के संकेत दिए जिससे माहौल बना रहा कि प्रियंका ही लड़ेंगी. आइए समझते हैं अगर प्रियंका गांधी बनारस में बीजेपी कैंडिडेट और पीएम नरेंद्र मोदी से लड़ जातीं तो राजनीतिक तौर पर उसके क्या असर होते और अब जब वो नहीं लड़ रही हैं तो किस तरह के असर हो रहे हैं.

प्रियंका गांधी के वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने पर क्या होता असर

प्रियंका गांधी अगर वाराणसी लोकसभा सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतर जातीं तो यकीनन ये चुनाव देश के संसदीय चुनावों के इतिहास में एक बड़ा चुनाव हो जाता. बेल्लारी में सोनिया गांधी के खिलाफ सुषमा स्वराज या अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति ईरानी के चुनाव से बहुत बड़ा चुनाव होता ये. रायबरेली में इंदिरा गांधी और राजनारायण जैसा चुनाव. ऐसा भी नहीं था कि वोटगणित पूरी तरह कांग्रेस और प्रियंका गांधी के खिलाफ था. पीएम मोदी को 2014 के मोदी लहर में खुद बनारस में 56 परसेंट वोट मिले थे. मोदी के खिलाफ पड़े 44 परसेंट वोट प्रियंका की संभावना थी जिसमें जीत की गारंटी नहीं थी. मोदी भले कह रहे हों कि चुनाव में सत्ता विरोधी लहर नहीं सत्ता समर्थक लहर है लेकिन केंद्र में 5 साल और यूपी में दो साल से सरकार चला रही बीजेपी इस बार भी बनारस में 56 परसेंट वोट लाएगी, इसकी गारंटी 23 मई से पहले कोई नहीं दे सकता.

2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़कर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 20 परसेंट वोट लाए. आम आदमी पार्टी का बनारस में ना संगठन था और ना जनाधार. एक बड़े नेता से दूसरा बड़ा नेता भिड़ा तो यूपी की पार्टी सपा और बसपा से लेकर कांग्रेस तक ठिकाने लग गए. तीनों पार्टियों के कैंडिडेट 1 लाख वोट का फिगर पार नहीं कर सके और तीनों का वोट मिलाकर भी आप के केजरीवाल से पीछे थे. दो बड़े नेताओं की लड़ाई में वोट आमने-सामने बंटता है. प्रियंका गांधी ने बनारस की लड़ाई को मोदी बनाम गांधी या बीजेपी बनाम कांग्रेस करने का मौका गंवा दिया. केजरीवाल बनारस में भले हार गए लेकिन उस लड़ाई से जो माहौल बना उससे उन्हें पंजाब जैसे राज्य से लोकसभा के चार सांसद मिल गए. वो भी तब जब आप दिल्ली की 7 की सात सीटें बीजेपी से हार गई. सेनापतियों की लड़ाई का अलग मजा होता है और उसके अलग फायदे-नुकसान होते हैं. कांग्रेस और प्रियंका गांधी ने ये रिस्क लेने से हाथ खींच लिया.

प्रियंका अगर बनारस से लड़तीं तो ये सिर्फ बनारस की लड़ाई नहीं रहती और पूर्वांचल के अलावा देश के दूसरे राज्यों के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भी मनोबल बढ़ता. चुनाव सिर्फ जीतने के लिए नहीं लड़ा जाता. कई बार लड़ना संगठन खड़ा करने और मजबूत करने की कोशिश होती है और प्रियंका गांधी ये मैसेज नहीं दे पाईं. भले वो बनारस में मोदी से हार जातीं लेकिन कांग्रेस को पूरे इलाके में जगा जातीं जो 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनके काम आता. प्रियंका गांधी बनारस से लड़तीं तो बीजेपी के सबसे बड़े प्रचारक नरेंद्र मोदी को बनारस में थोड़ा से बहुत ज्यादा समय देना पड़ता जिसका असर दूसरे राज्यों में उनकी रैलियों की संख्या और समय पर होता. अब मोदी के लिए बनारस में तो एक तरह से वॉकओवर है.

प्रियंका गांधी के वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव ना लड़ने का क्या हुआ असर

ऐसा होता तो वैसा होता जैसी बातों का समय बीत चुका है. कांग्रेस ने अजय राय को वाराणसी से टिकट दिया है जो पहले भी लड़े और हारे हैं. प्रियंका गांधी के चुनाव ना लड़ने का सबसे बड़ा जो असर हुआ है वो बनारस, यूपी और देश के दूसरे राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर नेता जिस लहजे में एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, गांव-शहर के चौक-चौराहों पर पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक वैसे नहीं करते. वहां बहस तीखी होती है. प्रियंका गांधी के ना लड़ने का बीजेपी नेता अरुण जेटली से लेकर पीयूष गोयल तक मजा ले रहे हैं. सोशल मीडिया पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगाए बीजेपी समर्थक खुलकर कह रहे हैं कि भाई अमेठी में हारने के डर से वायनाड भाग गया और बहन मोदी के डर से बनारस से भाग गई. जमीन पर बीजेपी कार्यकर्ताओं के प्रचार में प्रियंका गांधी का बनारस से नहीं लड़ना बड़ा हथियार बन गया है जिससे वो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जलील करना शुरू कर चुके हैं.

प्रियंका गांधी के बनारस से ना लड़ने का दूसरा असर कांग्रेस नेताओं पर दिख रहा है जो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को लेकर अलग-अलग भाषा में सफाई दे रहे हैं, विरोधाभास वाले बयान दे रहे हैं. जाहिर तौर पर ये एक संकेत भर है लेकिन राजनीति ऐसे ही संकेतों से चलती है. सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि राहुल गांधी ने फैसला प्रियंका गांधी पर डाला था और प्रियंका गांधी ने लड़ने से मना कर दिया. राजीव शुक्ला कह रहे हैं कि प्रियंका गांधी तो लड़ने को तैयार थीं लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष ने नहीं लड़ाने का फैसला किया. सैम पित्रोदा और राजीव शुक्ला की निष्ठा गांधी परिवार में है लेकिन दोनों के बयान ये बता रहे हैं कि उनकी निष्ठा गांधी परिवार के अंदर किनके साथ है.

दोनों की बात सच मान लें तो क्या राहुल और प्रियंका में बात नहीं होती कि दोनों तय नहीं कर सके कि क्या करना है. अगर राहुल और प्रियंका ने मिलकर तय किया कि नहीं लड़ना है तो सैम पित्रोदा और राजीव शुक्ला की सफाई दो दिशा में क्यों जा रही है. प्रियंका के ना लड़ने से खतरा अब इस बात का है कि कांग्रेस के अंदर गुटबाजी बढ़ेगी और अपना-अपना नंबर बढ़ाने में लगे नेता भाई-बहन के बीच खाई पैदा करेंगे. प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को अगर आखिर में यही करना था तो प्रियंका को- वाराणसी से लड़ लूं क्या- जैसी बचकानी चर्चा छेड़नी नहीं चाहिए थी. एक बार हवा बनाकर जब कोई पीछे हटता है तो नुकसान होता है. चार चरण के बचे चुनाव में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के इस फैसले से कांग्रेस को नुकसान होने का माहौल बनने की संभावना ज्यादा है.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और ये किसी भी तरह से इनखबर का नजरिया नहीं है)

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