नई दिल्ली. लोकसभा चुनाव 2019 से पहले सबसे ज्यादा 80 संसदीय सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी, अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल और संभावित तौर पर राहुल गांधी की कांग्रेस के महागठबंधन की चर्चा के बीच एक खबर सनसनी फैला रही है कि मायावती और बीएसपी के कार्यकर्ता यूपी की सारी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की भी समानांतर तैयारी कर रही हैं. ये खबर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी राहत ला सकती है क्योंकि सीएम योगी आदित्यनाथ की खाली की गई गोरखपुर और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की खाली सीट फूलपुर पर लोकसभा उपचुनाव में सपा-बसपा के गठबंधन से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा.

वैसे राजनीतिक पार्टियों और उनके कामकाज के तौर-तरीके को समझने वाले जानते हैं कि लोकसभा या विधानसभा जैसे बड़े चुनाव की तैयारियां पार्टियां साल भर पहले से शुरू कर देती हैं. जैसे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव की तैयारी साल के शुरुआत से ही कर दी थी और उनकी पार्टी का ग्राउंड वर्क, इंटरनल सर्वे वगैरह का एक राउंड पूरा भी हो चुका है. माना जा रहा है कि मायावती भी महागठबंधन की चर्चा और बातचीत के बीच बसपा के लिए राज्य की सारी 80 सीटों पर लोकसभा चुनाव की समानांतर तैयारी भी कर रही हैं ताकि अगर चुनाव से कुछ महीने पहले गठबंधन की बातचीत पटरी से उतर जाए तो उनके पास सुपर इमरजेंसी जैसे हालात ना हों और उनके कार्यकर्ता और पार्टी यूनिट पूरी तरह से उस स्थिति के लिए तैयार रहे.

खबर है कि मायावती की बीएसपी की 80 की 80 लोकसभा सीटों पर प्रखंड स्तर तक कार्यकर्ता मीटिंग हो चुकी है और सारी मीटिंग में यही कहा जा रहा है कि अकेले दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी रखनी है. गठबंधन होगा तो गठबंधन के नेता को जिताना है क्योंकि गठबंधन के तहत मायावती को मिलने वाली सीटों पर उनके कैंडिडेट की जीत में सहयोगी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्थन अहम होगी जिसके जवाब में उनके कार्यकर्ताओं को भी सहयोगी पार्टियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी. ग्राउंड रिपोर्ट सारे नेताओं को पहुंचता है और अगर गठबंधन के बाद भी किसी पार्टी के नेता या कार्यकर्ता उस सीट पर दूसरी पार्टी का कैंडिडेट उतरने की हालत में मदद नहीं करेंगे तो उसका खामियाजा उस सीट के अलावा उस पार्टी को अपनी सीटों पर दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बेरुखी से भुगतना होगा.

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के बाद जिस तेवर और जोश के साथ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा सुप्रीमो मायावती के सम्मान में आगे बढ़कर पहल की है और ये कई बार साफ किया है कि बीजेपी को हराने के लिए महागठबंधन होकर रहेगा चाहे उसके लिए उनकी पार्टी को कुछ कम सीटें क्यों ना लड़नी पड़े, उससे इस बात का अंदेशा कम ही है कि महागठबंधन ना हो. फिर भी राजनीति, राजनीति होती है इसलिए मायावती की बीएसपी बातचीत के साथ समानांतर तरीके से खुद की तैयारी भी कर रही है तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है. ऐसी तैयारी अखिलेश यादव की सपा, राहुल गांधी की कांग्रेस भी हर सीट पर कर रही होगी. सारी पार्टियों के सारे कार्यकर्ता सारी सीटों पर लड़ने की तैयारी करें, कमर कसकर रहें और फिर महागठबंधन होने की सूरत में सब एक-दूसरे के लिए काम करें, ये उनके ही फायदे की चीज है.

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