नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत दौरे पर अपने परिवार के साथ ताज महल का दीदार किया. ट्रंप का ताज महल देखना एक बार फिर ताज को चर्चा में ले आया. तमाम तरह की कहानियां सोशल मीडिया पर चलने लगीं. हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि ताजमहल पर किसी हिंदूवादी नेता ने कुछ बोला और माहौल गरम हो गया. ये सालों से होता रहा है, लेकिन वक्त ने अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ताजमहल को भारत की पहचान से इस कदर जोड़ दिया गया है कि बड़ी पार्टियां खौसतौर पर हिंदूवादी छवि वाली बीजेपी भी ताजमहल को अपने एजेंडे में शामिल करने से बचती रही है. 

फिर भी ताजमहल लगातार एक मुद्दा बना रहा है और उसकी वजह है ताजमहल को लेकर लगे आरोपों की कभी ना जांच होना, सरकारों से लेकर न्यायालयों तक इस मुद्दे को सुनते ही खारिज कर देना और इतिहास के प्रति उदासीन आज के पढ़े लिखे युवाओं की गढ़े मुर्दों को उखाड़ने की बजाय भविष्य के भारत में रुचि दिखाना. लेकिन इससे विवाद सुलझ नहीं रहा बल्कि हर साल छह महीने में सोशल मीडिया और राजनीति में चर्चा का विषय बन जाता है.

आखिर इस मुद्दे का आधार क्या है कि ताजमहल एक शिवमंदिर था, उसे तेजोमहालय कहा जाता था? इस पूरे विवाद को उठाया एक ही बंदे ने, इसलिए ताजमहल के विवाद को समझने के लिए उसके बारें में जान लेना निहायत ही जरूरी है. उस बंदे का नाम था प्रोफेसर पुरुषोत्तम नागेश ओक यानी पीएन ओक. जो एक लेखक थे, फ्रीडम फाइटर थे- आजाद हिंद फौज के चीफ जनरल एआर भोंसले के एडीसी रह चुके थे और फर्गुसन कॉलेज, पुणे में अंग्रेजी भी पढ़ाते थे, इसी के चलते उनके नाम में प्रोफेसर जुड़ गया था. 

आजाद हिंद फौज के रेडियो में तो वो कमेंट्रेटर रहे ही, बाद में पत्रकार भी बन गए, हिंदुस्तान टाइम्स, स्टेट्समैन में काम किया. यूएस एम्बेसी की इनफॉरमेशन सर्विस में भी एडीटर रहे, उसके बाद मिनिस्ट्री ऑफ इनफॉरमेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग सर्विस में एडीटर भी रहे. ओक इंदौर में पैदा हुए,आगरा से एमए किया, मुंबई से एलएलबी किया औऱ पुणे में 2007 में उनकी मौत हो गई. बाद के दिनों में प्रोफेसर ओक ने एक संस्था ही बना ली, ‘इंस्टीट्यूट ऑफ री-राइटिंग इंडियन हिस्ट्री.’ कई किताबें इस बारे में प्रोफेसर ने लिखी है, ओक का मानना था कि भारत का सारा इतिहास गलत तरीके से लिखा गया है.

 पीएन ओक का शुरू से ही हिंदुत्ववादी लेखन की तरफ रुझान था, उन्होंने एक किताब लिखी, ‘द ताजमहल इज ए टेम्पल प्लेस’. इस किताब को कोई पढ़ लेगा तो एकबारगी तो लगेगा बंदे की बात में वाकई में दम है, लेकिन सच ये है कि सन 2000 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, प्रो. ओक की इस मांग को खारिज कर दिया कि ताजमहल को एक हिंदू मंदिर घोषित किया जाए. लेकिन ये भी सच है कि जिस तरह से बाबरी ढांचे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिए कि एएसआई को चैक किया जाए कि इसके नीचे मंदिर था या नहीं, वैसा कोई आदेश ताजमहल के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट ने ओक की याचिका खारिज करते समय नहीं दिया.

इतना ही नहीं प्रोफेसर ओक ने एक दरख्वास्त भारतीय संसद को भी दी कि ताजमहल के बंद पड़े कमरों और कब्र के नीच की जगहों पर जाने की इजाजत दी जाए तो संसद ने भी उनकी मांग को खारिज कर दिया. इस पर प्रोफेसर ओक ने अपनी इस किताब में ढेर सारे तर्क अपनी बात को साबित करने के लिए रखे हैं, जिनमें से कुछ तो वाकई में इतना लाजवाब हैं कि आप आसानी से खारिज नहीं कर सकते, कुछ ऐसा लगता है तुकबंदी में गढ़े गए हैं.

दिक्कत यही थी प्रोफेसर ओक को सीरियस ना लेने की एक बड़ी वजह अपनी बात को किसी भी कीमत पर साबित करने के लिए वो अजीबोगरीब तर्क भी देने लगते थे. जो काम दो सॉलिड सुबूतों या तर्कों से ही हो सकता था, वो उसके लिए पांच सॉलिड सुबूत के साथ दस अजीबोगरीब तर्क या कुतर्क भी जुटाते थे. प्रोफेसर के संधि विच्छद भी कमाल होते थे, जैसे वो कहते थे कि क्रिश्चिएनिटी य़नी कृष्ण नीति या फिर प्रोफेसर का तर्क कि वेटिकन वैदिक शब्द वाटिका से बना था, इस्लाम यानी ISHALAYAM था यानी ईश्वर का घर था तो अब्राहम ब्रह्मा से बना था.

प्रोफेसर ओक ने ताजमहल को मूल इमारत ना मानकर तेजोलय महादेव मंदिर की मॉडीफाइड बिल्डिंग माना है, यानी किसी और इमारत को तोड़कर उसके स्थान पर उसी के मलवे से बनाई गई इमारत. उनके तर्क हैं किसी मकबरे को महल नाम क्यों दिया गया? अगर मुमताज महल से लिया गया तो मुम कहां गया? फिर खाली ताजमहल क्यों कहा गया? ताजमहल का मकबरा क्यों नहीं कहा गया? जब मुमताज की याद में था तो इसके अंदर बाकी लोगों की कब्रें क्या कर रही हैं? हंसी की बात है जिस ताजमहल को मलिका मुमताज की कब्र के लिए बनाया गया था, उसी में बाद में एक नौकरानी तक की कब्र बना दी गई? 

नेशनल जियोग्राफिक के वीडियो के आधार पर प्रोफेसर ओक ने दावा किया कि इस्लाम में किसी भी मृत देह को सुपुर्द ए खाक करना बेहद जरूरी है, तो मुमताज को क्यों नहीं किया गया? मुमताज की कब्र के नीचे कब्र है और उसके नीचे एक फाउंडेशन और फिर एक कुंआ, जमीन यानी खाक में तो देह मिली नहीं? किसी भी किताब में मुमताज के मरने की तारीखें क्यों अलग अलग लिखी हैं, ये कहीं नहीं बताया गया कि बुरहानपुर से मुमताज की लाश को कब ताजमहल में दफनाया गया? 

जब ताजमहल शाहजहां ने बनवाया तो उसका जिक्र बाबर की बेटी गुलबदन बेगम ने एक रहस्यमयी इमारत की तरह क्यों किया? मुमताज की मौत के बाद ही जब विदेशी यात्री पीटर मुंडी भारत आया तो उसने बन रहे ताजमहल की इतनी तारीफ क्यों की, जबकि एक साल में तो जमीन पर शायद ही कोई ढंग से स्ट्रक्चर खड़ा हुआ होगा? पीटर मुंडी 1632 में आगरा आया था, भारत में 1934 तक रहा था। 1632 में तो ताजमहल बनना शुरू हुआ था, पीटर लिखता है, ”The solid gold rail around the tomb (afterwards replaced by a network of marble) was already completed by 1632.”

ये थोड़ा चौंकाने वाली बात है कि कुछ ही दिनों या महीनों के काम में मुमताज की कब्र जो कि बुरहानपुर से लाई गई थी, उसके चारों तरफ गोल्ड रैलिंग लगवा दी गई. यही वजह थी कि प्रोफेसर पीएन ओक ने अपनी किताब में इसे मुद्दा बना लिया गया. जरुर पहले से कुछ निर्माण रहा होगा, वरना इतनी तेजी से काम कैसे होता कि पीटर मुंडी ताजमहल की इतनी तारीफ करता, वो भी निर्माण शुरू हुए कुछ ही दिन या महीने हुए होंगे. इतने वक्त में तो नीवें भरना भी आसान नहीं था, नक्शा बनाने में भी समय लगा होगा. ओक ने ये सवाल भी उठाया है कि 22 साल तक ताजमहल बनता रहा तो उसका निर्माण कार्य का ब्यौरा, किसी भी साल के लेखे जोखे या किसी किताब में क्यों नहीं है? अगर ताजमहल इतनी ही मजबूत इमारत थी औरंगजेब ने इसकी मरम्मत क्यों करवाने के आदेश दिए?

प्रोफेसर ओक के ज्यादातर तर्क या सवाल ताजमहल को एक हिंदू मंदिर साबित करने को लेकर हैं. जानकार मानते हैं कि ये तो सही है कि जयपुर के महाराज जय सिंह के कब्जे में वो जगह थी, और शाहजहां की उससे उस जगह को लेकर कोई डील हुई थी. लेकिन प्रोफेसर ओक का ये कहना वो तेजो महालय यानी शिवमंदिर ही था, इसका होना या ना होना, दोनों ही पक्ष में कोई सुबूत नहीं है, या जानकारी नहीं है। फिर भी प्रोफेसर के उसको हिंदू इमारत साबित करने के पीछे कुछ तर्क हैं, ताजमहल एक अष्टकोणीय इमारत है, हिंदू मंदिर इसी तरह बनते आए हैं, आठों दिशाओं का ध्यान रखा जाता है.

इसके पीछे प्रोफेसर ओक ने जावा के प्रम्बनन मंदिर कॉम्पलेक्स का उदाहरण दिया है. ताजमहल के शिखर पर कलश में नारियल दिखा साफ लगता है, तो नीचे की तरफ उलटे कमल के फूल गुदे हैं. प्रोफेसर के मुताबिक इससे साफ पता चलता है कि ये हिंदू इमारत थी. प्रोफेसर ने ये भी लिखा कि आगरा शहर शिव की पूजा का बड़ा केन्द्र था, आगरा के हर कौने पर एक एक शिव मंदिर बना हुआ है, ऐसे पांच मंदिर कैलाश, बल्केश्वर, मनकामेश्वर, राजेश्वर और पृथ्वीनाथ पांच बड़े मंदिर हैं. ऐसे में तेजोलय महादेव मंदिर भी हो सकता है, सावन के सोमवार में इन मंदिरों में भारी पूजा होती है.

हालांकि ये भी दावा किया जाता रहा है कि इस्लामिक शासकों की कुछ इमारतों पर हिंदू चिह्न मिलते हैं तो ये इस वजह से भी होता है कि उसमें ज्यादातर हिंदू कारीगरों ने काम किया था. बताया जाता है कि कुरान में जन्नत की जो तस्वीर खींची गई है, ताजमहल वाली जगह किले से देखने पर बिलकुल वैसी ही लगती भी थी, मंटोला जो अब नाला बन चुका है कभी नदी थी, तो ये संगम प्वॉइंट था. फिर भी जानकार मानते हैं, “सालों तक मगज मारने के बाद भी प्रशासन या एएसआई ताजमहल के बंद पड़े भाग को खोलने को तैयार नहीं है, उसके अंदर कोई ना कोई राज तो छिपा है.“

प्रोफेसर ओक ने भी अपनी किताब में दावा किया है कि कब्रों के ठीक नीचे शिवलिंग है, ओक का तो ये तक दावा है कि मुमताज अपनी कब्र में कभी दफन की ही नहीं गई. ओक का कहना है कि अगर ताजमहल वाकई में एक मकबरा था तो ये 22 कमरे नीचे और पूरे कैम्पस में ये सैकड़ों कमरे क्यों बनाए गए? ये तो महल में बनाए जाते हैं. ये पूरा कैम्पस सील क्यों किया गया है. ओक का ये तर्क भी दमदार है कि ताजमहल में छोटी सी बिल्डिंग है नक्कारखाना, यानी म्यूजिक हाउस, आखिर कब्र में सोए लोगों को म्यूजिक की क्या जरूरत थी? ये तो मंदिरों में होता है ताकि सुबह और शाम आरती या त्यौहारों पर म्यूजिक बज सके. ओक ने ताजमहल के गाइडों के उन किस्से कहानियों पर भी सवाल उठाए हैं कि लालकिले में वो टूरिस्ट्स को एक छोटा सा शीशा एक छेद में लगाकर दिखाते हैं कि यहां शाहजहां को बंद किया गया था और इस शीशे से वो ताजमहल देखता था.

ओक का कहना था कि शाहजहां को तहखाने में कैद किया गया था और इस शीशी में ऐसा कुछ नहीं दिखता, नंगी आखों से ताज बेहतर दिखता है. ओक ने अपनी किताब में बताया है कि ये तो दरअसल 1930 में एएसआई के एक चपरासी इंसा अल्ला खां की गढ़ी कहानी है और उसने एक शीशे से किसी को दिखाया और भेड़ चाल शुरू हो गई. ओक ने एक अमेरिकी संस्था द्वारा की गई कार्बन डेटिंग के नतीजों की मदद से भी सवाल अपनी किताब मे उठाए कि जो लकड़ी ताजमहल की नींव में लगी है, उसकी उम्र ताजमहल के बनने की तारीख से पांच सौ साल पहले की निकली थी.

इसके साथ ही उसने मुमताज की कब्र में धतूरे के पौधे को ओम की शक्ल में जिस तरह उकेरा गया है, उसको भी अपने सुबूत में शामिल किया है. कहने का मतलब ये है कि ओक ने इतने सारे साक्ष्य और तर्क पेश किए हैं, कि उनको आसानी से खारिज करना मुमकिन नहीं, ये अलग बात है कि तर्क हमेशा सत्य नहीं होते, लेकिन कोर्ट या सरकार के आदेश पर बाबरी की तरह इन आरोपों की जांच भी होती तो लोगों को मुंह बंद करना आसान हो जाता. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा और अभी तो छुटभैये नेता ही ताजमहल को लेकर तमाम दावे कर रहे हैं, कल को किसी पार्टी के एजेंडे में शामिल हो गया तो ताजमहल के सील पड़े कमरों का खुलना तय है और तब शायद कुछ और सच्चाई सामने आ सके.

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