लखनऊ : यूपी में समाजवादी पार्टी के झगड़ा में अब पिता-पुत्र आमने-सामने आ चुके हैं. मुलायम सिंह और यूपी के सीएम अखिलेश यादव के उम्मीदवारों की अलग-अलग सूची जारी करने, फिर अखिलेश और रामगोपाल को पार्टी से निकालने और फिर खुद मुलायम सिंह के पार्टी अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद नौबत पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त होते तक पहुंच गई है.
 
यह झगड़ा कुछ दिन का नहीं है बल्कि एक लंबे समय से यह पारिवारिक कलह पनप रही है. इस तनातनी की शुरुआत से अब तक राजनीतिक गलियारों से लेकर विश्लेषकों के बीच इसके कई राजनीतिक और निजी कारणों के अनुमान लगाए जा रहे हैं. 
 
पहले चाचा-भतीजे और अब पिता-पुत्र के इस समाजवादी झगड़े को दो पीढ़ियों का संघर्ष भी बताया जा रहा है. मुलायम और ​अखिलेश के बीच दूरियों की चर्चा पहले से होती रही हैं. अखिलेश यादव साल 2014 से अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुटे हैं. 
 
यूपी के साढ़े चार सीएम 
इसमें कोई दो राय नहीं कि अखिलेश यूपी के मुख्यमंत्री होते हुए भी सरकार और पार्टी पर पूरी पकड़ नहीं रखते हैं. यह भी कहा जाता रहा है कि यूपी का एक सीएम नहीं बल्कि साढ़े चार सीएम हैं. इन चाढ़े चार में अखिलेश को आधा मुख्यमंत्री और मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, आजम खान व रामगोपाल को बाकी के चार सीएम माने जाते रहे हैं. 
 
 
इसका कारण यह रहा है कि अखिलेश के फैसलों को बाकी चार लोग किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करते रहे हैं. मुलायम सिंह यादव खुद कई बार अखिलेश सरकार को ठीक तरह से काम न करने के लिए डांट लगाते दिखे हैं. ऐसे में केवल राजनीतिक नहीं बल्कि निजी कारण भी इस घमासान की वजह हो सकते हैं. एक तरफ अखिलेश का मुख्यमंत्री होते हुए अपने पद के अनुरूप शक्ति पाने और अपने दम पर पार्टी को आगे ले जाने की चाह और दूसरी तरफ अपने ही सामने पले-बढ़े बेटे और भतीजे को खुद पर हावी होते देखना खटास का कारण बनना असंभव नहीं.
 
काम के तरीके में अंतर
मुलायम सिंह और अखिलेश के काम करने के तरीके में भी अंतर दिखता रहा है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मुलायम आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं को टिकट देते आए हैं और देना भी चाहते हैं. लेकिन, अखिलेश पार्टी की गुंडा छवि को बदलना चाहते हैं. मुलायम कई बार रेप को लेकर महिलाओं के लिए अपमानजनक बयान दे चुके हैं. वहीं, अखिलेश राज्य में महिलाओं के लिए हेल्पलाइन शुरू करते हैं. मुलायम धर्म और जाति की राजनीति की छवि को मजबूत रखना चाहते हैं लेकिन अखिलेश एक आधुनिक और तकनीक पंसद युवा की छवि बनाना चाहते हैं. 
 
मुलायम कई मौकों पर पार्टी में अपने योगदान को गिनाने से भी पीछे नहीं हटे हैं. शुक्रवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में मुलायम सिंह के बयान में भी इसकी झलक देखने को मिली थी. उन्होंने कहा था कि राम गोपाल अखिलेश का भविष्य खराब कर रहा है लेकिन अखिलेश यह नहीं समझ पा रहा है. कौन उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहता था? मैंने ये खुद किया. मैंने सोचा कि क्यों न यह अभी किया जाए. क्या पता बाद में मौका मिले या न मिले. उन्होंने कहा कि वह बताएं क्या किसी ने अपने बेटे के लिए इतनी बड़ी चीज की है. पूर भारत में और किसी भी पार्टी ने? क्या वह इन लोगों से कम यात्रा करते हैं? क्या कम लोगों से मिलते हैं. राम गोपाल ने अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर दिया. 
 
 
मुलायम ने यह भी कहा था कि उन्होंने कड़ी मेहनत करके इस पार्टी को बनाया था. क्या उस वह (अखिलेश) थे? वह कहा थे? उन्होंने अकेले समाजवादी पार्टी बनाई है. वह इसके फल खाना चाहता है जबकि मैंने मेहनत की है. इससे पहले गुरुवार को एक पत्रकार ने मुलायम से इस पर राय मांगी थी कि एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि बुजुर्ग नहीं नौजवान सपने देखते हैं. तब मुलायम ने जवाब दिया था क्या मैं आपको बुजुर्ग दिखता हूं. 
 
ऐसे तो अखिलेश भी समय-समय पर नेताजी को ही सर्वोपरि बताते आए हैं लेकिन अगर कारण पीढ़ियों का संघर्ष है, तो अब दोनों तरफ की खटास और कुंठाएं शर्म-लिहाज के परदे से बाहर आ चुकी हैं. हालांकि, कुछ भी दावे के साथ कहना संभव नहीं है. इसलिए इस समाजवादी झगड़े की हकीकत जानने के लिए भविष्य का इंतजार करना ही होगा. वहीं, इसके परिणाम यूपी चुनावों के बाद स्पष्ट हो जाएंगे.

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