नई दिल्ली. 500 और 1000 का नोट बंद होने बाद कैश निकालने पर पाबंदियों के बाद से विपक्ष की कई पार्टियों के नेता जोश में आ गए हैं. नीतीश कुमार तो पहले से ही 2019 की रेस में जुटे हैं लेकिन अब कभी उनके साथ दिखे अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी भी नेशनल ड्राइव पर निकल रहे हैं.
 
नरेंद्र मोदी के खिलाफ कभी ममता और केजरीवाल के नजदीक दिखे जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नोट बैन के बाद मोदी सरकार की तारीफ टाइप के मोड में दिखे. इस तारीफ के बीच ही दिल्ली में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल साथ-साथ सड़कों पर उतरे.
 
 
राजनीतिक तोड़-फोड़ बड़े मुद्दों पर होते रहे हैं. ऐसे ही परमाणु करार पर समाजवादी पार्टी ने ऐन मौके पर लेफ्ट फ्रंट को झटका दे दिया था. नीतीश की तारीफ के बाद से लोगों की नज़र इस बात पर लगी है कि कहीं लालू यादव के लोगों से नीतीश परेशान तो नहीं हो गए हैं कि एनडीए सरकार के उस फैसले की तारीफ कर रहे हैं जिसे पूरा का पूरा विपक्ष पानी पी-पीकर कोस रहा है.
 
खैर, नीतीश के राजनीतिक दोस्त केजरीवाल और ममता ने नोट बैन के बाद दिल्ली में सड़क पर उतरने का फैसला किया और उसके बाद दोनों नेताओं ने इसके खिलाफ देशव्यापी दौरा का ऐलान कर दिया है. खास बात ये है कि बिहार की राजधानी पटना में ममता बनर्जी धरना देंगी.
 
 
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के बाद पंजाब, गोवा और गुजरात का चुनाव लड़ने वाले हैं. इन तीनों राज्यों के नतीजे आने के बाद वो अपनी महत्वाकांक्षा की समीक्षा कर सकते हैं और फिर तीसरे मोर्चे के अंदर अपनी उपयोगिता को परख सकते हैं. 
 
लेकिन ममता बनर्जी भयंकर मोदी लहर में भी राज्य की 42 लोकसभा सीटों में अपनी संख्या 19 से 34 पर ले जाकर अपनी ताकत दिखा चुकी हैं. हाल के दिनों में ममता बनर्जी ने ट्वीटर पर हिन्दी में ट्वीट करना शुरू कर दिया है. राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वो हिन्दी में बोल रही हैं.
 
 
ममता बनर्जी को जानने वाले जानते हैं कि जब वो दार्जिलिंग के इलाके में जाती हैं तो नेपाली बोलती हैं और जब मिदनापुर के इलाके में जाती हैं तो संथाल बोलती हैं. लोगों से कनेक्ट होने की उनकी इस लालसा ने उन्हें अब हिन्दी की तरफ खींच लिया है तो उसका राजनीतिक मकसद है. वो मकसद है राष्ट्रीय नेता बनने का. पीएम बनने का.
 
सूत्रों का कहना है कि ममता ने बांग्ला से हिन्दी वाली डिक्शनरी खरीद ली है और अपनी हिन्दी को सुधारने के लिए एक टीचर भी खोज रही हैं जो उन्हें बेहतरीन हिन्दी बोलना सिखा सकें. इशारे साफ हैं- दीदी को अब दिल्ली करीब दिख रही है और उन्हें पता है कि बिना हिन्दी राज्यों को सेट किए दिल्ली की राह के रोड़े खत्म नहीं होंगे. इसलिए बिहार और यूपी उनकी लिस्ट में सबसे ऊपर हैं.
 
 
केजरीवाल नोट बैन के खिलाफ 1 दिसंबर को मेरठ, 8 दिसंबर को बनारस, 18 दिसंबर को लखनऊ, 20 दिसंबर को भोपाल, 22 दिसंबर को रांची और 23 दिसंबर को जयपुर में रैलियां करेंगे. ममता ने अभी बस दो कार्यक्रम बनाए हैं. 29 नवंबर को वो लखनऊ और 30 नवंबर को पटना में धरना देंगी.
 
दीदी लखनऊ में मुलायम सिंह यादव पर कोई रहम करेंगी, इसमें संदेह है क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में वो ममता को धोखा दे चुके हैं. ममता की देखने और सुनने वाली सभा पटना की होगी जहां वो नरेंद्र मोदी पर हमला करने के दौरान नीतीश कुमार को कितना डिस्काउंट देती हैं, इससे आने वाले दिनों के राजनीतिक समीकरण का संकेत मिल जाएगा.
 
 
कांग्रेस की चुनावी हालत में कोई सुधार ना होता देख विपक्ष के बाकी दलों को लगता है कि 2019 का चुनाव तीसरे मोर्चे के लिहाज से अहम साबित हो सकता है. इसलिए उस मोर्चे में शामिल होने की संभावना रखने वाले दलों के नेता अपनी-अपनी सीट और ताकत बढ़ाने में जुट रहे हैं. 
 
राजनीति में मामूली दिलचस्पी रखने वाले लोगों को भी ये पता है कि अगर किसी भी मोर्चे की सरकार बनेगी तो उसमें शामिल दलों में जिसके पास सबसे ज्यादा सांसद होंगे या जिस दल का साथ देने वाले छोटे दल ज्यादा होंगे, सरकार की बागडोर उस पार्टी और उसके नेता के ही हाथ में होगी. तो रेस शुरू है. नतीजे आने में ढाई साल लगेंगे. तब तक दांव लगाइए, पेंच लड़ाइए.
 
देखिए ममता बनर्जी के हिन्दी में किए गए कुछ ट्वीट
 

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