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Jagannath Rath Yatra: कौन थे मुस्लिम भक्त सालबेग? हर साल एक मजार पर क्यों रुकता है रथ, जानें पुरी रथयात्रा का अनोखा रहस्य

why jagannath rath stops at mazar: पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है, जो आज भी लाखों लोगों की आँखों में आँसू ला देता है और उनके दिलों को छू जाता है. हर साल जब भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ ‘नंदिघोष’ बड़ा डंडा (मुख्य मार्ग) से होकर गुजरता है, तो एक मज़ार के सामने आकर कुछ पल के लिए ठहर जाता है. पहली बार में यह बात थोड़ी हैरान कर सकती है, लेकिन इसके पीछे सदियों पुरानी आस्था, बेइंतहा मोहब्बत और अटूट विश्वास की एक ऐसी दास्तान है जो यह साबित करती है कि ईश्वर के दरबार में जात-पात या धर्म नहीं, सिर्फ और सिर्फ सच्चा प्रेम मायने रखता है.

आइए जानते हैं कि आखिर कौन थे भक्त सालबेग और क्यों भगवान का रथ आज भी उनकी मज़ार पर रुकता है:


By: Shivani Singh | Published: July 20, 2026 8:44:38 PM IST

जानिए पुरी रथयात्रा का वो भावुक कर देने वाला रहस्य, जब हज़ारों लोगों के खींचने पर भी नहीं हिला भगवान जगन्नाथ का रथ. आखिर क्यों सदियों से एक मज़ार पर ठहरते हैं प्रभु? - Photo Gallery
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कौन थे भक्त सालबेग?

बात 17वीं सदी की है. सालबेग एक बेहद मशहूर कवि और भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे. उनके पिता लाल बेग एक मुगल सूबेदार थे और माँ एक हिंदू ब्राह्मण महिला थीं. बचपन से ही सालबेग ने अपनी माँ से भगवान जगन्नाथ की कहानियाँ सुनी थीं.

कहते हैं कि एक बार युद्ध के मैदान में सालबेग बुरी तरह घायल हो गए. जब हकीमों और दवाइयों ने हाथ खड़े कर दिए, तब उनकी माँ ने उनसे कहा कि वे एक बार सच्चे दिल से जगन्नाथ जी का नाम लेकर देखें. सालबेग ने ऐसा ही किया और एक चमत्कार की तरह वे बिल्कुल ठीक हो गए. बस, इसी मोड़ से उन्होंने अपना पूरा जीवन 'कालिया' (जगन्नाथ जी) के चरणों में समर्पित कर दिया.

जगन्नाथ रथ यात्रा - Photo Gallery
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जब मंदिर के दरवाजे बंद हुए, तो रास्ते खुल गए

सालबेग जब अपने आराध्य के दर्शन के लिए पुरी पहुंचे, तो मुस्लिम होने की वजह से उन्हें मंदिर के भीतर जाने की इजाज़त नहीं मिली. इस बात से उनका दिल तो बहुत दुखा, लेकिन भगवान के प्रति उनकी दीवानगी रत्ती भर भी कम नहीं हुई. उन्होंने तय कर लिया कि अगर वे मंदिर नहीं जा सकते, तो क्या हुआ... जब उनके प्रभु खुद रथ पर सवार होकर प्रजा से मिलने बाहर आएंगे, तब वे सरेआम उनके दर्शन करेंगे.

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जब भक्त के लिए ठहर गए भगवान

एक बार की बात है, सालबेग वृंदावन से पुरी लौट रहे थे, लेकिन रास्ते में उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई. उन्हें लगा कि इस बार वे समय पर पुरी नहीं पहुँच पाएंगे और रथयात्रा में अपने प्रभु को देखने से चूक जाएंगे. तड़पकर सालबेग ने रास्ते से ही भगवान से गुहार लगाई-'प्रभु, जब तक मैं न पहुँचूँ, तब तक अपनी जगह से हिलना मत.'

और फिर जो हुआ, उसने इतिहास रच दिया. जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदिघोष' सालबेग की कुटिया के पास पहुँचा, वह अचानक वहीं रुक गया. हज़ारों लोग, हाथी और सैनिक मिलकर भी उस रथ को एक इंच आगे नहीं खिसका पाए. रथ के पहिए मानो ज़मीन में धंस गए थे.

जगन्नाथ रथ यात्रा - Photo Gallery
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जब भक्त के लिए ठहर गए भगवान

तभी मंदिर के पुजारियों को यह आभास हुआ कि भगवान यहाँ किसी के इंतज़ार में खड़े हैं. कुछ ही देर में जैसे ही सालबेग हाँफते-काँपते वहाँ पहुँचे और रोते हुए अपने प्रभु को निहारा, रथ खुद-ब-खुद आगे बढ़ गया.

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा - Photo Gallery
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आज भी निभाई जाती है यह परंपरा

सालबेग के दुनिया से जाने के बाद, उसी जगह पर उनकी एक मज़ार बनाई गई. तब से लेकर आज तक, हर साल रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ कुछ देर के लिए सालबेग की मज़ार के सामने ज़रूर रुकता है.

इस दौरान वहाँ सालबेग के लिखे भावुक भजन गाए जाते हैं. यह खूबसूरत परंपरा सदियों से चीख-चीख कर इंसानियत को बस एक ही संदेश दे रही है—भगवान के लिए कोई पराया नहीं होता, वे सिर्फ सच्चे प्रेम और समर्पण के भूखे हैं.