Pitru Paksha 2026: गया नहीं जा पाएंगे? पितृपक्ष में 8 जगहों पर भी कर सकते हैं पिंडदान, पौराणिक मान्यताओं में बताया गया है खास महत्व!
Pitru Paksha 2026: सनातन संस्कृति और हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में पितृ ऋण चुकाने और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान व तर्पण को सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना गया है. यूं तो बिहार का गया जी क्षेत्र पिंडदान के लिए सर्वोपरि माना जाता है, जहां भगवान विष्णु स्वयं ‘गयासुर’ के रूप में उपस्थित हैं, लेकिन हमारे पुराणों जैसे गरुड़ पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण और स्कन्द पुराण में इसके अलावा भी कई ऐसे पवित्र तीर्थों का विस्तार से वर्णन मिलता है जहां पिंडदान करने से पितरों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब गया जाना संभव न हो या फिर विशेष कामनाओं और अकाल मृत्यु जैसी स्थितियों से मुक्ति के लिए इन दिव्य स्थलों का विधान बताया गया है. उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी काशी से लेकर उत्तराखंड की बर्फीली वादियों में स्थित बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल तक, ऐसे कई पावन स्थल हैं जिनका उल्लेख महाकाव्यों और पुराणों की कथाओं में मिलता है. इन जगहों पर तर्पण करने मात्र से जन्मांतर के बंधन और पितृ दोष कट जाते हैं. आइए जानते हैं उन प्रमुख 8 पावन तीर्थस्थलों और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में विस्तार से.
वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश
पुराणों के अनुसार भगवान शिव की नगरी काशी को मोक्ष की पूरी राजधानी कहा गया है. यहां गंगा तट पर स्थित मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाट पर पिंडदान करने का विशेष महत्व है. गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि काशी में मरने वाले या यहां तर्पण करने वाले जीवों को सीधे बाबा विश्वनाथ के हाथों तारक मंत्र मिलता है. इसके अलावा काशी का 'पिशच मोचन कुंड' भी प्रसिद्ध है, जहां अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए विशेष श्राद्ध कर्म किया जाता है.
प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश
गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के पावन त्रिवेणी संगम पर किया गया पिंडदान पितरों को अनंत काल के लिए तृप्त कर देता है. पद्म पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, प्रयाग को 'तीर्थराज' यानी सभी तीर्थों का राजा कहा गया है. यहां संगम तट पर तर्पण करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की कृपा प्राप्त होती है और पूर्वजों के तमाम पाप नष्ट हो जाते हैं.
हरिद्वार, उत्तराखंड
देवभूमि उत्तराखंड का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हरिद्वार का धार्मिक इतिहास वेदों जितना ही पुराना है. यहां हर की पैड़ी और विशेषकर 'नारायणी शिला' पर पिंडदान करने का विधान है. कथाओं के अनुसार, यहां पिंडदान करने से विशेष रूप से उन पूर्वजों को अकाल मृत्यु, दुर्घटना या जहर से हुई मौतों से मुक्ति मिलती है जो भटक रहे होते हैं. गरुड़ पुराण में हरिद्वार को मायापुरी क्षेत्र बताते हुए पितृ कर्म के लिए अत्यंत फलदायी कहा गया है.
देवप्रयाग, उत्तराखंड
अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित देवप्रयाग का सनातन धर्म में ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों दृष्टियों से बड़ा महत्व है. रामायण और पुराण कथाओं के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अपने पिता राजा दशरथ का मोक्ष कर्म और तर्पण इसी पवित्र स्थान पर किया था. मान्यता है कि देवप्रयाग में तर्पण करने से मनुष्य जन्म-जन्मांतर के बंधनों और पितृ ऋण से पूरी तरह मुक्त हो जाता है.
बद्रीनाथ, उत्तराखंड
उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित 'ब्रह्मकपाल शिला' को सभी पिंडदानों का अंतिम और सर्वोच्च पड़ाव माना जाता है. स्कन्द पुराण के अनुसार, यहां पिंडदान करने का पुण्य गया से भी आठ गुना अधिक माना गया है. पौराणिक कथा है कि भगवान शिव द्वारा ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिए जाने पर उन पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लग गया था, जो इसी स्थान पर आकर उतरा था. इसके अलावा महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने अपने स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए यहीं तर्पण किया था. यहां एक बार पिंडदान हो जाने के बाद अन्यत्र कहीं श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती.
उज्जैन, मध्य प्रदेश
भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन (अवंतिका) में शिप्रा नदी के तट पर पितरों की शांति के लिए पिंडदान किया जाता है. स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है. मान्यता है कि क्षिप्रा नदी के तट पर श्राद्ध करने से पितृगण न केवल तृप्त होते हैं, बल्कि वे अपने वंशजों को सुख, शांति और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. यहां पितृपक्ष के दौरान दूर-दूर से लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आते हैं.
मथुरा, उत्तर प्रदेश
भगवान कृष्ण की क्रीड़ा स्थली मथुरा में यमुना नदी के विभिन्न घाटों, विशेषकर ध्रुव घाट पर पिंडदान करने का बड़ा विधान है. श्रीमद्भागवत महापुराण और वाराह पुराण के अनुसार, ब्रजमंडल की पावन भूमि पर तर्पण करने से मनुष्य को भौतिक संतापों से मुक्ति मिलती है. यमुना जी के तट पर किए गए इन धार्मिक अनुष्ठानों से भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और पितरों का लोक सुधर जाता है.
कुरुक्षेत्र, हरियाणा
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर स्थित 'पिहोवा तीर्थ' और 'सन्निहित सरोवर' को महाभारत काल से भी प्राचीन पिंडदान स्थल माना जाता है. वायु पुराण और महाभारत के वन पर्व में इस बात का उल्लेख है कि महाभारत के भीषण युद्ध के बाद मारे गए योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए यहां बड़े पैमाने पर तर्पण और पिंडदान किए गए थे. आज भी यहां पितृपक्ष के अवसर पर देश के कोने-कोने से लोग आकर अपने पितरों का पिंडदान करते हैं.