Citizenship Amendment Bill 2019: सोमवार को लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल 2019 (CAB) को नरेंद्र मोदी सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने पेश किया. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लेफ्ट, टीएमसी के विरोध के बावजूद एनडीए यह बिल आसानी से पास करवाने में कामयाब हो गया. हाल ही में बीजेपी से अलग हुई शिवसेना ने भी इस बिल के पक्ष में वोट किया. लेकिन एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो इस बिल का विरोध कर रहा है. पूर्वोत्तर के राज्यों में यह विरोध प्रदर्शन ज्यादा उग्र है. असम, मणिपुर, मिजोरम जैसे राज्यों में लोग सड़कों पर हैं. पांच तस्वीरों के माध्यम से बेहद आसान भाषा में जानिए क्या है नागरिकता संशोधन बिल, क्यों हो रहा है इसका विरोध, क्या हैं आगे कानूनी अड़चनें. 

क्या है नागरिकता संशोधन बिल 2019 नागरिकता संशोधन बिल 2019 मूल नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन कर बना है. इसी कानून के जरिए तय होता है कि भारत में किसी व्यक्ति को नागरिकता कैसे मिलती है और किन स्थितियों में नागरिकता छीनी जा सकती है. इस बिल के जरिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक यानी हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई, पारसी धर्मावलंबियों को भारत की नागरिकता देने की राह आसान की गई है. पहले भारत की नागरिकता के लिए 11 साल यहां रहना जरूरी था लेकिन इस बिल के पारित होने के बाद छह साल भारत में बिताने के बाद ऐसे अप्रवासी भारतीय नागरिकता के योग्य हो जाएंगे.

विपक्ष क्यों कर रहा है नागरिकता संशोधन बिल का विरोध? कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ हैं. विपक्ष का तर्क है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांत पर बना है. संविधान का आर्टिकल 14 देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है. विपक्ष का कहना है कि सरकार धर्म के आधार पर भेदभाव कर रही है. यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.

एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में पुरजोर तरीके से इस बिल का विरोध किया इतना ही नहीं अपने भाषण के अंत में उन्होंने महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए बिल की कॉपी फाड़ दी. ओवैसी ने कहा कि यह कानून भारत में एक और विभाजन कराने की भूमिका तैयार करता है. उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह की तुलना हिटलर से कर दी जिसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने इसे कार्यवाही से हटवाया.

पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग क्यों कर रहे हैं इस बिल का विरोध? पूर्वोत्तर के राज्यों खासकर असम में इस बिल का विरोध काफी व्यापक स्तर पर हो रहा है. असम में एनआरसी की लिस्ट जारी हुई है जिसमें 19 लाख लोग लिस्ट से बाहर हैं. इसका विरोध पहले से ही असम में चल रहा था. अब नागरिकता संशोधन बिल के जरिए उनका आरोप है कि सरकार सभी बाहरियों को देश में बसाने की योजना बना रही है. असम के आंदोलनकारियों का कहना है असम आंदोलन भाषा के आधार पर हुआ था. हम असमिया भाषा बोलने वाले लोगों केे साथ हैं चाहे वो किसी भी धर्म के हों. इसके अलावा मणिपुर, मिजोरम जैसे राज्यों में भी जनता इस बिल के खिलाफ प्रदर्शऩ कर रही है.

क्या लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद भी रद्द हो सकता है यह कानून? नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा में पास हो चुका है. बुधवार को राज्यसभा में इस बिल को गृह मंत्री अमित शाह पेश करेंगे. अगर वहां भी यह बिल पास हो जाता है तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून सरकारी गजट में नोटिफाई होगा. इसके बाद यह कानून की रूप ले लेगा. लेकिन कई कानून के जानकारों के अनुसार इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी और वहां यह कानून रद्द भी हो सकता है. जानकारों के मुताबिक इस बिल में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) अनुच्छेद 15 (कानून के समक्ष सभी बराबर) के तहत इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. इस विधेयक में धार्मिक आधार पर भेदभाव को साबित करना आसान हो सकता है. यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.