नई दिल्ली: पिछले तीन दिनों से कठुआ गैंगरेप की गूंज पूरे देश में सुनने को मिल रही है. क्या नेता और क्या अभिनेता सभी एक सुर से कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ हुए गैंगरेप और मर्डर की निंदा कर रहे हैं. कोई इसे लोकतंत्र की हत्या बता रहा है तो कोई मानवता की दुआई दे रहा है. जाहिर है किसी के साथ भी बलात्कार जैसी घटना की ना सिर्फ कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए बल्कि बलात्कारियों को ऐसा सबक मिलना चाहिए जिससे ऐसी सोच रखने वालों की रूह कांप जाए. एक सभ्य समाज में बलात्कारियों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

लेकिन तकलीफ की बात ये है कि समाज की पढ़ी लिखी और तथाकथित प्रोग्रेसिव जमात भी इस तरह के मामलों को धार्मिक चश्मे से देखती है. शायद आपको ये पढ़ते हुए अच्छा ना लगे या आप मेरी बातों से सहमत ना हों. ऐसा हो सकता है और होना भी चाहिए क्योंकि एक आदर्श समाज में हर तरह के विचारों को जगह मिलनी चाहिए.

खैर बात कठुआ मामले की करते हैं. आठ साल की मासूम बच्ची को कुछ वहशी दरिंदे अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और उसकी निर्मम हत्या कर देते हैं. जिस किसी ने भी इस खबर को पढ़ा उसे जरूर दुख हुआ होगा. मन ही मन उन रेपिस्टों को गालियां भी दी होगी. पुलिस पर सवाल उठाए होंगे. प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया होगा. आरोपियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने की मांग की होगी. जो होनी भी चाहिए. लेकिन मामला तब गलत दिशा में चला गया जब इसे हिंदू-मुसलमान के चश्में से देखा जाने लगा. कुछ हिंदू संगठन आरोपियों के समर्थन में खड़े हो गए और उन्हीं को आधार बनाकर कहा जाने लगा कि हिंदू ऐसे अपराधियों का समर्थन कर रहे हैं जिन्होंने दूसरी धर्म की मासूम बच्ची का बलात्कार किया. हिंदू धर्म? आखिर एक ग्रुप पूरे हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कैसे करने लगा?

क्यों आपको लगने लगा कि हिंदू हर हिंदू के हर गुनाह में उसके साथ खड़ा है? मामला जम्मू-कश्मीर का है तो ज्यादा दूर क्यों जाएं. कश्मीर का ही उदाहरण लेते हैं. कश्मीर में आतंकियों के जनाजे में पाकिस्तानी झंडे लहराने वालों को आप मुसलमान नहीं बल्कि भटके हुए युवा कहते हैं तो फिर हिंदुओं के एक गुट के विरोध को सारे हिंदूओं के विरोध के तौर पर कैसे देख सकते हैं? जब कश्मीर में पाक झंडों के साथ हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगते हैं और कश्मीरी पंडितों की पूरी की पूरी बस्ती उजाड़ दी जाती है, उनका कत्ल कर दिया जाता है और तब आपको उसमें हिंदूओं के खिलाफ साजिश नजर नहीं आती तो फिर एक रेप की घटना आपको दूसरी कौम के लिए हिंदूओं की साजिश कैसे नजर आती है?

दरिंदगी का शिकार हुई आठ साल की मासूम के साथ जो हुआ वो निंदनीय है. घोर निंदनीय है. लेकिन निंदनीय असम की वो रेप घटना भी है जिसमें पांचवी क्लास में पढ़ने वाली 12 साल की एक बच्ची का रेप कर उसे जिंदा जला दिया जाता है और आरोप लगता है जाकिर हुसैन उसके दो भाईयों पर. मेरा सवाल है कि इस इस घटना पर इतना हो हल्ला क्यों नहीं? आपने किसी नेता-अभिनेता का ट्वीट देखा? किसी टीवी पर इस मामले पर बुलेटिन चलता देखा? कहीं हैशटैग, कहीं कैंडल मार्च? कुछ याद पड़ता है क्या? क्या आपको ये घटना या याद भी है? बहुत जोर देने पर शायद याद आ भी जाए कि कहीं सरपट भागते बुलेटिन में ये खबर देखी हो या फिर कहीं अखबार के किसी पन्ने के किसी कोने में हेडलाइन पर नजर पड़ गई हो. लेकिन क्या फर्क पड़ता है. ऐसी घटनाएं तो हर रोज होती है. हर रोज तो कैंडल मार्च नहीं हो सकता ना. हर रोज तो आत्मा नहीं जाग सकती. हर रोज तो समाज को नहीं कोसा जा सकता. हर बार मरने वाली बच्ची अल्पसंख्यक समाज की तो नहीं हो सकती जो मन पसीजे.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि आईटीवी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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