नई दिल्ली. हम पिछले दो दशकों से लगातार न्यायिक सक्रियता और उसकी सुस्ती को देख रहे हैं। अचानक अदालतें किसी बात पर काफी सक्रिय हो जाती हैं, तो कभी संकट गुजरने के बाद जागती हैं। कभी वे इतनी सुस्ती से काम करती हैं कि “अब पछताये होत का, जब चिड़िया चुग गई खेत”, कहावत चरितार्थ होती है। कई बार अदालतें मौलिक अधिकारों की रक्षा के अपने कर्तव्य को भी भूल जाती हैं।

पीड़ित, अदालतों की चौखट पर ही दम तोड़ देता है

हमने बीते दिनों ये हालात भी देखे हैं कि पीड़ित, अदालतों की चौखट पर ही दम तोड़ देता है या फिर आत्महत्या कर लेता है मगर उसे न्याय नहीं मिलता। आपको 21वीं सदी के दो दशकों में न्यायिक सक्रियता के कई उदाहरण मिलेंगे, जिनको देखकर यह सवाल उठने लगा था, कि क्या कार्यपालिका और विधायिका की आवश्यकता खत्म हो गई है? किसी भी मामले में अचानक अदालतों के ऐसे आदेश आते थे, कि कार्यपालिका की स्थिति असहज हो जाती थी।

इसके लिए कभी जनहित याचिकाओं (पीआईएल) का सहारा लिया जाता था, तो कभी स्वतः संज्ञान। यही वजह रही कि उस वक्त तमाम कार्य और योजनायें रुकीं, जिसका नुकसान बाद में जनता को भुगतना पड़ा। अदालतों ने अचानक खनन पर रोक लगा दी, नतीजतन कुछ कारपोरेट समूहों को भारी फायदा हुआ मगर सरकार और जनता को भारी नुकसान, जबकि खनन माफिया के नेक्सेस ने इसका बड़ा फायदा उठाया।

अदालत पहले तो तमाशाई बनी रही

इस वक्त हम अदालतों की अति सक्रियता की चर्चा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि जब किसानों ने लखीमपुर में मंत्रियों को काले झंडे दिखाने की कोशिश की तो उन्हें गाड़ियों से कुचल कर मार दिया गया। इस मामले में अभियुक्त देश के गृह राज्य मंत्री का पुत्र है। अदालत पहले तो तमाशाई बनी रही मगर जब विरोधी दलों और किसानों ने मोर्चा खोला, तो वह सरकार से सवाल-जवाब करने लगी। उसने कोई ठोस कदम उठाने के बजाय, सिर्फ तारीखें दीं। जब पेगेसेस मामले में पीआईएल हुई, तो वह खामोशी से एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने की बात करती रही मगर अब तक कोई कमेटी नहीं बनी। जब किसान आंदोलन चरम पर चढ़ा और सरकार बुरी तरह फंसी, तब अदालत बीच में आई और एक कमेटी बनाकर शांत हो गई। कमेटी ने क्या रिपोर्ट दी, किसी को नहीं पता।

जब किसान दिल्ली सीमा पर पिछले 10 महीने से अधिक वक्त से प्रदर्शन करते मर रहे थे, तब अदालत खामोश रही मगर जब सरकार और कुछ लोगों ने कहा कि इससे उनका काम धंधा रुक रहा है, तो अदालत को सख्त टिप्पणी करने में देर नहीं लगी। उसने यह भी देखने की कोशिश नहीं की कि सड़क किसानों ने नहीं, दिल्ली पुलिस ने बंद की है। अदालत ने यह निर्देश देना भी मुनासिब नहीं समझा कि इन किसानों को प्रदर्शन के लिए दिल्ली के भीतर कोई बड़ा मैदान या जंतर-मंतर पर अनुमति दे दें, जबकि इसी दौर में वहां सत्ता के करीबी तमाम संगठनों के कार्यक्रम हुए। उनमें खुलेआम सद्भाव बिगाड़ने के भाषण भी दिये गये।

देश में एनआरसी और सीएए के खिलाफ आंदोलन चल रहा था

हमें याद आता है कि जब देश में एनआरसी और सीएए के खिलाफ आंदोलन चल रहा था, तब अदालत अति सक्रिय हो उठी थीं। दिल्ली में दंगे हुए, तो तमाम पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों ने इसकी निष्पक्ष जांच तथा दोषियों पर कार्रवाई की मांग की, तब अदालतों ने सुस्ती दिखाई। उनकी सुस्ती के चलते सैकड़ों लोग मर गये और खरबों रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ। दिल्ली पूरे विश्व में कलंकित हुई मगर दिल्ली सरकार हो या केंद्र की सरकार दोनों ने चुप्पी साध ली। इन सभी मामलों में अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को बगैर पर्याप्त सबूतों के जेल में डाल दिया गया, जबकि आरोपी बहुसंख्यक बेखौफ घूमते रहे।

आपको यह भी याद होगा कि यूपीए सरकार के दौरान दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ के आयोजन में घोटालों के आरोप लगे थे। अदालतों ने अति सक्रियता दिखाई। तत्कालीन अफसरों से लेकर राजनेताओं को आरोपों में घेरा गया। इसी तरह टूजी स्पेक्ट्रम और अन्य घोटालों के आरोप सरकार में शामिल तमाम दलों के नेताओं पर लगे, अदालतों के निर्देशों पर एफआईआर दर्ज हुईं मगर सभी में आरोपी इस आधार पर बरी हुए कि उन्होंने कोई अपराध किया ही नहीं था। टूजी स्पेक्ट्रम मामले में तो अदालत में यह बात भी सामने आई कि यह तो घोटाला ही नहीं था, बल्कि एक अनुमान था। इसी तरह हम पहले भी बोफोर्स के 64 करोड़ दलाली कांड को देख चुके हैं, जिसकी जांच में 250 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद कहा गया कि कोई दलाली हुई ही नहीं। मतलब साफ है कि सभी आरोप सिर्फ सियासी फायदे के लिए लगे थे। ऐसे मामलों में अदालत ने झूठे आरोप लगाने और गलत जांच करने वालों को दंडित भी नहीं किया। यहां अदालतें सुस्त हो गईं।

राफेल खरीद सौदे के मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगे

हमने देखा है कि राफेल खरीद सौदे के मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगे मगर उसकी जांच को भी अदालत तैयार नहीं हुई। जो दस्तावेज आरोपों के साथ सामने आए, उनकी भी जांच नहीं कराई गई। यही नहीं अगर वो गलत थे, तो झूठे आरोप लगाने वालों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह पेगेसेस कांड में भी कोई जांच नहीं की गई। इसके अलावा एक दर्जन से अधिक बड़े घोटालों के जब आरोप सामने आये, तो अदालतें सुस्त हो गईं। जब सत्ता के करीबियों और कुछ बड़े मीडिया कर्मी के अपराध के मामले आये, तो अदालते उन्हें रिहा कराने के लिए अति सक्रिय हुईं। वहीं, सत्ता पर सवाल उठाने वाले दर्जनों मीडियाकर्मी जेल में सड़ते रहे। हमारे देश की न्यायपालिका को विश्व में काफी सम्मान मिलता रहा है क्योंकि वह सत्ता के विरुद्ध कार्यवाही से डरती नहीं थी। आपको याद होगा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ उनके चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने का आरोप लगा था, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने भरी दुपहरी 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी को बगैर किसी सरकारी वाहन अकेले अदालत में पेश होने का आदेश दिया था। उन्होंने चुनाव भी निरस्त कर दिया। जनता पार्टी की सरकार आने पर जब इंदिरा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, तो अदालत ने उन्हें जेल भी भेजा था। हालांकि उनके निर्दोष पाये जाने पर अदालत ने गलत जांच आख्या देने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। 2020 में जब कोरोना महामारी के कारण लगे प्रतिबंधों के दौरान सैकड़ों प्रवासी मजदूर सड़कों पर मर रहे थे, तब अदालतें खामोश थी मगर जब सभी अपने ठिकानों पर पहुंच गये, तब वे सक्रिय हुईं। 2021 में जब लोग दवाओं और आक्सीजन की कमी से मर रहे थे, तब ऐसा ही हुआ। उन्होंने उस वक्त आंदोलनरत किसानों और जनता के मौलिक अधिकारों की फिक्र नहीं की। जब सरकार और सियासत सक्रिय हुई, तो अदालतें भी सक्रिय हो उठीं।

न्यायिक सक्रियता की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब विधायी शून्यता हो। कार्यपालिका अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल हो। संविधान के अनुच्छेद 142 में मानवाधिकारों और सामाजिक कल्याण की पूर्ति के लिए न्यायिक सक्रियता जरूरी है, न कि सत्ता की ढाल बनने के लिए। अति न्यायिक सक्रियता या उसकी उदासीनता दोनों ही घातक हैं। अदालत का काम न्याय करना है, न कि कानून-नियम बनाना और सरकारी कार्यों में अतिक्रमण करना। यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए घातक है। अदालतों को सभी संस्थाओं को निष्पक्ष और स्वतंत्रता से काम करने में मदद करनी चाहिए मगर लोक कल्याण और मौलिक अधिकारों की संरक्षा के लिए सदैव सक्रिय होना चाहिए। संविधान न तो किसी का हक मारने की किसी को अनुमति देता है और न ही अन्याय करने की। यह बात सत्तानशीनों और अदालतों को समझनी चाहिए।

जय हिंद!

(लेखक मुख्य संपादक-मल्टीमीडिया हैं।)

ajay.shukla@itvnetwork.com

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