यूपी के फतेहपुर जिले के हथगाम में एक युवक ने फांसी लगा आत्महत्या कर ली। पति की मौत से सदमें में उसकी नवविवाहिता ने भी चार दिन बाद खुदकुशी कर ली। युवक मुंबई स्थित एक कंपनी में कार्यरत था। महामारी के दौर में नौकरी चले जाने से मानसिक संताप में था। दिल्ली में स्वर्णिम भविष्य का सपना संजोये बेरोजगार इंजीनियर जरूरतें पूरी करने के लिए लुटेरा बन गया। बेरोजगारी देश में जिस तेजी से बढ़ रही है, उसकी परिणिति कमोबेश इसी तरह दिख रही है। इन हालात पर कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया। पिछले कुछ सालों के दौरान नौकरियों में कटौती और खाली पदों के न भरने की केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों से हालात बदतर हो गये थे। अब कोरोना महामारी के दौर में, जब अर्थव्यवस्था का ढांचा भरभराया तो नौकरियों के साथ ही अन्य रोजगार भी बरबादी के हालात में पहुंच गये। नतीजतन, निजी क्षेत्रों में 40 फीसदी से अधिक नौकरियों में कटौती कर दी गई। जो बचीं, उनमें वेतन-भत्तों में कटौती हो गई। सरकारी क्षेत्र में भर्तियां बेहद कम हुईं और लंबे समय से खाली पड़े लाखों पद या तो खत्म कर दिये गये या फिर उन्हें ठेके पर दे दिया गया। तमाम योग्य युवाओं की उम्र सीमा खत्म हुई और वे अयोग्य हो गये। अब जो हालात बन रहे हैं, उनमें हमारे बच्चों का भविष्य अंधकार में है।

सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस वक्त भारतीय इतिहास में बेरोजगारी सबसे अधिक है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के शोध से पता चलता है कि इस साल जुलाई में जो बेरोजगारी दर 6.95 फीसदी थी, वह अगस्त में बढ़कर 8.32 फीसदी हो गई। शोध में यह भी पता चला कि पिछले माह 10 लाख लोगों की नौकरियां गई थी। कोरोना की दूसरी लहर अप्रैल के आसपास 70 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था। अगस्त महीने में 15 लाख रोजगार, पिछले महीने के मुकाबले और कम हो गये। शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में बेरोजगारी में इजाफा हुआ है। सबसे ज्यादा बेरोजगारी ग्रामीण भारत में दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी और सरकारी नीतियों ने, बेरोजगारी बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर 9.78 फीसदी रही, जो जुलाई में 8.3 फीसदी थी। ग्रामीण बेरोजगारी दर भी बढ़कर 7.64 फीसदी हो गई, जो जुलाई में 6.34 फीसदी थी। नौकरी पेशा लोगों की तादाद लगातार घटी है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्र में 13 लाख से अधिक नौकरियां खत्म हो गईं। महामारी से डराया गया मगर सार्थक सरकारी समर्थन न मिलने से बाजार से नौकरियां खत्म होने लगीं। चौकाने वाली बात यह है कि जहां रोजगार दर गिरी है, वहीं श्रमिकों की संख्या में इजाफा हुआ है। इस वक्त 3.6 स्किल्ड करोड़ लोग काम की तलाश में भटक रहे हैं।

ब्रितानी हुकूमत से आजादी मिलने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने दर्जनों चुनौतियां थीं। उन्होंने प्राथमिकताएं तय कीं, और कहा कि हमें अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देनी होगी, जिससे समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज भी सुनी जाये। हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले। इसके लिए कृषि उत्पादन में हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। हर हाथ को रोजगार मिलना चाहिए, जिसके लिए कुटीर उद्योगों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र में भारी उद्योग और निगम स्थापित करना होगा। तकनीकी व्यवसायिक दक्षता में आत्मनिर्भरता बढ़नी चाहिए, जिसके लिए हमें उच्च शिक्षण संस्थान बनाने होंगे। लोगों को सेहतमंद रखने के लिए सस्ती अच्छी स्वास्थ सेवाओं के लिए मेडिकल कालेज और अस्पताल खड़े करने होंगे। हमें किसी वाद में नहीं फंसना है, क्योंकि हमें सबको समान रूप से मजबूत बनाना है। हमें बाजारवाद में नहीं फंसना, इसके लिए उन्होंने मिश्रित “सोशियो कैपिटल इकोनॉमी” पर काम किया। पूंजी जुटाने के लिए बैंकिंग और सामाजिक सुरक्षा के लिए इंश्योरेंस के क्षेत्र में सरकार ने कदम बढ़ाये। पंडित नेहरू ने ये सभी करने का संकल्प किया और कर दिखाया। यही कारण है कि उनके दौर को राष्ट्र निर्माण का काल माना जाता है। पंचवर्षीय योजनाओं ने देश को आत्मनिर्भर बनाकर हमें सशक्त किया। आज हमें, खाली खजाने के बाद भी कैसे आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा किया जाता है, यह पंडित नेहरू से सीखना चाहिए।

इस वक्त देश में करीब 40 करोड़ बेरोजगारों की फौज खड़ी है। हमारे यहां तीन तरह के बेरोजगार हैं, पूर्ण बेरोजगार, अर्द्ध बेरोजगार और मौसमी बेरोजगार। हमारी ढाई करोड़ बेटियां बेरोजगार के रूप में अपने नाम दर्ज करा रही हैं। लगभग 12.5 करोड़ प्रवासी मजदूर बेरोजगार हो गये हैं। अनियोजित उद्योगों में काम करने वाले 67 फीसदी लोग बेरोजगार होकर धक्के खा रहे हैं। आपको यह जानकर हैरत होगी कि ये हाल तब हैं, जबकि विभिन्न सरकारी विभागों में 80 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। सार्वजनिक उपक्रमों में छह लाख से अधिक लोगों के रोजगार छिन गये हैं। बैंकों में 4.5 लाख लोगों की नौकरियां खत्म हो गई हैं। सिर्फ केंद्र सरकार में ही 10.25 लाख स्वीकृत पद रिक्त हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 39 हजार पद खाली पड़े हैं, तो प्रशासनिक सेवाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के 42 हजार पद खाली हैं, जबकि सभी श्रेणी के एक लाख पद खाली हैं मगर इस पर राजनीतिक सत्ता बात नहीं करती है। आबादी के अनुपात में जो पद बढ़ने चाहिए थे, वह न बढ़ाकर संविदा और ठेके पर काम कराने की प्रथा सरकार ने बना ली है, जिससे कर्मचारी नहीं, गुलाम मिलें। देश में स्किल्ड डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या इस साढ़े तीन करोड़ से अधिक है। करीब सात करोड़ युवा रोजगार दफ्तरों में बेरोजगारों के रूप में दर्ज हैं। जिस तरह से साल दर साल बेरोजगारों की आबादी बढ़ रही है, उससे तय है कि चंद सालों में देश, बेरोजगार युवाओं का देश बन जाएगा। यही कारण है कि अब सरकार डिग्रियां लेकर चाय और पकौड़े बेच कर रोटी का जुगाड़ करने वाले को बेरोजगार नहीं मानती है। 65 फीसदी डिग्रीधारी युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। ऐसे ही करोड़ों युवा चंद रुपयों के लिए सियासी दलों के झंडे-डंडे लेकर ट्वीटर कैंपेन का हिस्सा बनने को मजबूर हैं। सरकार अपने प्रचार-प्रसार से लेकर तमाम कारपोरेट के लिए हजारों करोड़ खर्च करती है मगर सुरक्षित रोजगार उपलब्ध कराने के लिए नहीं सोचती है।

हमारा युवा देश, इन हालातों के चलते बेरोजगार भारत में तब्दील हो गया है। दुख तब होता है, जब ये युवा और सरकार इस समस्या से लड़ने के बजाय हिंदू-मुस्लिम, जाति, लिंग और क्षेत्र की से लड़ने में व्यस्त हैं। कुछ सियासी दलों को ये मुफीद लगता है, क्योंकि यह एक वोट बैंक बन जाता है। क्या कभी आपने सोचा है कि यही हालात रहे, तो चंद सालों बाद आपके बेटे-बेटियों का भविष्य अंधकार में होगा? वे क्या गुनाह करेंगे और क्यों न करें? इसका जवाब आपके पास भी नहीं होगा। सत्ताधारी दल अगर देश का हित चाहता है, तो उसको चाहिए कि वह सार्वजनिक उपक्रमों और निगमों-कंपनियों को बेचने के बजाय प्रोफेसनल्स के जरिए टॉरगेट बेस्ड चलाये। वह नये कल-कारखाने और उपक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में लगाये। कृषि उत्पादन आधारित उद्योग पंचायती व्यवस्था में स्थापित करे। पूंजीपतियों को भी प्रोत्साहित करें कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग लगायें। आबादी और सेवाओं के अनुरूप सरकार में नये पद सृजित किये जायें। आबादी नियंत्रण के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक स्वायत्ता देकर सशक्त करें। अच्छी सस्ती शिक्षा और स्वास्थ सेवा की व्यवस्था हो। ग्रामीण न्याय व्यवस्था बने। जब इस नीति पर काम होगा, तभी हर हाथ को काम भी मिलेगा और सुख-शांति भी। तब, हमारे वैदिक ध्येय मंत्र “ऊं सर्वे भवंतु सुखिनः। सर्वे संतु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यंतु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्”, पूर्ण हो सकेगा।

जय हिंद!

(लेखक मुख्य संपादक, मल्टी मीडिया हैं)

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