देश जब अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ, तब हम हर तरह से बदहाल राष्ट्र थे। देश की जीडीपी कुल 1.3 अरब डॉलर थी, जिसकी हिस्सेदारी दुनिया की अर्थव्यवस्था में 3.9 फीसदी थी। जीडीपी 1.8 फीसदी की दर से बढ़ रही थी। हमारी आबादी 36 करोड़ थी, जिसमें 70 फीसदी भुखमरी का शिकार थी। प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 274 डॉलर थी, तब अमेरिकी डॉलर करीब साढ़े तीन रुपये का था। हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि आधारित क्षेत्र का योगदान 59 फीसदी, तो उद्योगों का 13 फीसदी और सेवा क्षेत्र का 28 फीसदी था। देश में साक्षरता दर 12 फीसदी थी। देश वासियों की औसत उम्र 32 साल थी। हालात ये थे कि भुखमरी, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं से लाखों लोगों की मौत हर साल हो जाती थी। बहुजातीय और बहुधार्मिक राष्ट्र होने से जातीय और धार्मिक उन्माद की घटनायें होती रहती थीं। हमारी विविधता उस वक्त एक समस्या बनकर खड़ी थी, चाहे भाषा की हो या फिर खानपान और वेशभूषा की। पड़ोसी देशों के साथ अनसुलझे सीमा विवाद के कारण हमारे देश को चार युद्धों का सामना भी करना पड़ा। सैन्य शक्ति और संसाधनों के मामले में हम आश्रित राष्ट्र थे। विश्व हमें गुलाम देश की तरह ही देखता था। इन हालात से लड़ते हुए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, न सिर्फ देश को मजबूत किया, बल्कि वैश्विक जगत में सम्मानजक अग्रणीय स्थान भी दिलाया।

इन तथ्यों से आप समझ सकते हैं कि उस वक्त न तो हम क्रय शक्ति वाली जनसंख्या थे और न ही हमारे पास विज्ञान और तकनीत के विद्वानों की भरमार। हमारे पास न डॉक्टर थे और न संसाधन। न अच्छे शैक्षिक संस्थान ही थे। ऐसे में सवाल उठता है कि भुखमरी और बीमारी के शिकार देश को कोई शक्तिशाली देश सम्मान क्यों दे? हमारे प्रथम प्रधानमंत्री यह बात अच्छे से समझते थे। वह जानते थे कि अगर देश को विकास के पथ पर ले जाना है, तो उसके लिए अलग राह अपनानी होगी। उन्होंने वही किया भी, न तो कैपटलिस्ट अर्थव्यवस्था अपनाई और न ही समाजवादी। उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था का ढांचा तैयार किया, जिससे अमीर के धन से गरीब को आगे बढ़ाया जाये मगर बोझ किसी पर न पड़े। जिसे “सोशयो कैपटलिस्ट इकोनामी पॉलिसी” कहा गया। भले ही नेहरू सरकार ने सोमनाथ मंदिर का पुर्ननिर्माण कराया मगर उन्होंने कभी धार्मिक स्थलों में जाना उचित नहीं समझा। सभी धर्मों को सद्भाव के साथ लिया और उन्हें उनकी परंपरा के अनुसार कार्य करने की आजादी दी। उन्होंने धर्म या जाति की राजनीति को तवज्जो नहीं दी बल्कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की नीति को अपनाया। उन्होंने नवीन मंदिरों की स्थापना को लक्ष्य बनाया, जिसमें बड़े बांध, शैक्षिक संस्थान, उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम शामिल थे। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं और न्यायपालिका को मजबूत आवाज दी, जो उनके खिलाफ भी दहाड़ सकती थी। उसी बूते, हम आज छाती ठोकर कहते हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

पंडित नेहरू की विदेश नीति कभी किसी के पीछे चलने वाली नहीं रही, बल्कि वसुधैव कुटुंबकम की नीति पर आधारित थी। उन्होंने रूस से अच्छे रिश्ते होते हुए भी उसके गुट में शामिल न होने का फैसला किया। यही नहीं, वो अमेरिका के गुट में भी शामिल नहीं हुए। गुट निरपेक्ष राष्ट्रों के सम्मेलन की अगुआई कर वह उसके प्रमुख बने। यही वजह थी कि जब पंडित नेहरू अक्तूबर 1949 में पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका गये, तब तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी एस ट्रुमैन ने प्रोटोकॉल तोड़कर न सिर्फ उनकी अगवानी की बल्कि मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए अधीर भी हुए। उनकी दूसरी यात्रा भी कमोबेश इसी तरह रही। यह तब था, जबकि भारत का रूस सहित विश्व के अन्य विकसित देशों से भी सम्मानजनक संबंध बना हुआ था। नेहरू की नीति देशहित को ध्यान में रखकर बनी, न कि, भारत का नुकसान कराकर निज सम्मान के लिए। स्वतंत्रता के बाद, अधिकांश देशों के साथ हमारे सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित हुए। संविधान के अस्तित्व में आने के साथ एक दशक में भारत ने अफ्रीका और एशिया में यूरोपीय उपनिवेशों की स्वतंत्रता का पुरजोर समर्थन करके दर्जनों देशों का साथ हासिल किया। पाकिस्तान समस्या से सख्ती से निपटने के साथ ही चीन से दोस्ती बढ़ाकर अन्य पड़ोसी देशों में धाक जमाई, हालांकि चीन के धोखे के कारण काफी धक्का लगा मगर उसे संभाल लिया गया। रूस से सामरिक संबंधों के साथ ही इजरायल और फ्रांस से हमारे अच्छे रक्षा संबंध स्थापित हुए। हमने क्षेत्रीय सहयोग और विश्व व्यापार संगठन के लिए दक्षिण एशियाई एसोसिएशन में दमदार भूमिका अदा की। इससे विश्व में हमारी साख और धाक दोनों बनीं। नतीजतन हम तेजी से सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ सके और हमारे नागरिकों को विश्व में जगह मिली। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में भी पंडित नेहरू की बड़ी भूमिका रही।

इस वर्ष देश को आज़ाद हुए 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। कभी तीसरी दुनिया के देश से शुरू हुई हमारी अर्थव्यवस्था का सफर, आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक है। हम आबादी के मामले में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति हैं। क्रय क्षमता वाले युवा देशों में हमारा अग्रणीय स्थान है। अब हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी करीब 19 फीसदी है, जबकि उत्पादन में हम करीब 27 फीसदी हैं। सेवा क्षेत्र 54.3 फीसदी और व्यापरिक हिस्सेदारी 36.5 फीसदी है। इस वक्त हमारी प्रति व्यक्ति आय 1947 डॉलर है, जो कोरोना महामारी से पूर्व 2064 डॉलर थी। हमारे देश की जीडीपी दुनिया में सबसे तेज बढ़ रही है। मौजूदा वक्त में यह 2.38 लाख करोड़ की है। जब सब इतना अच्छा चल रहा हो, तब उसका लाभ प्राथमिकता के आधार पर अपने नागरिकों को दिया जाना चाहिए, मगर ऐसा नहीं हो रहा है। इसका लाभ चंद कारपोरेट घरानों और पूंजीपतियों को मिल रहा है। बीते वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक हमारे देश पर विदेशी कर्ज सालाना 2.1 फीसदी बढ़ कर 570 अरब डॉलर हो गया है। पिछले सात सालों की तुलना में इस वक्त देशवासियों पर कर्ज का औसत भी दोगुने से अधिक हो गया है, जो हमारी जीडीपी का 37.3 फीसदी है। आज हम विश्व के सबसे युवा आबादी वाले देश हैं, जिसके युवा विश्व के नीति निर्धारकों में शामिल हैं। इस माहौल में भी अगर वैश्विक मंच पर हमारी बात अनसुनी कर दी जाये। महाशक्तियां हमें सम्मान देने के बजाय अपमानित करने की कोशिश करें। सभी पड़ोसी देश हमारे विरोधियों के साथ खड़े हों, तो यह चिंता का विषय है। विश्व के तमाम बड़े देश, हमें लोकतांत्रिक मूल्य और मानवाधिकारों का पाठ पढ़ायें, तो यह हमें नीचा दिखाने जैसा है।

हम सभी को सोचना होगा कि हमारा सम्मान, हमारे देश और उसके नेताओं के सम्मान से है। हमारे नीति नियंताओं को गांधी-नेहरू की नीतियों को सलीके से समझना होगा। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देकर मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होना होगा। हमें सांप्रदायिकता और जातिवाद को खत्म करने की दिशा में काम करना होगा। जब हमारे घर में सब अच्छा होगा, तभी हम दूसरों को पाढ़ पढ़ा सकेंगे। झूठ सदैव वैश्विक मंच पर शर्मिंदा करता है, इसलिए हमें वास्तविकता को स्वीकार करके अपनी कमियां दूर कर आगे बढ़ने की नीति अपनानी होगी। हमारी विदेश नीति को मानवाधिकारों, धर्मनिरपेक्षता और भेदभाव रहित बनाने पर जोर देते हुए, परस्पर शक्ति और सामंजस्य के साथ तैयार करना होगा, जो नेहरू ने कर दिखाया था। जब हम यह नीति अपनाएंगे, तब मान-सम्मान स्वतः हमारे पास आएगा। तब हमारे शासनाध्यक्ष, स्टेट्समैन बनकर वैश्विक मंच पर अग्रणी सम्मान के साथ खड़े होंगे।

जय हिंद!

(लेखक चीफ एडिटर मल्टीमीडिया हैं।)

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