आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र का वर्णन करते हुए कहा है कि जब जनता मक्कारीपूर्ण कार्य करती है, तब राज्य, राजा सहित सभी को उसका भुगतान करना पड़ता है। उनका श्लोक “राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञ: पापं पुरोहित:। भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा”। आज के वक्त में यह श्लोक समीचीन है। इसमें स्पष्ट लिखा है कि राजा के गलत कर्मों के जिम्मेदार सलाहकार, मंत्री या फिर पुरोहित भी होते हैं। आचार्य कहते हैं कि पत्नी कोई गलत कार्य करती है, तो उसका जिम्मेदार पति भी होता है और उसी प्रकार पति की गलती का भुगतान पत्नी करती है। यदि कोई शिष्य गलत करता है, तो उसके कर्मों का बुरा फल गुरू को तथा गुरू के गलत कर्मों की सजा शिष्य को मिलती है। राजनीति को समझाते हुए चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से कहा था कि “युद्ध मे केवल सैन्य बल ही काफी नही बल्कि प्रजा के समर्थन व सूचना बहुत महत्व रखती हैं। राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा की खुशहाली के लिए काम करे, न कि अपने अहम के लिए। उन्होंने यह भी कहा है कि जब नागरिक ही भ्रष्ट आचरण करने लगे तो, उस राष्ट्र का पतन तय है।

इस वक्त देश तमाम संकटों में फंसा है। आर्थिक संकटों से गुजर रहे हमारे देश को गलत नीतियों और फिर महामारी ने संकटों के भंवरजाल में फंसा दिया है। देश के तमाम हिस्सों से विभिन्न जन आंदोलनों की गूंज सुनाई दे रही है। बेरोजगारी और महंगाई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना चुकी है। इन सब के बाद भी हमारी सरकारों के पास कोई सार्थक समाधान नहीं है। सत्तारूढ़ दल सहित सभी चुनावों को लेकर अधिक चिंतित हैं। निश्चित रूप से किसी भी सियासी दल की यही कोशिश होती है कि वह ऐन केन प्रकारेण सत्ता हासिल कर ले। सभी दल इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जनता के मत को लुभाने की कोशिश करते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि यही तो उनका उद्देश्य होता है। समस्या, तब होती है, जनता समझते बूझते हुए भी भ्रष्ट आचरण को अपनाती है। इन दिनों हम जहां भी जाते हैं, तमाम परिचित मिलते हैं और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। कई मदद की उम्मीद भी करते हैं। जब उनके क्षेत्र में बीते सालों में हुए विकास कार्यों पर चर्चा चलती है, तो यह कहकर पल्ला झाड़ते हैं कि सब एक जैसे ही हैं। किसी ने कुछ नहीं किया। न सड़कें बनीं और न व्यवस्था सुधरी। उद्योग धंधों का बुरा हाल है। पिछली सरकार में जो काम हो भी रहा था, वह भी इसमें चौपट हो गया है।

हम बहुत बार देखते हैं कि तमाम लोग सरकारी कामों के लिए जब राजधानी आते हैं, तो सीधे यही कहते हैं कि उनका काम किसी से करवा दो। अगर हम किसी अधिकारी या नेता से यह कहते हैं कि इनकी प्रार्थना को मेरिट पर जांच कर उचित मदद कर दीजिए, तो नाराज हो जाते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि हम किसी भी भ्रष्ट तरीके को अपनाकर उनकी मदद करें। उन्हें यह भ्रष्ट तरीका ही भाता है। ईमानदारी और मेरिट से वे खुद ही कुछ नहीं चाहते हैं। ऐसी संख्या बहुतायत में होती है। उलट, ऐसे लोग हमें ही ज्ञान देते हैं कि आखिर क्या मिलेगा, इस ईमानदारी से। मौका है, कुछ कमा लो, बना लो, नहीं तो कोई नहीं पूछेगा। जब उनसे काम धंधे और परिवार के बारे में बात होती है, तो वही कहते हैं, भ्रष्टाचार बढ़ गया है। बगैर रिश्वत कोई काम नहीं होता है। नेताओं के पास जाओ, तो उनका चढ़ावा अलग से। कुछ घटनायें भी बताने लगते हैं। जब चर्चा बढ़ती है, तो कहते हैं कि सरकार ने कुछ नहीं किया। न नौकरी है और न रोजगार। न उम्मीद का माहौल। विकास के नाम पर सिर्फ बंदरबांट हो रही है। पिछली सरकार, इनसे अच्छी थी। उसने बहुत काम किया था। तब सवाल पूछता हूं, फिर तो इस बार सत्तारूढ़ दल को वोट नहीं दोगे, तब कहते हैं कि नहीं ऐसा नहीं है, वोट तो इन्हीं को देंगे। क्यों, अरे ये लोग हमारे धर्म के हैं। इन्होंने दूसरे धर्म वालों को दबा दिया है। सब औकात में आ गये हैं।

सवाल वहीं खड़ा होता है, कि जब आपने वोट महिला सुरक्षा, विकास, रोजगार, सौहार्द-सहिष्णुता, सद्भाव और सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय के लिए दिया ही नहीं, तो फिर उसकी उम्मीद क्यों करते हो? अगर इसके लिए वोट दिया था, तो यह समीक्षा करके वोट क्यों नहीं देते, कि किस सरकार में भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता कम थी? किस सरकार में विकास का पहिया तेज चल रहा था और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की नीति पर काम हो रहा था? किस सरकार में रोजगार और सौहार्द-सद्भाव अधिक था? मगर नहीं, तब तो वही जनता भ्रष्ट तरीके से अपने काम को करवाना चाहती है। उसे मेरिट और पारदर्शी नीति समझ नहीं आती है। ऐसे लोग अदालत हो या सरकार सभी जगह भ्रष्ट पदाधिकारियों को साधते घूमते हैं। उनके आगे पीछे घूमकर, उनकी वाहवाही और सेवा में जुट जाते हैं। उन्हें ईमनादार अफसर, नेता और जज अच्छे नहीं लगते हैं। ईमानदार पत्रकारिता और मीडिया चाहते हैं मगर उसको सपोर्ट करने के बजाय दलाली करने वाले भाते हैं। वे जब ऐसा करते हैं, तो भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार सरकार या सत्तारूढ़ दल में नहीं आपके अंदर है। आप मक्कारी का चेहरा लगाये अपना स्वार्थ साधने के लिए कोई भी मार्ग अपनाने को तैयार बैठे हैं। दूसरों पर आरोप लगाकर अपनी मक्कारी और भ्रष्ट आचरण को छिपाने का प्रयास करते हैं। खुद को पीड़ित मानते हैं मगर सत्य उलट है।

अगर हम ईमानदार और स्वच्छ सरकार चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी सरकार सौहार्द और सद्भाव से काम करे। सांप्रदायिक तनाव के बजाय प्रेम और शांति स्थापित करे। योग्य लोगों को उनके अनुकूल रोजगार मिलें, तो हमारी जनता को बदलना होगा। उसे अपने काम के लिए किसी भ्रष्ट तरीके को अपनाने के बजाय मेरिट पर काम करना होगा। उसे किसी सिफारिश के बजाय, अपनी योग्यता पर भरोसा करना होगा। किसी सरकार या सत्तारूढ़ दल पर लांछन लगाने के बजाय खुद के गिरेबान में झांकना होगा। जब हमारे लोग मक्कारी छोड़ देंगे। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की मांग सत्ता और सियासी दलों से करने लगेंगे, तब सियासी दल भी मजबूरन जनता के लिए ही काम करेंगे। उस माहौल में विकास भी होगा और रोजगार भी मिलेंगे। महिलायें-बच्चे सुरक्षित रहेंगे। अगर ऐसा नहीं होगा, तो हम तो भोगेंगे ही, हमारे बाद हमारी अगली पीढ़ी और बुरे हालात में फंसेगी। तो सोचिये, समझिये और ईमानदारी से समीक्षा करके अच्छे प्रतिनिधि चुनिये। जो सबके लिए काम करे। जनहित में काम करने वालों को समर्थन दीजिए और जो न करे उसे उखाड़ फेकिये। सिर्फ लांछन और आरोप मत लगाइये।

जय हिंद!

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं।)

ajay.shukla@itvnetwork.com

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