अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी हुए एक महीना बीत चुका है. किसी की कल्पना में नहीं था कि इस एक अभूतपूर्व कदम से भारत के सामरिक और आतंरिक हितों को बेहद मजबूती मिलेगी. एक धारणा जबरन बना दी गयी थी कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करना नामुमकिन हैं. इस झूठे प्रचार को फैलाने में कश्मीर घाटी के कथित नेता और पाकिस्तान सरकार ने कोई कसर नही छोड़ी थी. एक मशहूर कहावत है कि सौ सुनार की और एक लोहार की. देर से ही सही लेकिन वह समय भी आया जब भारत के राष्ट्रपति ने एक झटके में अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय कर दिया. यह सब कानून, संविधान और मानवाधिकारों को ध्यान में रख कर किया गया. पिछले दिनों में भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के बेहतर भविष्य संबंधी कई निर्णय लिए है. इन घोषणाओं के समानांतर सबसे महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार ने आंतरिक मामलों को विदेश नीति से दूर रखा. केंद्र सरकार ने पहली दफा इस्लामाबाद को राज्य के संबंधमें तवज्जो नही दी. हालाँकि, उरी पर आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से द्विपक्षीय वार्ताओं का सिलसिला बंद कर दिया था. पडोसी देश के साथ इस तरह का व्यवहार एक कठोर कदम जरुर कहा जा सकता है लेकिन इसके पीछे की मंशा स्पष्ट थी कि पाकिस्तान को आतंकवाद और हिंसा पर रोकथाम करनी होगी.

पिछली सरकारों ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति को कैसे बिगड़ा इसका एक उदाहरण 1964 में मिलता हैं. उन दिनों प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अस्वस्थ थे और उन्हें पाकिस्तान आने का निमंत्रण मिला हुआ था. गिरते स्वास्थ्य के कारण वे वहां जाने में असमर्थ थे. इसलिए 11 सालों से नजरबन्द शेख अब्दुल्ला को उन्होंने रिहा करवाया और दिल्ली मिलने के लिए बुलाया. शेख के स्वागत के लिए हवाईअड्डे पर प्रधानमंत्री की बेटी इंदिरा गांधी और विदेश मामलों के राज्य मंत्री दिनेश सिंह मौजूद थे. 

प्रधानमंत्री नेहरू ने शेख के साथ फोटो खिंचवाई और तब उनकी आखें नम हो गयी थी. दोनों नेताओं की लम्बी बातचीत का नतीजा यह निकला कि शेख को जम्मू-कश्मीर पर समाधान के लिए राष्ट्रपति अयूब खान से मिलने पाकिस्तान जाना था. यह अदूरदर्शी सोच और कूटनीतिक तौर पर हमारी विफलता को दर्शाता हैं. एक अपराधी को भारत के आंतरिक मामलों पर बात करने के लिए पाकिस्तान भेजने की जरुरत नही थी. प्रधानमंत्री नेहरू ने पहले भी करते रहे थे. जम्मू-कश्मीर के अधिमिलन के दौरान भी वे हर बात की जानकारी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड एटली और पूर्व गवर्नर जनरल लुइस माउंटबैटन को दिया करते थे. इंदिरा गांधी भी पिता के नक्शेकदम पर चली और उन्होंने पाकिस्तान सहित अन्य देशों को जरूरत से ज्यादा अहमियत दी. 

प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय भारत की विदेश नीति रसातल में पहुँच गयी थी. आंतरिक मामलों से भी उनकी पकड़ ढीली हो गयी थीं. उनके कार्यकाल में कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का पलायन शुरू हुआ. अगले एक दशक में इतनी स्थिति गंभीर हो गयी कि वहां हिन्दुओं का नरसंहार किया जाने लगा. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शांति की ठोस पहल जरुर की लेकिन कारगिल युद्ध ने सब पर पानी फेर दिया. युध्द का नतीजा भारत के पक्ष में था लेकिन पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ आतंकवाद जारी रखा. अब इस्लामिक आतंकवाद अखबारों की सुर्खियां और प्राइम टाइम का विषय बन गया था.  

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कश्मीरी अलगाववादियों के बिना जम्मू-कश्मीर के समाधान पर चर्चा नहीं की जाती थी. ऐसा भी जिक्र सामने आता है कि 5 सितम्बर, 2005 को प्रधानमंत्री सिंह ने अपने आधिकारिक निवास पर अलगाववादियों से ढाई घटें की मुलाकात की थी. इस बातचीत के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम. के. नारायणन और प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव कुट्टी नायर शामिल थे. प्रधानमंत्री सिंह इस मुलाकात से बेहद प्रभावित थे और उनका मंत्रिमंडल भी आतंकियों और अलगाववादियों की राह आसान करने में जुट गया. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने चार सूत्रीय सुझाव दिए थे जिसमें जम्मू-कश्मीर से भारतीय सेना को हटाना भी शामिल था. पाकिस्तान की इस चाल को पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी नकार चुके थे लेकिन यूपीए के कद्दावर मंत्री ए.के एंटनी और पी. चिदम्बरम ने इस पर काम करना शुरू कर दिया था. एक बार भारत फिर से पाकिस्तान के झांसे में आने लगा था.

जम्मू-कश्मीर राज्य में 1988 से 2019 के बीच 21,427 सुरक्षा जवान और नागरिक मारे गए है. देश के अन्य हिस्सों में आतंकी हमलों में घायलों और मौतों की जानकारी इसमें शामिल नहीं है. प्रधानमंत्री नेहरू ने भी कभी सोचा नही होगा कि उनकी एक भूल घाटी को बम, बंदूकों और मौत के साये में जीने के लिए मजबूर कर देगी. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कई बार उनसे निवेदन किया था कि वे ऐसा कुछ न करे जिसका खामियाजा नागरिकों को भुगतना पड़े. प्रधानमंत्री ने इस सलाह को नहीं माना और उनकी अगली पीढ़ियों ने जम्मू-कश्मीर को खतरनाक मुहाने पर खड़ा कर दिया था.

भारत विभाजन से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक भारत-पाकिस्तान की द्विपक्षीय वार्ताओं में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा ही हावी रहता था. जबकि आर्थिक, सांस्कृतिक, पर्यावरण और पर्यटन जैसे अन्य मसलों की तरफ ध्यान नही दिया जाता था. वर्तमान सरकार ने इस परंपरा को तोडा और 2003-04 में भारत-पाकिस्तान का व्यापार जहाँ 345 मिलियन अमेरिकी डॉलर था वह 2018-19 में 2561 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। फिलहाल यूरोपियन यूनियन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसके सदस्य देशों की सीमाएं एक-दूसरे से लगती है. इसके कुल 28 सदस्य देशों का आपसी आयत और निर्यात 5369 बिलियन यूरो के आसपास है। पाकिस्तान को यूरोप के इन देशों से सीख लेनी चाहिए कि उसका भविष्य भारत के साथ मिलकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में है.

खैर, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के समाप्त होने के बाद कोई गंभीर हादसा, घायल और मौतों की रिपोर्ट नहीं है. ऐसा पिछले तीन दशकों में पहली बार हो रहा है. राज्य के प्रमुख सचिव और प्रवक्ता रोहित कंसल के मुताबिक दिन के वक्त कई जगहों पर आवाजाही और पाबंदियों पर ढील दी जा रही है. पिछले एक पखवाड़े में वहां एटीएम से 800 करोड़ रुपए निकले गए है. यह राज्य अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने के सुखद संकेत है. यह कारक इस बात का भी इशारा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का फैसला उनकी योजनाओं के मुताबिक आगे बढ़ रहा है.

लेखक देवेश खंडेलवाल जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र, दिल्ली से जुड़े है

( नोट- आलेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के हैं और इनखबर की इससे सहमति या असहमति नहीं है.)