नई दिल्ली:  रेलगाड़ी इस देश के लिए बड़ी बात हमेशा से रही है. रेल मंत्री बनने के लिए नेताओं में लामबंदी से लेकर ना जाने कैसी-कैसी पॉलिटिक्स होती रही है. अलग से रेल बजट पेश करने का सुख इतना बड़ा रहा है कि उसके आगे ममता-समता सब कुरबान. वो सुख तो बुलेट ट्रेन वाली सरकार ने नेताओं से छीना ही, अब रेल के मुसाफिरों का भी सुख-चैन, नींद सब हराम है. मैं खुद का अनुभव बताता हूं. बीते 10 नवंबर को नई दिल्ली से गोरखपुर जाना था. हाल ही में चली और चर्चित हुई हमफसर एक्सप्रेस में कन्फर्म टिकट मिलने का सुख इस आशंका पर बहुत भारी था कि ये ट्रेन कभी टाइम पर नहीं चलती. जून के महीने में गोरखपुर से नई दिल्ली आते वक्त मैं खुद इस बात को महसूस कर चुका था. इस ट्रेन का ट्रैक रिकॉर्ड गोरखपुर के अखबारों में कई बार छप चुका है कि चाहे जो हो जाए, आनंद विहार टर्मिनल से गोरखपुर जंक्शन तक चलने वाली हमफसर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 4-5 घंटे की देरी से ही चलेगी.

मैं मानसिक तौर पर तैयार था कि हससफर का सफर शिड्यूल से 4-5 घंटे की देरी से ही पूरा होगा. 10 नवंबर को शाम 6 बजे बैग उठाकर स्टेशन की ओर रवाना होने ही वाला था कि ऑनलाइन टिकट बुक कराने का फायदा मिला. एसएमएस आया कि ट्रेन अपने निर्धारित समय से 2 घंटे की देरी से रवाना होगी यानी अब ट्रेन आनंद विहार स्टेशन से रात 8 बजे की बजाय 10 बजे चलेगी. नए डिपार्चर टाइम 10 बजे के हिसाब से मैं रात में करीब 9 बजे स्टेशन पहुंचा. प्लेटफॉर्म और वेटिंग हॉल में पैर रखने की जगह नहीं थी. ट्रेनों का स्टेटस बताने वाले एलईडी डिस्प्ले बोर्ड पर नज़र डाली, तो पता चला कि लिच्छवी एक्सप्रेस रद्द हो गई है. दिन में तीन बजे रवाना होने वाली सप्तक्रांति एक्सप्रेस रात में 12.30 बजे रवाना होगी. करीब-करीब सभी ट्रेनें 8 घंटे से 12 घंटे विलंब से थीं. सुकून मिला कि हमसफर का हाल इतना बुरा नहीं है.

रात 10 बज गए, लेकिन हमसफर एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर नहीं पहुंची. अब मन विचलित होने लगा कि कहीं और देर तो नहीं होने वाली? दोबारा डिस्प्ले बोर्ड की ओर गया. काफी देर नज़र गड़ाने के बाद भी उस पर हमसफर एक्सप्रेस की कोई सूचना नहीं दिखी. बेचैनी में पूछताछ काउंटर पहुंचा. वहां नोटिस बोर्ड पर देखा तो पता चला कि हमसफर एक्सप्रेस रात 10 बजे नहीं, बल्कि 11.45 बजे प्लेटफॉर्म नंबर एक से रवाना होगी. जैसे-तैसे वो वक्त भी आया. रात के 11.45 बज गए. प्लेटफॉर्म नंबर एक पर झांका तो आनंद विहार स्टेशन के यार्ड से एक ट्रेन आती नज़र आई. हमसफर एक्सप्रेस ही थी. स्टेशन पर कहीं चादर, कहीं पेपर, कहीं पॉलीथिन की शीट बिछाकर सो रहे लोगों के बीच से गुजरता हुए अपनी निर्धारित बर्थ पर पहुंचा. रात में 12.30 बजे ट्रेन रेंगते हुए आगे बढ़ी. सहयात्रियों से बातचीत शुरू हुई. सब राहत की सांस ले रहे थे कि चलो, चली तो. ‘डायनामिक फेयर’ वाली ट्रेन का ये सुख साढ़े चार घंटे देरी से रवाना होने पर भारी था कि इस ट्रेन में बर्थ कन्फर्म मिल जाती है. पैसे ज्यादा लगते हैं, फिर भी बर्थ तो मिल ही जाती है.

दिन भर की थकान और प्लेटफॉर्म पर साढ़े तीन घंटे की चहलकदमी की वजह से नींद आ गई. आंख खुली तो घड़ी की सुइयां बता रही थीं कि सुबह के 9.20 बजे हैं. कोच अटेंडेंट से पूछा कि ट्रेन कानपुर पहुंच गई या पहुंचने वाली है? जवाब सुनकर ज़ोर का झटका लगा कि अभी तो हमसफर का सफर टुंडला तक ही पहुंचा है. हिसाब लगाया कि इस रफ्तार से गोरखपुर पहुंचने में तो रात के 8 बज जाएंगे. हाथ-मुंह धोने के लिए टॉयलेट की तरफ गया. टॉयलेट के बाहर लगी वॉश बेसिन में पानी नहीं था. गनीमत इतनी थी कि टॉयलेट में पानी का टोटा अभी नहीं था. दिन में 12 बजे तक तो थोड़ी-थोड़ी देर पर चाय-कॉफी, पानी बेचने वाले वेंडर चक्कर लगा रहे थे, लेकिन फिर वो भी दिखने बंद हो गए. पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि ट्रेन में जो स्टॉक था, वो खत्म हो गया है. अब तो कानपुर में ही कुछ मिलेगा. कोच अटेंडेंट लन्च का ऑर्डर लेने आ गया. इस वादे के साथ कि कानपुर पहुंचने के बाद लन्च सर्व होगा. 

दोपहर बाद दिन में ढाई बजे के आस-पास ट्रेन एक जगह ठहरी. खिड़की से बाहर देखा और लगातार यात्रा करने की वजह से अंदाज़ा लग गया कि ट्रेन कानपुर के इंडस्ट्रियल एरिया पनकी के पास खड़ी है. कानपुर पहुंचने की खुशी इस बात से बढ़ गई थी कि यहां खाने के लिए वेज बिरयानी मिलने वाली है, जिसका ऑर्डर पहले ही कर चुका था. ट्रेन खड़ी रही, खड़ी रही, खड़ी रही. एक घंटे, दो घंटे, तीन घंटे. फिर रेंगने लगी. ढाई बजे से पनकी के आउटर पर खड़ी ट्रेन आखिरकार 6 बजे कानपुर पहुंची. इस दौरान मैं ट्विटर पर लगातार ये सवाल रेल मंत्री से पूछता रहा कि सुबह 8 बजे जिस ट्रेन को गोरखपुर पहुंच जाना था, वो शाम को 6 बजे तक कानपुर ही पहुंची थी. ओवरनाइट यात्रा वाली ट्रेन है, इस नाम पर हमसफर एक्सप्रेस में कोई पैंट्री कार नहीं होती कि चलती ट्रेन में खाने का जुगाड़ हो जाए. आनंद विहार से ये ट्रेन सीधा कानपुर ही रुकती है. बीच में दूसरी ट्रेनों की क्रॉसिंग के लिए इसे आउटर पर ही रोका जाता है यानी रास्ते में कुछ मिलना मुमकिन नहीं. अगर ट्रेन इतनी देर से चल रही है तो रेल मंत्रालय क्यों नहीं सोचता कि ट्रेन में मासूम बच्चे भूख से बिलख रहे होंगे. डायबिटीज़ के मरीज़ भी होंगे, जिनका शुगर लेवल भूखे रहने पर बढ़ जाता है. रेलवे से अगर कुछ नहीं हो सकता, तो क्यों नहीं यात्रियों को आगाह कर दिया जाता है कि कम से कम एक दिन का राशन-पानी साथ लेकर ही यात्रा करें?

कानपुर से आगे बढ़ते हैं. रात करीब 9 बजे हमसफर एक्सप्रेस लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर पहुंची. गोरखपुर में जो लोग मेरा इंतज़ार कर रहे थे, उनको मैंने फोन करके समझा दिया कि ट्रेन शायद अब सुबह ही पहुंचेगी, इसलिए चैन से खा-पीकर सो जाएं. ट्रेन लखनऊ में 10 मिनट रुकने के बाद रवाना हो गई. अब तक मैं ट्रेन के लेट होने से खीझ रहा था, लेकिन अब मेरी सोच बदलने लगी थी. मैं दुआ मांग रहा था कि लखनऊ से गोरखपुर पहुंचते-पहुंचते ये ट्रेन अगर 4-5 घंटे और लेट हो जाए तो बेहतर है. खैर, मेरी ये दुआ पूरी तरह कुबूल नहीं हुई. ट्रेन आधी रात के काफी देर बाद सुबह के 3 बजे गोरखपुर जंक्शन पहुंची. हमसफर एक्सप्रेस के शिड्यूल के हिसाब से इस ट्रेन का आनंद विहार से गोरखपुर तक का सफर 11 घंटे 50 मिनट में पूरा होना था लेकिन 10 नवंबर को इस ट्रेन से मेरा सफर 26 घंटे 30 मिनट में पूरा हुआ. इस दौरान सिर्फ एक सवाल ही दिमाग को परेशान करता रहा कि क्या सिर्फ डायनामिक किराया वसूलने के लिए ये ट्रेन चलाई गई है? क्या जिस देश में 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी ट्रेन चलाना रेलवे के लिए संभव ना हो, उस देश में बुलेट ट्रेन चलाने की बात करना पाप नहीं है क्या?

इस सफर में समय और शरीर को हाल हुआ, उसके बाद वापसी में रेल यात्रा की हिम्मत नहीं पड़ी. गोरखपुर बस स्टेशन पहुंचा. वहां किसी भी एक्सप्रेस ट्रेन की एसी थ्री टियर बोगी से ज्यादा महंगे किराए वाली ‘जनरथ’ बस का टिकट लिया. लोगों ने समझाया कि अगर रास्ते में कोहरा पड़ा तो बस में झेल जाओगे. कुछ मित्रों ने सलाह दी कि वैशाली एक्सप्रेस से चले जाओ. हमसफर एक्सप्रेस में मैं जिस कदर रेल बना था, उसके बाद मैं किसी की सुनने को तैयार नहीं था. रेल से भरोसा उठ गया था. मैंने जवाब दिया- ‘बस में चाहे 36 घंटे लग जाएं, तसल्ली तो रहेगी कि अगर बस लेट हुई तो रास्ते में किसी ढाबे पर खाना मिल जाएगा.’ 13 नवंबर को शाम 6 बजकर 4 मिनट पर यूपी रोडवेज़ की जनरथ रवाना होने का टाइम था. बस बिल्कुल अपने समय पर चली. रात 12 बजे मैं लखनऊ में था. सुबह 6 बजे बरेली और दिन में 11 बजकर 30 मिनट पर दिल्ली. चुहलबाज़ी के इरादे से पता किया तो मालूम हुआ कि वैशाली एक्सप्रेस 13 नवंबर को भी करीब 10 घंटे की देर से चल रही थी. गोरखपुर से शाम को 4.50 बजे रवाना होकर अगले दिन सुबह 6.45 बजे नई दिल्ली पहुंचने वाली वैशाली एक्सप्रेस अभी दिल्ली से मीलों दूर थी.