मेरी बड़ी बेटी के जन्म के समय ही पिताजी ने अदिति के नाम से संबोधित किया। नामकरण संस्कार का वक्त आया, तो कुछ अन्य नाम सामने आए मगर हमने पिछले नाम को मिटाकर नया नाम नहीं रखने का फैसला किया। अदिति के साथ ही नया नाम भी जोड़ दिया। कुछ इसी तरह दूसरी बेटी के नाम के साथ भी हुआ, हालांकि इससे दोनों के नाम कुछ बड़े हो गये। हमारी वैदिक संस्कृति कहती है कि किसी को मिटाकर हम बड़े नहीं बनते। अपनी लकीर को और बड़ा करके हम बड़े होते हैं। इस वक्त कुछ ऐसा हो रहा है, जिससे हमारी संस्कृति मजाक बन रही है। जो लोग धर्म की पताका लिये घूम रहे हैं, वही वैदिक-सनातन संस्कृति का अपमान करते हैं। हमारा धर्म आत्मसात करने वाला है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जैन, सिख, पारसी और बौद्ध धर्म हैं। सनातन धर्म ने गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी को भी देवता मान लिया। मुस्लिम संत सांई बाबा को भी मंदिर में स्थान दिया गया। मांसाहारी स्वामी विवेकानंद हमारे आदर्श संत के रूप में स्वीकार्य हैं। आज हम क्रूर धर्मांधता का शिकार हो, दूसरों के मत-धर्म को नष्ट कर, अपने धर्म की पताका फहराना चाहते हैं। यह हमारे धर्म के मूल स्वभाव और संस्कृति के विरुद्ध है। ऐसा करना लकीर को और बड़ा करने वाले संदेश के विपरीत है। हमारा धर्म नफरत नहीं प्रेम करना सिखाता है। हम योग (जोड़ना) के जनक हैं, न कि वियोग के।

इस वक्त हम बेतहासा बढ़ती महंगाई को भी बुरा नहीं मानते। किसानों मजदूरों के हक मारने को भी बुरा नहीं मानते। हम रोज मरते किसानों को भी श्रद्धांजलि नहीं देते। हम नित बढ़ती बेरोजगारी का समाधान निकालने का भी यत्न नहीं करते। हम पूंजीपतियों के हित के लिए दूसरों का हक मारने वाली नीति के खिलाफ नहीं बोलते। हम पूर्वजों की कमाई से बने उद्यमों को बेच खाने के विरोध में भी खड़े नहीं होते। हम बेटियों की रोजाना लुटती आबरू पर भी मौन रहते हैं। लूट-हत्या और डकैती की बढ़ती घटनाओं से विचलित नहीं होते। ठगों के फैले जाल में फंसकर हम सबकुछ लुटाकर भी शांत बैठ जाते हैं। हमें पड़ोस में भूख से बिलखते आत्महत्या करने वाले परिवार पर कोई दया नहीं आती है। हम मंदिर निर्माण के नाम पर लाखों रुपये का चंदा देकर खुश होते हैं मगर परीक्षा की फीस न भर पाने के कारण खुदकुशी करती बेटी को बचाने के लिए कुछ नहीं करते। हमें इसकी भी फिक्र नहीं है कि कोई हमारी कमाई के धन से अय्याशी भरा राजसी जीवन जीता है और हम लगातार मिट रहे हैं। हमें देश की सीमाओं पर होते विदेशी अतिक्रमण की भी चिंता नहीं है। हमें तमाम बड़े खरीद घोटालों पर भी कोई शर्म नहीं आती है। आमजन की मदद को मिले खरबों रुपये के चंदे के बंदरबांट पर भी हम मौन साध लेते हैं। सब लुटाने के बाद भी, हम सत्ता सरकार का यश गान करते हैं। अब यही हमारी संस्कृति और सभ्यता है, क्योंकि इन हालात को पैदा करने वाले पिछली सभी लकीरें मिटाने में जुटे हैं। अब तो हम इससे ही खुश हो लेते हैं।     

मौजूदा दौर में हमारी चुनी हुई सरकार की नीतियों का ही असर है कि इन सभी सवालों का जवाब सजग नागरिक मौन रहकर देने लगे हैं। हाल ही के दिनों में पंजाब में हुए निकाय चुनाव में जनता ने उन सभी दलों का सूपड़ा साफ कर दिया, जिन्होंने उनकी भावनाओं के विपरीत व्यवहार किया था। पंजाब के सजग नागरिकों ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें ऐसे किसी दल की जरूरत नहीं है, जिसकी कथनी-करनी में अंतर हो। हरियाणा और पश्चिम यूपी के गांवों में सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं का घुसना मुश्किल हो गया है। जनता उन्हें किसान आंदोलन के प्रति उनके दमनात्मक रवैये पर धिक्कारने लगी है। यह एक मुहिम बन गई है। इसी दौरान भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने भी घोषणा कर दी कि अब किसान अपने उत्सवों और त्योहारों पर भाजपा नेताओं को निमंत्रित नहीं करेंगे। उधर, आंदोलनकारी किसानों को काले धन का पोषक, खालिस्तानी, पाकिस्तानी और चीन समर्थक बताया जा रहा है। सत्ता समर्थक किसानों को हराम का खाने की आदत वाला मानते हैं। कभी किसानों की राजनीति करके खुद को मजबूत बनाने वाला किसान संघ भी सरकार के आगे घुटने टेक चुका है। वह भी किसान को मजदूर बनाने की सरकारी साजिश का हिस्सा बनने में फख्र महसूस करता है। यही कारण है कि सिद्धांतों से समझौता न करने वाले दल की पहचान बनाने वाले, अब अपने ही सिद्धांतों से दूर हो गये हैं।

हमने देखा कि लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जो चर्चायें संसद में हुईं, वह चिंतनीय थीं। सत्ता को उसकी कोई फिक्र नहीं है। राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधारों को जिस तरह से अपने हित में तोड़ा मरोड़ा गया, वह भी चिंताजनक है। हमें पता है कि हमारे देश में 14 करोड़ से अधिक किसान हैं। इनमें 12 करोड़ से अधिक सीमांत किसान हैं। बड़ी तादाद असहाय किसानों की है। उनकी लड़ाई बड़े किसान ही लड़ सकते हैं। बहराल, इस वक्त देश का किसान जो लड़ाई अपने देश की राजधानी की सीमाओं पर लड़ रहा है, असल में वह खुद से अधिक आमजन के जीवन को बचाने की है। प्रधानमंत्री ने उन्हें आंदोलनजीवी का नाम दे दिया, जिन्हें परजीवी सिद्ध करने में उनके भक्त जुट गये। किसी ने भी आंदोलन करते शहीद हुए सवा दो सौ किसानों के प्रति कोई सहनुभूति नहीं दिखाई। राहुल गांधी ने संसद में और बिहार विधानसभा में तेजस्वी यादव ने जब उन्हें श्रद्धांजलि दी, तो सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने शर्मनाक व्यवहार किया। अब तो तीनों विवादित कृषि सुधार कानूनों की वापसी की मांग के खिलाफ, बड़ी फांसीवादी ताकतें खड़ी हो गई हैं। उधर, सामाजिक न्याय और सहनुभूति की संवैधानिक व्यवस्था पर वह बात भी नहीं करना चाहते हैं। कारपोरेट इस नीति से बेहद खुश है, नतीजतन शेयर बाजार दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा है। सरकारी नीतियां जाति-धर्म व्यवस्था के तुष्टीकरण वाली हैं, क्योंकि यह बड़ा वोट बैंक और विचारधारा बनाती हैं। उसे सर्वधर्म, सर्वजन सुखाय की नीति फायदे का सौदा नहीं लगती है। 

इन हालात को देखकर, हमें विस्टन चर्चिल का ब्रिटिश संसद में दिया गया, एक भाषण याद आता है। उन्होंने भारत के संदर्भ में कहा था कि सत्ता दुष्टों बदमाशों और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी। भारत के सभी नेता ओझी क्षमता वाले भूसा किस्म के व्यक्ति होंगे। उनकी जुबां मीठी, दिल निकम्मे होंगे। वो सत्ता के लिए एक दूसरे से लड़ेंगे और देश को खत्म कर देंगे। वहां, एक दिन ऐसा आएगा, जब पानी और हवा पर भी टैक्स लगा दिया जाएगा। आज हम उनकी तमाम बातों को सच होते देख रहे हैं। विश्व में सबसे अधिक टैक्स हमसे वसूला जा रहा है मगर बदले में हमारी सरकार हमारे लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं है। बावजूद इसके, हम कुछ बोलने को तैयार नहीं। जब कोई बोलने को तैयार नहीं है, लोग और संस्थायें डरे हुए हैं, तो फिर हम भी क्यों न मौन साध लें।

      जय हिंद!

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(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक मल्टीमीडिया हैं)