कोरोना महामारी के दौर में जब चंद पूंजीपति, सत्तानशीन सियासी दल और नौकरशाही को छोड़कर पूरा देश रो रहा था, तब हमारे किसानों की उपज ने, न सिर्फ देशवासियों का पेट भरा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी बचाने में योगदान किया। जब देश की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे बदतर और नकारात्मक स्थिति में पहुंच गई, तब कृषि क्षेत्र की जीडीपी ही सकारात्मक होकर हमें 3.4 फीसदी की दर से आगे बढ़ रही थी। जब देश के करोड़ों नागरिक बेरोजगार होकर अपने गांव पहुंचे थे, तब कृषि क्षेत्र ने ही उन्हें रोजगार और पेट भरने के लिए साधन उपलब्ध कराये। आज हमारी सरकार जिस “प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना” के आधार पर एक बड़ा वोट बैंक तैयार कर रही है, वह भी उसी कृषि और किसान की मेहनत का नतीजा है। किसानों की उपज के बूते ही प्रधानमंत्री ने महामारी के दौर में देश के 80 करोड़ गरीब नागरिकों को मुफ्त अनाज देने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, अभी हम लक्ष्य से बहुत पीछे, 10 फीसदी पर खड़े हैं। किसान की उपज से ही एफसीआई के गोदाम भरे हुए हैं। कारपोरेट उसका निर्यात कर डॉलर कमा रहा है। तमाम बड़े पूंजीपति इसी उपज के जरिए अपनी कंपनियों को फर्श से अर्श पर पहुंचा रहे हैं। जब सभी उद्योग डूब रहे थे, तब कृषि और कृषि प्रसंस्करण उद्योग तेजी से ऊपर जा कर हमारी मदद कर रहा था। उसने सबसे अधिक मुनाफा भी दिया।

भारतीय प्राचीन ग्रंथों और शास्त्रों पर गौर करें, महार्षि जैमिनी के अनुसार, राजा भूमि का समर्पण नहीं कर सकता क्योंकि वह भू स्वामी नहीं बल्कि सार्वजनिक भूमि का संरक्षक है। भूमि पर सभी जनों का समान हक है। प्राचीन भारत की मान्यता के अनुसार भूमि सार्वजनिक संपत्ति है, न कि किसी व्यक्ति विशेष की। ईश्वर ने इसे सभी के समान उपयोग के लिए प्रदान किया है। भूमि भी वायु, जल एवं प्रकाश की तरह प्रकृति प्रदत्त उपहार है। यही कारण था कि जब लघु किसानों और किसानी मजदूरों ने लगान के खिलाफ आंदोलन खड़े करने शुरू किये, तो ब्रितानी कंपनी और हुकूमत को अपनी नींव हिलती नजर आई। उन्होंने व्यवस्था सुधार के लिए जो कानून भी बनाये, उनमें जमींदारों को मजबूत किया। जो किसानों पर अत्याचार का कारण भी बना। आपको याद होगा, ब्रितानी हुकूमत के दौर में देश की कृषि पर जमीदारों और राजाओं का कब्जा था। अंग्रेजी सत्ता ने स्थायी तथा अस्थायी बंदोबस्त के अधिकार राजाओं-जमींदारों और बड़े कृषकों को दे दिये थे। देश आजाद होने के बाद यह प्रथा समाप्त की गई। कृषि मजदूरों और लघु किसानों को संबल देने के लिए न सिर्फ सरकारी बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अभियान भी चलाये गये। इसके विरोध में जमीदारों, जागीरदारों, राजाओं और बड़े किसानों ने गठजोड़ करके तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ न सिर्फ अभियान चलाये बल्कि अंग्रेजों के हिमायती रहे, विपक्षी दलों को मजबूत किया।

हमें 27 अक्तूबर 1928 की यूपी में हुई कांग्रेस कमेटी की घोषणा याद आती है, जब अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू के अध्यक्ष रहते, पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पहली बार यह प्रस्ताव पास कराया कि “राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक निर्थक है, जब तक किसानों को शोषण से मुक्ति नहीं मिलती”। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने किसानों के समर्थन में 1930 में जो आंदोलन शुरू किये, उसका नतीजा 1935 की भारत सरकार में हुए सुधार से दिखना शुरू हुआ। कांग्रेस ने जमीदारी उन्मूलन को अपना अभियान बनाया। 27-28 अप्रैल 1935 को इलाहाबाद में आयोजित किसान कांग्रेस की अध्यक्षता सरदार पटेल ने की। उन्होने नेहरू के किसान आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया। 1944 तक किसान आंदोलन बड़ा रूप ले चुका था, जिससे तमाम राज्यों में सुधार भी शुरू हुए। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1945 के चुनाव कार्यक्रम में पहली बार कांग्रेस ने चुनाव घोषणा पत्र निकाला, जिसमें किसानों के हित और जमींदारी उन्मूलन को एक बड़ा मुद्दा बनाया गया। जमींदारी प्रथा को जड़ से खत्म करने की शुरुआत भी यहीं से हुई। 1946 में जब अधिकतर प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी, तो घोषणापत्र के अनुसार जमींदारी प्रथा खत्म करने के लिए विधेयक लाये गये। यही विधेयक आजादी के बाद 1950 से 1955 तक अधिनियम बनाकर लागू किये गये। नतीजतन, जमींदारी प्रथा खत्म हुई और किसानों को अपने खेतों पर हक मिला। उनका राज्य सरकार से सीधा संबंध स्थापित हुआ। भूमि के स्वत्वाधिकार किसानों को पुनः वापस मिले। जो प्राचीन काल में परंपरागत मिला करते थे। इसके बाद किसानों को जरूरी सुविधायें देने का क्रम चला, जिसके बूते देश में हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति आई। किसानों की दशा में सुधार हुआ। आजादी के वक्त देश की 90 फीसदी आबादी एक वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करती थी, उसे धीरे-धीरे अपनी उपज के बूते दोनों वक्त का खाना मिलना शुरू हुआ। आजाद भारत के पहले बजट में सबसे अधिक धन कृषि क्षेत्र के लिए ही रखा गया था, जो तब 171 करोड़ रुपये राजस्व देने वाला था। यही हमारी ताकत बना। आपको पता है कि उस वक्त देश का कृषि उत्पादन अब से 20 गुणा कम था। किसान को जब हक और समर्थन मिला, तो उसने देश के खाद्यान्न भंडार भर कर उत्पादन में देश को समर्थ बना दिया।

पिछले 10 महीने से हमारा किसान आंदोलित है। नरेंद्र मोदी सरकार के कृषि से जुड़े तीन कानूनों को वो किसानों और देशवासियों के लिए काला कानून मान रहा है। किसान संगठनो ने सरकार के मंत्रियों से अपनी लिखित और मौखिक सभी, वार्ताओं में आपत्तियां दर्ज कराई हैं। सरकार उनकी मुख्य मांगों और आपत्तियों पर विचार करने को तैयार नहीं है। वार्ता बंद है। इस दौरान 700 से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है। अभी किसान करनाल में उनके ऊपर हुए लाठीचार्ज के खिलाफ आंदोलनरत हैं। वहीं तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ मुजफ्फरनगर की महापंचायत में लाखों किसान प्रस्ताव पास कर चुके हैं। कांग्रेस सहित सभी मुख्य विपक्षी दल किसानों की मांग को जायज बता रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि जब उनकी सरकार में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार, इसी तरह का प्रस्ताव लेकर आये थे, तो उन्होंने संसद में चर्चा के बाद उसे लागू नहीं होने दिया था। तब भाजपा इन प्रस्तावों को किसान के लिए काल बता रही थी, तो अब वह इनको किसानों पर क्यों थोप रही है? किसानों ने संकट में फंसे देश को सदैव संबल और समाधान दिया है। उनके बच्चों ने देश की सीमाओं की रक्षा की है और उन्होंने देश के खेतों की। उनकी अथक मेहनत ने ही देश की अर्थव्यवस्था के साथ ही देशवासियों का भी जीवन बचाया है।

हमारी सरकार को चाहिए कि वह पूंजीवादी और जमींदारी व्यवस्था के पोषक कानूनों को खत्म करके, किसानों की मांग के अनुरूप कानून बनाये। वह किसान आंदोलन को सहृदयता से देखे, न कि अंग्रेजी हुकूमत की तरह। उसे समझना चाहिए कि जब किसान और किसानी मजबूत रहेगी, तो देश न भुखमरी का शिकार होगा और न ही रोजगार के अवसर खत्म होंगे। कृषि से जुड़े उद्योग-व्यवसाय स्थायी अर्थव्यवस्था हैं, जिन्हें पूंजीपतियों का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। हमें अपने किसानों को शक्ति प्रदान करनी चाहिए कि वह खुद कृषि आधारित उद्योग स्थापित कर सकें। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का भी समाधान होगा। किसान मजबूत होगा तो देश भी सशक्त बनेगा।

जय हिंद!

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं।)

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