चार राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र के चुनाव परिणाम सकारात्मक संदेश देने वाले हैं। इस जनादेश ने कांग्रेस को पुनः आत्ममंथन की राह दिखाई है। चुनाव नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस को जमीनी और प्रभावी संगठन तैयार करना होगा। उसे कांग्रेस सेवा दल, भारतीय युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन को सशक्त बनाना होगा। वैसा ही सशक्त, जैसा 1959 में कांग्रेस के नासिक राष्ट्रीय सम्मेलन के वक्त था। सेवादल के गेट प्रभारी कमलाकर शर्मा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं सेवादल के प्रथम अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू को भी बैज न लगाने के कारण सम्मेलन में अंदर जाने से रोक दिया था। सेवादल तब बना था, जब कांग्रेस को जमीनी मजबूती चाहिए थी। 1921 के झंडा सत्याग्रह के दौरान डॉ नारायण सुब्बाराव हार्डिकर के राष्ट्र सेवा मंडल ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगने से मना किया तो उन्हें जेल में डाल दिया गया। नागपुर सेंट्रल जेल में उन्होंने ऐसा संगठन बनाने के बारे में सोचा, जो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित कर लड़ने योग्य बना सके। हार्डिकर जेल से बाहर आते ही इलाहाबाद जाकर पंडित नेहरू से मिले। उन्होंने सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चलने वाला लड़ाका और सेवा करने वाला संगठन बनाने पर चर्चा की। 1923 में कर्नाटक कांग्रेस सम्मेलन में सरोजनी नायडू ने हिंदुस्तानी सेवादल बनाने का प्रस्ताव रखा और पंडित नेहरू पहले अध्यक्ष बनाए गए। यही संगठन कांग्रेस सेवादल कहलाया। जिसने सुरक्षा के साथ ही रूढ़िवादी समय में बाल्टियों से मैला भी उठाया। उसकी प्रेरणा लेकर ही हिंदू महासभा ने डॉ बलिराम हेडगेवार की अगुआई में स्वयं सेवक संघ बनाया, जिसकी बनाई भाजपा आज न सिर्फ केंद्र में बल्कि देश के दो तिहाई राज्यों में सरकार में है।

कांग्रेस ने 1947 में युवा इकाई बनाई, जो 1960 में भारतीय युवा कांग्रेस के रूप में युवाओं का सबसे चहेता और शक्तिशाली संगठन बना। उसने देश को कई बड़े समर्पित नेता-कार्यकर्ता दिये। 1971 में बने भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन ने कांग्रेस की विचारधारा किशोरावस्था में ही भावी पीड़ी में भरी और समर्पित कार्यकर्ता-नेता तैयार किये। इस समय ये सभी संगठन वरिष्ठ नेताओं से उपेक्षित हैं। जिससे पार्टी न जमीनी तौर पर मजबूत हो पा रही है और न ही वफादार कार्यकर्ता-नेता तैयार कर पा रही है। जब राहुल गांधी और प्रियंका दोनों चुनाव में खप रहे थे, तब उनके अन्य नेता घरों में तमाशाई बने बैठे थे। जिन वामपंथियों ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सहित देश में खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, आज वह उसी के साथ पींगे लड़ा रही है। युवा कांग्रेस से निकली ममता बनर्जी अकेले ही विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्र और दर्जन भर राज्य सरकारों के साथ ही कारपोरेट और मीडिया प्रपोगंडा से लड़ रही थीं। उन्होंने विपक्षी दलों से साथ मांगा मगर कांग्रेस ने हाथ आगे बढ़ाने के बजाय उसके वोट काटने के लिए वामपंथियों को हाथ दे दिया। कांग्रेस ने न तो समान विचारधारा वाले साथियों का चयन किया और न ही अपने जमीनी संगठनों को मजबूत बनाया। यही कारण है कि इस चुनाव में वह सबसे बड़ी लूजर साबित हुई है। ममता जहां आयरन लेडी बनकर उभरी हैं, वहीं भाजपा भी गेनर है। भाजपा ने जहां कांग्रेस की जीत की राह रोक दी, वहीं बंगाल में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। वह दो राज्यों में सत्ता में भी आई है। कांग्रेस ने अगर अब भी राजनीतिक रणनीति नहीं सीखी, आत्ममंथन नहीं किया, तो तय है कि उसके हवाई नेता बची-खुची पार्टी को भी खत्म कर देंगे। किसी भी दल के लिए नेता के साथ समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज जरूरी होती है।

जयहिंद!

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