हम अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के 74 साल पूरे कर चुके हैं। 75वें वर्ष में प्रवेश करते वक्त हमारी सरकार “आजादी का अमृत महोत्सव” मना रही है। 15 अगस्त 1947 को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के तिरंगा फहराते ही हमने आजाद भारत में सांस ली थी। यह आजादी 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक व्यवस्था के साथ पूरी हुई। हम तेजी के साथ विकास पथ पर आगे बढ़े। अभावों, संकटों और झंझावतों से जूझते हुए हमारे नेताओं ने देश को विश्व पटल पर विकासशील गुटनिरपेक्ष देशों के अगुआ की तरह स्थापित किया।

यह सब पाने के लिए हमारे लाखों लोगों ने अपना बहुत कुछ लुटाया था। आजादी के आंदोलन को तोड़ने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने धार्मिक सियासत करने वाले कुछ संगठनों के साथ मिलकर हमारे बीच जो सांप्रदायिकता का जहर का बीज बोया था, वह भी लगातार बढ़ता रहा। हमारे सियासी नेतृत्व के रचनात्मक होने के कारण यह जहरीला पेड़ अपने फलों से लोगों को बहुत प्रभावित नहीं कर सका था, मगर अब ये जहरीले फल अपना असर दिखाने लगे हैं। जो देश को जहरीला बनाने में जुटे हैं। इसके खिलाफ अब आवाज नहीं उठती या फिर उठती है, तो दबे कुचले अंदाज में। वैदिक धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि देव और असुर दोनों ही प्रजापति की संताने हैं। कर्म और संस्कारों के आधार पर दोनों विभाजित हुए। देवासुर संग्राम के वक्त जब देवताओं को अमृत मिला, तब वे सशक्त होकर बुराई से लड़ सके। अब फिर उसी अमृत की जरूरत है, क्योंकि जहर हर तरफ फैल रहा है। जो हमें तालिबानी संस्कृति और संस्कार की ओर ले जाता है। अमृत महोत्सव का जश्न तब सार्थक होगा, जब इन जहरीले पेड़ों को हम जड़ से उखाड़ेंगे।

देश और समाज सांप्रदायिकता की गिरफ्त में

इस समय देश और समाज सांप्रदायिकता की गिरफ्त में है। यह जहर हमारी दैव संस्कृति की जड़ें खत्म कर रहा है। वे लोग धर्म की पताका लिये घूम-घूम कर हल्ला मचा रहे हैं, जो धर्म के मूल को ही नहीं जानते। कानपुर में एक गरीब मुस्लिम परिवार पर इसी तरह का कहर टूटा। छोटी बच्ची अपने पिता को बचाने के लिए रोती-गिड़गिड़ाती धक्के खा रही और जहर बुझे हिंदूवादी तालिबानी संस्कृति का परिचय दे रहे थे। इसके पहले एनसीआर और राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में इसी तरह की लिंचिंग होती रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर स्पष्ट निर्देश राज्य और केंद्र सरकारों को दिये हैं मगर उसकी परवाह किसी को कहां? वे जानते हैं कि हम बहुसंख्यक समुदाय से हैं। सत्ता वही करेगी जो वे चाहेंगे। इस तरह की घटनाएं उस राज्य में सबसे अधिक हो रही हैं, जो अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति के लिए जाना जाता था। जहां मोहब्बत का पैगाम सबसे ऊपर होता था। हमें याद आता है कि 1931 में कानपुर सांप्रदायिक दंगों में जल रहा था।

मजहबी जहर के खिलाफ लड़ने वाले पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी शांति बहाली के प्रयासों में लगे थे। जहर बुझे लोग एक-दूसरे को मार रहे थे। विद्यार्थी जी, से यह देखा नहीं गया और वे दंगा रोकने निकल पड़े। अधिकतर जगह वे कामयाब रहे मगर अपने ही मोहल्ले में वह दंगाइयों के बीच फंस गए। उनका इस तरह कत्ल किया गया था कि शव पहचाना नहीं जा रहा था। ऐसा नहीं है कि सदैव ऐसी घटनाएं होती थीं। बंगाल विभाजन के समय सांप्रदायिक घटनाओं ने जोर पकड़ा और फिर यह जहर फैलने लगा था। आजादी की शुरुआती लड़ाई में हिंदू और मुस्लिम साथ थे। अंग्रेजी हुकूमत ने भावनाओं के रूप में जहर फैलाया और लोगों की भावनाएं जहरीली होने लगीं। जो देश के टुकड़े कराकर भी नहीं रुक रहीं।

हिंदू महासभा भी अलग हिंदू राज्य का

हमारे लिए यह भी जानना जरूरी है कि सत्ता के लिए सांप्रदायिकता का यह खेल सिर्फ अंग्रेजों ने ही नहीं खेला बल्कि हिंदू महासाभा और मुस्लिम लीग ने भी खेला। जब उन्हें खुद को संप्रदाय के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करना होता था, तब दोनों कट्टर हो जाते थे मगर जब सत्ता की बात आती, तो एक हो जाते थे। 1940 में मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान का प्रस्ताव पास कर चुकी थी और हिंदू महासभा भी अलग हिंदू राज्य का। सत्ता के लिए 1941 में हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वित्तमंत्री बने थे। सिंध की मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की साझा सरकार ने 1943 में पाकिस्तान बनने का प्रस्ताव पास किया था। इसमें हिन्दू महासभा के तीन मंत्री थे। प्रस्ताव के बाद भी वे मंत्रिमंडल में बने रहे। उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत (सरहदी सूबा) में भी दोनों की मिलीजुली सरकार थी। विनायक दामोदर सावरकर की अध्यक्षता में हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग की तरह प्रस्ताव पास करके “अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन” का विरोध किया था।

कमोबेश यही हाल कश्मीर और असम में अब भी देखने को मिलता है। उसी संस्कृति से निकले दलों ने जिन्हें पाकिस्तान परस्त बताया, उन्हीं के साथ वर्षों सरकार चलाई है। कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर की यात्रा कर पहली बार वहां का माहौल बिगाड़ा था। मुद्दों के बजाय सांप्रदायिक जहर के बूते सरकार हासिल करने की जुगत में तमाम सियासी दल लगे रहते हैं। अब यह जहर लोगों की रगों में दौड़ने लगा है, जिससे देश खुद को तालिबानी दिशा में ले जा रहा है। जिम्मेदार लोग मौन साधे तमाशाई बने बैठे हैं।
चंद रोज पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो हुआ, वह देश और हमारी धर्म-संस्कृति पर कलंक है। भारत जोड़ो के नाम पर भारत तोड़ो, जैसी तैयारी और मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के प्रति जिस तरह से जहर बुझे नारे लगे, वह दुखद था।

एक पत्रकार से भी जबरिया व्यवहार हुआ, जो किसी के लिए भी शर्मनाक है। उससे भी अधिक शर्मनाक सत्ता-पुलिस और मीडिया के लिए है, जिसने देश को प्रेम और सौहार्द से जोड़ने के बजाय तोड़ने वालों का साथ दिया। देश गंभीर आर्थिक संकटों से गुजर रहा है। बेरोजगारी आजादी के बाद सबसे विकराल रूप में सामने है। शिक्षा का स्तर निम्न हो चुका है। स्वास्थ सेवायें लचर हैं। कानून व्यवस्था का राज सिर्फ कागजी रह गया है। महिलायें-बेटियां और व्यापारी सुरक्षित नहीं हैं। पूंजी चंद हाथों में पहुंच चुकी है।

मीडिया पूंजी और सत्ता की गुलामी के दौर

मीडिया पूंजी और सत्ता की गुलामी के दौर में है। सच बोलने पर सोशल मीडिया अकाउंट्स तक ब्लॉक कर दिये जाते हैं। इतना सब होने के बाद भी जनता की तरफ से जब आवाज नहीं उठती, तो लगता है कि देश गुलामी और मुर्दानी के दौर में है। डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे, जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं मगर अब सब इंतजार में बैठे हैं। राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष और किसानों की अगुआई में आधे देश के अन्नदाता दिल्ली की सीमा पर जमे हैं मगर जनता चुप्पी साधे है। सांप्रदायिकता का जहर हवा में फैल रहा है।
हमारी सरकार आजादी का अमृत महोत्सव मनाकर देश को आजाद भारत का अहसास कराना चाहती है। दूसरी तरफ, देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी ने भी पूरे साल आजादी का अमृत महोत्सव मनाने की तैयारी की है। दोनों को यह समझना होगा कि अमृत महोत्सव तब पूरा होगा, जब लोगों का जीवन अमृत से भरेगा। उनके अंदर का जहर खत्म होगा। सब खुशी-मस्ती के साथ देश को बनाने में जुटेंगे, न कि खुद को बचाने में। मीडिया और पत्रकार सच को सच कहने से डरेंगे नहीं। फैज अहमद फैज के गीत..बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, याद नहीं दिलाना पड़ेगा।
जय हिंद!
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं।)
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