भारतीय राजनीति कब किस तरफ करवट ले लें इसका कुछ कहा नहीं जा सकता. जहां 10 दिन पहले त्रिपुरा में भाजपा की अप्रत्याशित जीत को उसके देश में बढ़ते विस्तार और 2019 लोकसभा चुनाव में आसान जीत से पार्टी के नेता और चुनाव विश्लेषक जोड़ रहे थे. वहीं बुधवार को आए उपचुनाव के नतीजों ने 2019 की जंग को नया रुप दे दिया है. आईये नज़र डालते है हाल में बने ऐसे राजनीतिक समीकरण और केन्द्र सरकार की विफलताओं पर जो 2019 में भाजपा की जीत के बड़े रोड़े बन सकती हैं.

उत्तर प्रदेश की रंग बदलती राजनीति

2014 लोकसभा चुनाव हो या 2017 विधानसभा चुनाव भाजपा की आंधी में कोई भी दल उत्तरप्रदेश में बच नहीं पाया. 80 में से लोकसभा के 71 सीटें और 2017 विधानसभा में तीन चौथाई सीटों के साथ पूर्ण बहुमत. ये दोनों ऐसे आंकड़े थे जिसने हर किसी को चौका दिया था. सपा-बसपा जो केवल पक्ष और विपक्ष की भूमिका राज्य में निभा रही थी वहां भाजपा का इस प्रकार के उदय को पचा नहीं पाई थी. परंतु आज परिस्थिति बदल चुकी है. जहां दो धुर विरोधी सपा-बसपा एक हो चुकी है. उपचुनाव के परिणाम एक नई कहानी गढ़ रहे हैं और एक नए राजनैतिक भविष्य की ओर इशारा भी कर रहे हैं. जहां दोनों ऐसी प्रतिष्ठित लोकसभा सीटों पर भाजपा हार गई जो मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा खाली की गई थीं. दोनों सीटों पर उपचुनाव बीजेपी के लिए नाक की लड़ाई थी. फूलपुर में लगभग 60 हजार, वहीं योगी के गढ़ गोरखपुर से 21 हजार वोटों से हार. ये साफ जाहिऱ कर रही है अगर ये सपा-बसपा गठबंधन अगर 2019 में भी बना और इसमें अगर कांग्रेस भी शामिल हो गई तो लोकसभा 2019 के चुनाव परिणाम भाजपा को चौंका सकते हैं.

कांग्रेस की रणनीति

राजनीति में कोई भी चीज़ परमानेंट नही होती 2014 के आम चुनावों के बाद जहां मोदी लहर को 332 सीटें मिली. वही कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट कर रह गयी. कई बीजेपी नेता यह तक कहने लगे थे कि आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 4 सीटों पर आ जायेगी. लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य में कांग्रेस फिर से उभर के आने लगी है और सारे विपक्ष को एकजुट करने में जुटी हुई है.

राज्य के चुनावों में प्रदर्शन

मोदी लहर आम चुनावों के बाद भी रही, अधिकतर राज्यों में उसने सरकार बनाई है. अभी भी रिकार्ड 21 राज्यो में बीजेपी की सरकारें हैं. हालांकि कुछ हार भी उन्हें देखनी पड़ी है जिसमें दिल्ली, पंजाब और बिहार प्रमुख है, हालांकि बाद में बिहार में जोड़ तोड़ कर वापस सरकार में आ गई. वैसा ही गोवा में भी हुआ कांग्रेस को ज़्यादा सीट आने पर भी वहां सरकार बीजेपी ने ही बनाई. लेकिन मज़े की बाद ये रही कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को पद छोड़ वापस मुख्यमंत्री बनाना पड़ा. मणिपुर की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही. पूर्वोत्तर के इस राज्य में भी कांग्रेस को ज़्यादा सीटें आई फिर भी सरकार भाजपा ने ही बनाई.

गुजरात चुनाव

राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस ने बीजेपी को उसके गढ़ में ही कड़ी टक्कर दी. जहां अहमद पटेल की एक राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस की कुछ महीनों पहले हालत खराब हो गई थी वहाँ इस चुनाव परिणाम के रुझानों में में एक वक्त सरकार बनाने के कगार तक कांग्रेस पहुंच चुकी थी. हालांकि भला हो उन सूरत के 15 विधानसभा क्षेत्र की व्यापारीयों का जिन्होंने जी.एस.टी के खिलाफ जनांदोलन तो खड़ा कर दिया पर फिर भी वोट बीजेपी को ही दिया.

कांग्रेस ने भी गुजरात चुनाव में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जिग्नेश मेवाणी जैसा दलित हीरो टाइप नेता मिल गया और हार्दिक पटेल दो साल में पटेल के एक धड़े के राष्ट्रीय  नेता तो बन ही चुके है. दोनों  से कांग्रेस को चुनाव में  फायदा हुआ. गुजरात चुनाव में अगर मणिशंकर अय्यर वो नीच वाला बयान नहीं देते और उन 15-20 सीटों पर अगर बहुत सारे निर्दलीय और बसपा अपने प्रत्याशी न खड़ा करती तो आज परिस्थिति कुछ और ही होती. जो भी हो बीजेपी को 116 सिटों से 99 पर ले आना कांग्रेस के लिए मनोवैज्ञानिक जीत रही.

राजस्थान उपचुनाव

राजस्थान में रानी जी (वसुंधरा राजे सिंधिया ) की अग्नि परीक्षा इसी साल होनी है एक माह पूर्व हुआ उपचुनाव में 3-0 की हार ने उनकी नींद उड़ा कर रख ही दी होगी. कांग्रेस भी 9 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कमर कस ही चुकी है सचिन पायलट पुरे उपचुनाव के दौरान राज्य में ही रहे. हालांकि इन सत्रह विधानसभा क्षेत्रों की जनता का सीधे तौर पर बीजेपी को नकार देना अमित शाह के लिए बड़ा झटका है. पिछले 4 साल में 22 सीटों पर हुए राजस्थान उपचुनाव में 20 पर कांग्रेस ने विजय हासिल किया है. अब देखना होगा राजस्थान में ऊंठ की करवट बैठता है.

वादों से भटकी मोदी सरकार

पिछले साढ़े 3 साल में कई बार ऐसे मौके आये हैं. जहां केन्द्र सरकार अपने काम और योजनाओं से बड़ा माइलेज ले सकती थी पर पार्टी हार्ड लाइन और संघ की विचार धारा ने सरकार को जनता के एक बड़े तबके से दूर कर दिया. जो सरकार नई योजनाओं को लांच कर रही थी वो कहीं न कहीं भीड़ के हमले और गौ रक्षा जैसे मुद्दे से भटक गई. पहले दादरी में हुई गौ रक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा बुजुर्ग अख्लाख़ की हत्या और फिर ऐसे मामलों को झड़ी लग जाना. राजस्थान में पहलू खान की हत्या, फिर ट्रेन में 16 साल के लड़के जुनैद की हत्या , फिर अफराज़ूल , डॉक्टर नारंग, कश्मीर के आईपीएस अयूब पंडित इन मामलो ने अंतराष्ट्रिय मंच पर भी देश की किरकिरी हुई.  

दलितों के खिलाफ हिंसा

भारतीय जनता पार्टी पर बीएसपी प्रमुख मायावती शुरुआत से ही एंटी दलित होने का इल्जाम लगाती रही हैं. केंद्र में बीजेपी सरकार के आने के बाद अगर आंकड़ों पर ध्यान दें तो गौ रक्षकों द्वारा हमले और दलितों पर हमले जैसी घटनाएं में बढोत्तरी हुई है. इस अलावा आधे से अधिक मामले बीजेपी शासित राज्यों में ही घटे हैं. 

नोटबंदी

8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी करने वक्त प्रधानमंत्री ने कई वायदे किये थे. भ्रष्टाचार से मुक्ति, नकली नोटों के प्रचलन को खत्म करना, कालाधन पर प्रहार और आतंकियों की फंडिग को खत्म करना. लोकिन मोदी सरकार अभी तक अपने इस फैसले को लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है. नोटबंदी से जहां एक ओर देश भर में 50 से ज्यादा जानें गईं. लोगों के रोजगार छीन गए. छोटे और मझोले कारोबार पूरी तरह से तबाह हो गए. आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में 15 लाख लोगों का रोजगार चला गया. सिर्फ मुम्बई में 50 पाॅवर लुम के कारखाने बंद हो गए और इसके कारण तीन लाख नौकरियां चली गईं (forbes nov 7 , 2017). सरकार के इस निर्णय से देश की जीडीपी में दो प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली.  

बैंकों का दिवालियापन

जो भारतीय बैंक 2014 तक 45 हज़ार करोड़ से भी ज़्यादा की कमाई कर रही थी. वो 2016 में 480 करोड़ के घाटे में चली गईं.  फिर आया नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स जो पहले भी था, पर इस सरकार ने बैड लोन घोषित करने में रिकार्ड बना दिया. माल्या, नीरव मोदी  टाइप लोग हज़ारों करोड़ का देश को चूना लगाकर फरार हो चुके हैं.  

बेरोज़गारी

ये मुद्दा सबसे बड़ा है और बेहद संवेदनशील है,  सरकार में आने से पहले अपने भाषण में मोदी ने हर साल एक करोड़ लोगों को रोजगार देने का वायदा किया था. लेकिन आंकड़ें कुछ और ही बयां कर रहे हैं मात्र  2015 में 1.55 हजार, 2016 में मात्र  2.31 हजार नौकरियां सरकार पैदा कर सकी है. उपर से नोटबंदी के बाद के दौर में स्टार्ट अप कंपनियों ने 9200 कर्मचारियों को निकाल दिया. आॅनलाईन बिजनेस की माहिर स्नैपडील, येप मी जैसी कंपनियों ने भी कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती की है.(forbes march 17 , 2017 )

    आशुतोष कुमार
( ये लेखक के निजी विचार है )