प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कहा कि बिजनेस करना सरकार का काम नहीं है। उनकी सरकार रणनीतिक क्षेत्र में कुछ सीमित सरकारी उपक्रमों को छोड़कर बाकी सभी सरकारी कंपनियों का निजीकरण करने के लिए प्रतिबद्ध है। मोदी ने कहा कि सरकारी कंपनियों को केवल इसलिए नहीं चलाया जाना चाहिए कि वे विरासत में मिली हैं। मोदी के इस बयान पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी ने उन्हें घेरते हुए टिप्पणी की “हम दो हमारे दो”, वाली सरकार। सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोधी दल और आमजन मोदी को दोष देते हैं। क्या ऐसा करना सही होगा? शायद बिल्कुल नहीं। मोदी सरकार इनके लिए दोषी नहीं है! देश पिछले कुछ समय से बाहरी और आंतरिक, दोनों संकटों का सामना कर रहा है। खराब वित्तीय हालत में सरकार के पास जमापूंजी और संपत्तियों को बेचने के सिवाय कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। इसी क्रम में नीतिकारों ने तमाम सेवाओं को भी निजी हाथों में देने की सलाह सरकार को दी है। इससे दो बातें होंगी, पहली, सरकार नीतियों, सुरक्षा, विदेश और प्रशासन को संभालेगी। दूसरी, विकास और सेवाओं को निजी क्षेत्र में देकर अधिक रोजगार के साथ ही बाबूशाही पर लगाम लगाएगी। इससे सरकारी धन की बचत के साथ ही तमाम कार्य व्यवसायिक तरीके से होंगे। देखा जाता है कि सरकारी नौकरी में आने के बाद योग्य लोग भी काहिल बन जाते हैं, जिससे उनकी उत्पादकता कम हो जाती है। निजी क्षेत्र में बिल्कुल उलट होता है। वहां कम योग्य लोग भी बेहतर परिणाम देते हैं।

देश में महंगाई वैश्विक आंकड़ों में चरम पर है। पेट्रोल के दाम सैकड़ा पार कर रहे हैं, तो डीजल उसकी बराबरी करने को आतुर है। इस वक्त बेरोजगारी एक गंभीर संकट की तरह सामने खड़ी है। युवाओं को न निजी क्षेत्र में सुयोग्य रोजगार मिल रहे हैं और न ही सरकारी क्षेत्र में नौकरियां। विश्व में सबसे अधिक बेरोजगार युवाओं की फौज भारत में तैयार हो रही है। हमारी अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे बदतर और नकारात्मक हाल में है। सीमा पर पाकिस्तान, चीन और नेपाल हमारी जमीनों पर अतिक्रमण करने में लगे हैं। महिलायें और बच्चे यौन अपराध का हर रोज शिकार हो रहे हैं। न व्यापारी सुरक्षित है और न आमजन। ऐसी संकट की घड़ी में किसानों के हित के नाम पर बने तीन कृषि सुधार कानूनों को, किसान ही काला कानून बता आंदोलनरत हैं। इस आंदोलन में सवा दो सौ किसान शहीद हो चुके हैं। सरकार ने उनके प्रति संवेदना दिखाते हुए श्रद्धांजलि भी नहीं दी है। कोविड-19 महामारी के चलते देश बरबादी के कगार पर खड़ा है। वैसे देश की माली हालत कुछ वर्षों में बद से बदतर हुई है। अर्थव्यवस्था कोविड-19 के पहले ही चरमरा गई थी। कोविड महामारी के दौर में वह ऐतिहासिक रूप से गर्त में चली गई। इन संकटों से जूझने के लिए सरकार ने जो प्रयास किये, वह नाकाफी रहे। अंततः सरकार को कारपोरेट जगत से ही कुछ उम्मीद है, जिससे उनको साधने की नीति अपनाई गई। इसी कारण महाराष्ट्र कैडर के एक आईएएस अधिकारी को देश के वित्त सचिव की कुर्सी पर बैठाया गया। उनसे उम्मीद की गई कि वह कारपोरेट के साथ बेहतर राफ्ता बनाएं। यही कारण है कि अब सरकार निजीकरण के सहारे नैय्या पार लगाना चाहती है।  

मोदी सरकार की आर्थिक मामलों की पूर्व सलाहकार दिव्या सतीजा और वित्त मंत्रालय के आर्थिक विभाग की अधिकारी डॉ प्रसन्ना वी सालियन ने जानकारी दी कि अवसंरचना में भारत के निवेश में वृद्धि हो रही है। यह 2008 से 2012 के बीच 24 लाख करोड़ रुपये थी, जो बढ़कर 2013 से 2019 के बीच 56.2 लाख करोड़ रुपये हो गई। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि इस दौरान रुपये का अवमूल्यन और महंगाई भी अनुपात में बहुत अधिक बढ़ी है। उन्होंने कहा इस दौरान, अवसंरचना के वित्तपोषण का करीब 70 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्र से आया और शेष वित्तपोषण निजी क्षेत्र ने किया। वे इस अनुपात को भारत में अवसंरचना वित्तपोषण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हिस्सेदारी नहीं मानती हैं। उनका मत है कि इसके उलट निजी भागीदारी होनी चाहिए, यानी 70 फीसदी निजी और 30 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्र से। हम भले ही इनके मत से सहमत नहीं हों मगर सरकार इससे पूरी तरह सहमति दिखा रही है। यही कारण है कि मोदी सरकार ने निजीकरण पर जोर दिया है। इसे लेकर सरकार पर निजी और कारपोरेट घरानों को मदद पहुंचाने का आरोप लगा है। एक सच यह भी है कि जब नीति बनाने वाले ही निजीकरण की ओर चलेंगे, तो सरकार क्या करेगी? कृषि सुधारों को लेकर यूपीए सरकार में भी प्रस्ताव यही बाबूशाही लेकर आई थी मगर तत्कालीन सरकार ने संसद में चर्चा के दौरान, जब इसे उनके हित में नहीं पाया तो रोक दिया था। अब उसी अफसरशाही ने उससे भी कड़ा कानून बनवा लिया। यह बाबूशाही तो हमारे बीच से ही आती है। ऐसे में सवाल उठता है कि हम हर बार मोदी सरकार को ही कटघरे में खड़ा क्यों करें? भारी पगार-भत्ते, सुरक्षा और सुविधायें लेकर भी सरकार को जनहित के अनुकूल नीतियां-कानून बनाने के लिए यह बाबूशाही प्रस्ताव तैयार क्यों नहीं करती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वही इस पूरे खेल की मास्टरमाइंड हो!

विषय यह नहीं है कि दोषी कौन है? विषय यह है कि जनहित के खिलाफ काम करने और नीतियां बनाने की शक्तियां इन्हें किसने दी हैं? जब हम इसे खंगालते हैं तो पता चलता है कि लोक सेवाओं के प्रशिक्षण में ही खामी है। जो लंबे समय से जनता के लिए योग्य नौकर बनाने के लिए दिया जा रहा है। अधिकारों से युक्त इन नौकरों को हम शक्तियां, इसलिए नहीं दे रहे कि वह जनता के लिए काम करें, बल्कि इसलिए दे रहे हैं कि वह सत्ताधीशों के हितों को साधने का काम करें। हालांकि संविधान उन्हें लोक सेवक कहता है मगर कुछ वक्त से सरकार ने उन्हें सुप्रीमों बना दिया है। यही कारण है कि वे अब सुप्रीमो की तरह से सोचते और करते हैं। दूसरी तरफ, जनता भी दोषी है क्योंकि वह मुद्दों, समस्याओं और विकास के लिए मतदान नहीं करती। वह तो तुष्टीकरण के लिए सरकार चुनती है। उसने जिस काम के लिए जिसे सत्ता सौंपी है, वे वही काम तो कर रहे हैं। इसके साथ ही वह अपनी अगली पारी खेलने की तैयारी करने में भी जुटे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार से भी शिकायत नाजायज है। मौजूदा सरकार के पिछले कामकाज पर मुहर लगाते हुए, जब आपने चुना है, तो उसकी खामियों के लिए भी आप ही दोषी हैं, वह नहीं। अगर चयन हमारा गलत होता है, तभी नकारात्मक नतीजे आते हैं।

संविधान में सरकार बनाने और गिराने की शक्ति आम नागरिक के हाथ में समान रूप से दी गई है। ऐसे में अगर सरकार की किन्हीं नीतियों-कार्यों के कारण समस्यायें या संकट खड़े होते हैं, तो उसके लिए सरकार से अधिक वह नागरिक जिम्मेदार होते हैं, जिन्होंने उसे बनाया है। हमारे देश में एक चलन चल पड़ा है कि सरकार को गालियां दीजिए। विपक्ष अगर सरकार पर सवाल उठाता है, तो उसे पूरा हक है क्योंकि आपने उसे इस कार्य के लिए चुना है, मगर जब वे नागरिक सवाल उठाते हैं, जिन्होंने सरकार बनाई है, तब सबसे पहले वही दोषी होते हैं। इसके लिए उन्हें पश्चाताप करना चाहिए, न कि सरकार को दोष देना चाहिए। सोचिये, समझिये और सही चयन कीजिए। आत्मनिर्भर बनिये।       

जय हिंद!

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(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक मल्टीमीडिया हैं)