Ajay Shukla Exclusive Column: केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों का जब पंजाब के किसानों ने विरोध शुरू किया, तो यह प्रचारित किया जाने लगा कि यह पाकिस्तान पोषित है. यह फैलाया गया कि विरोध करने वाले किसान खालिस्तान समर्थक हैं. जब किसानों ने दिल्ली कूच किया तो मीडिया के एक वर्ग ने कहा कि उनकी रैलियों में खालिस्तान पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं. यह भी कहा गया कि आंदोलन में पाकिस्तानी घुसपैठिये शामिल हैं. दिल्ली जाने की राह में उन्हें जगह-जगह रोका गया. मारा गया और तमाम संकट खड़े हुए. किसान सदैव संघर्ष में जीता है, तो वह डरा नहीं और दिल्ली पहुंच गया. इस आंदोलन में शनिवार तक आधा दर्जन किसान शहीद हो चुके हैं. कई बुजुर्ग अपने परिवार के साथ भी धरना देने पहुंचे हुए हैं. कथित राष्ट्रवादी समर्थक एक फिल्मी महिला ने बठिंडा से दिल्ली पहुंची 80 वर्ष की दादी की फोटो ट्वीट करके उन्हें 100 सौ रुपये में पहुंचने वाला बताया. उसके झूठ को मीडिया के एक वर्ग ने खूब प्रचारित करके इसे राष्ट्रद्रोही आंदोलन तक बता दिया. वक्त रहते, किसानों ने सोशल मीडिया के जरिए सच्चाई बयां की. उन्होंने आंदोलन में शामिल दादी के घर, गांव से लेकर मौके तक की तस्वीर साफ कर दी. रोज ब रोज इस तरह किसी न किसी विरोधी का चरित्र हनन करने की साजिशें कुछ बड़े मीडिया घराने कर रहे हैं जिनके खिलाफ अब किसान भी खड़ा हो गया है. इसी मीडिया ने सुशांत सिंह और रिया चक्रवर्ती प्रकरण में उनका चरित्रहनन करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता खत्म कर दी है.

आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओवामा की किताब के कुछ पन्नों को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया था. उसमें मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का चरित्रहनन करने की कोशिश भी मीडिया के जरिए की गई थी. असल में बराक ने अपनी किताब में लिखा है कि ‘‘राहुल गांधी के बारे में यह कि वे स्मार्ट और जोशीले नज़र आए. उनका सुदर्शन दिखना उनकी माँ के साथ मेल खाता था. उन्होंने प्रगतिशील राजनीति के भविष्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए. बीच-बीच में वे मुझसे मेरी 2008 की चुनावी रणनीति के बारे में भी जानकारी ले रहे थे. कभी वे नर्वस और अनाकार भी नज़र आए, जैसे एक छात्र जिसने अपना होमवर्क पूरा कर लिया है और उसे अपने टीचर को बताने को उत्सुक है, पर उसके अंदर कहीं या तो विषय में महारत के कौशल अथवा उसके प्रति अनुराग का अभाव है. हमें पिछले कुछ चुनावों के दौरान की भी घटनाएं याद हैं जब राहुल गांधी को अपरिपक्क साबित करने के लिए या तो दूसरों के बयानों पर उनकी टिप्पणी को कांट छांटकर या फिर फर्जी आवाज और हरकत डालकर उनका चरित्रहनन किया गया था. हमें शाहीनबाग और लखनऊ में एनआरसी के खिलाफ हुए आंदोलन में किये गये चरित्रहनन की भी याद होगी. इसके चलते दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए. इस मीडिया रिपोर्टिंग के कारण ही निजामुद्दीन मरकज की गतिविधियों को भी बदनाम किया गया. उन्हें कोरोना महामारी फैलाने का दोषी बताया गया. अब वही मीडिया अपने अन्नदाता के आंदोलन का चरित्रहनन करने पर उतारू है.

निर्भीक और निष्पक्ष मीडिया लोकतंत्र की ताकत होता है. उसकी नैतिक जिम्मेदारी है कि वह सही और लोकोपयोगी जानकारी आमजन तक पहुंचाये। वह सरकार और समाज को प्रभावित करने वाले कार्यकलापों की समीक्षा करे. उसका काम न तो चरित्रहनन है और न ही किसी के लाभ के लिए झूठ को सलीके से परोसना. जब भी मीडिया स्वार्थ में फंसकर चरित्रहनन और झूठ को परोसता है, तो उनका विश्वास खत्म होता है. ऐसे में वह लोकतंत्र का स्तंभ बनने के बजाय उस इमारत को गिराने वाले जर्जर खंबे में तब्दील हो जाता है. अंग्रेजी हुकूमत को जब भारत से उखाड़ फेकने की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब का मीडिया उस आंदोलन की आवाज बनता था. हुकूमत के खिलाफ सत्य को सामने लाता था. उस वक्त के मीडिया संचालकों को भी सच सामने लाने के कारण तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता था. उस वक्त अंग्रेजी सरकार ने बांटो और राज करो की नीति अपनाई थी मगर तब का मीडिया दबा नहीं. कुछ संगठनों को तब भी अंग्रेजों ने अपनी गोद में बैठाकर तमाम लाभ दिये. आज वही नीति देश में अपनाई जा रही है. कभी किसान को, कभी जातियों और धर्मों की गंगा-जमुनी संस्कृति को, तो कभी क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर देश के लोगों को बांटकर सत्ता स्थापित की जा रही है. सत्ता की नीतियों का विरोध करने वालों का चरित्रहनन करने के लिए मीडिया का प्रयोग किया जा रहा है. यह प्रयोग बिहार चुनाव में भी दिखाई दिया, जहां लालूराज से लेकर उनके मौजूं परिवार तक को शिकार बनाया गया.

हमने हैदराबाद के नगर निगम चुनाव में देखा कि वहां हिंदू और मुस्लिम कार्ड खुलकर खेला गया. एमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यहां प्रायोजित तरीके से मुस्लिमों के पक्ष में नफरत बोई तो उसकी फसल हिंदूओं की हितकारी बनकर भाजपा ने काटी. ओवैसी ने जितना कड़ुआ बोला, हिंदू मतदाताओं का उतना ही ध्रुवीकरण हुआ. इससे दोनों दलों को भारी फायदा मिला. यही खेल बिहार में खेला गया था, जिससे सत्ता में आता दिख रहा महागठबंधन बाहर हो गया था. अब यह प्रायोजित सियासी खेल पश्चिम बंगाल में भी खेले जाने की तैयारी है. इतिहास के पन्नों को खंगालें तो आपको पता चलेगा कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान कट्टर हिंदू और मुस्लिम वाद करके ही हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने तीन बड़े राज्यों बंगाल, सिंध और पश्चिम सीमांत सरहदी सूबा में जीत हासिल कर सांझा सरकार बनाई थी. नतीजतन जब देश आजाद होने लगा, तब इन राज्यों में सबसे अधिक सांप्रदायिक की हत्यायें हुईं. कहीं हिंदू अधिक मरे तो कहीं मुसलमान, जबकि दोनों दल एक दूसरे समुदाय के खिलाफ आग उगलते थे. देश के बंटवारे का प्रस्ताव सबसे पहले इन्हीं दोनों ने पास किया था. हम इसका उदाहरण इसलिए दे रहे हैं क्योंकि आज भी वही इतिहास दोहराया जा रहा है.

हमारा अन्नदाता भारी ठंड और तकलीफ सहकर भी न सिर्फ अपने लिए बल्कि पूरे देशवासियों के लिए लड़ाई लड़ रहा है. इन कृषि कानूनों में जो मंशा छिपी है, वह बड़ी घातक है. केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि अगले वित्तीय वर्ष में भारत 60 बिलियन का कृषि निर्यात करे. भारत में इस वक्त करीब 20 लाख करोड़ का कृषि कारोबार है. रिटेल में यह व्यवसाय 12 हजार अरब से अधिक का है, जिसके बूते भारत विश्व में छठे नंबर का निर्यातक देश है. यही कारण है कि जब जीडीपी ऋणात्मक है तब भी कृषि क्षेत्र में 3.4 फीसदी की वृद्धि दर मिली है. रिटेल के धंधे में सत्ता का करीबी एक कारपोरेट घराना उतर चुका है, तो उसके भंडारण के क्षेत्र में दूसरा सत्ता चहेता घराना अपने पांव पसार रहा है. अकेले मध्य प्रदेश में अडानी समूह के भंडारगृह में खरीदे गये तीन लाख मैट्रिक टन से अधिक गेहूं को रखा गया है. भविष्य में पीडीएस योजना के तहत आने वाले करीब 24 करोड़ लाभार्थियों को भी इन्हीं भंडारगृहों से आपूर्ति कराने की तैयारी है. यही कारण है कि सरकार ने कानून में बदलाव करते वक्त भी एमएसपी का जिक्र नहीं किया. कांट्रेक्ट फार्मिग के मामले एसडीएम स्तर पर निपटाने के नाम पर किसानों की जमीनों पर तलवार लटका दी है. असीमित भंडारण करने का अधिकार देकर कारपोरेट के हाथों में देशवासियों का निवाला सौंप दिया है. साफ है कि विश्व का सबसे महंगा सौदा अपने कुछ खास कारपोरेट घरानों को सौंपने की मंशा इन कानूनों में छिपी है.

पंजाब का किसान न सिर्फ शिक्षित है बल्कि वह कृषि के उन्नत उत्पादन और व्यवसाय को भी बेहतर तरीके से समझता है. उसके लाखों परिजन विश्व के तमाम देशों में भी कृषि को उन्नत बना रहे हैं. ऐसे में वह कानूनों की पेंचीदगियों को भी बेहतर समझता है. यही कारण है कि वह न सिर्फ देश में बल्कि उसके बाहर भी इसका विरोध कर रहा है. यह विरोध खालिस्तान के लिए नहीं बल्कि देश के हित में किया जा रहा है. यह भविष्य में देश को बचाने का आंदोलन है, न कि तोड़ने का. यह जरूर है कि इस आंदोलन को तोड़ने के लिए बांटो और राज करो की नीति अपनाई जा रही है. इसके लिए मीडिया का सहारा लेकर विरोधियों का चरित्रहनन किया रहा है. सच को तो हमें ही पहचाना होगा.