मोदी आखिरकार एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने महान क्रांतिकारी भगत सिंह व उनके दो सहयोगियों, राजगुरु और सुखदेव द्वारा हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए दिए गए महान बलिदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है. तीनों क्रांतिकारियों के शहीद दिवस, 23 मार्च को पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनीवाला में जाकर नरेंद्र मोदी ने तीनों जांबाज क्रांतिकारियों के साथ उन लाखों भारतीयों के योगदान को याद किया जिन्होंने इस देश को स्वतंत्रता दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई. नरेंद्र मोदी की इस यात्रा ने कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्या कारण हो सकता है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री यह कार्य नहीं कर सके, जो मोदी ने 23 मार्च को किया.

स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे बड़े नायक का नाम लेने के लिए अगर आज एक जनमत सर्वेक्षण करवाया जाए तो भगत सिंह का नाम सबसे शीर्ष पर रहने को लेकर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जाएगा. अत्यंत कृतज्ञता और श्रद्धा के साथ उनको याद करने के साथ, हम भी एक प्रकार से उन अनगिनत शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जो गुमनाम मौत के आगोश में समा गए. न ही उनका नाम किसी को पता है और न ही उनकी तस्वीर किसी ने देखी, लेकिन उन्होंने अपने ढंग से अंग्रेजों पर इस देश को छोड़ कर चले जाने के लिए दबाव बनाया. भगत सिंह की फांसी को अक्सर, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान न्याय की सबसे बड़ी विफलता के रूप में वर्णित किया जाता है. जब वह अपने दो मित्रों के साथ फांसी के तख्ते पर चढ़े, तब उनकी आयु केवल 23 वर्ष की थी. उन्हें मौत का भय नहीं था और फांसी पर चढ़ने से कुछ दिन पहले उन्होंने अपनी मां को बताया था कि उन्हें उनके पार्थिव शरीर को लेने के लिए खुद नहीं आना चाहिए, बल्कि किसी और को भेजना चाहिए क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि उनकी मां को कोई रोता हुआ देखे. 

भगत सिंह एक सच्चे क्रांतिकारी थे और अराजकतावादियों के साथ-साथ मार्क्स एवं एंगल्स से काफी हद तक प्रभावित थे. वह अपने जीवन में बहुत पहले ही नास्तिक बन गए थे, हालांकि एक समय उन्होंने आर्य समाज के सिद्धांतों का अनुपालन किया था. वह क्षमादान के लिए निवेदन भी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मौत को गले गलाया ताकि शासकों को दिखा सकें कि वे क्रांतिकारियों को तो मिटा सकते हैं लेकिन उनके विचारों को नहीं मिटा सकते. उस समय भारत की आजादी का विचार युवाओं को बहुत प्रिय था और विदेशी शासकों द्वारा लगातार बल व  आक्रामकता, युवाओं को अपना लक्ष्य प्राप्त करने से नहीं रोक सका. राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारी कवियों से प्रेरित होकर भगत सिंह ने अपना मार्ग खुद चुना, जो महात्मा गांधी और कांग्रेस द्वारा अनुसरण किए गए मार्ग से बिलकुल अलग था. वह उन सभी लोगों को मार सकते थे जो मौके पर मौजूद थे लेकिन अपनी पार्टी की मांगों की ओर ध्यान आकर्षित करवाने के लिए, उन्होंने अपने मित्र बकुटेश्वर दत्त के साथ, उस समय पुराने सचिवालय स्थित नेशनल असेंबली पर नकली बम फेंका. हैरानी की बात ये है कि पुराने सचिवालय में भगत सिंह की कोई भी प्रतिमा नहीं है और अगर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसा कर सकते हैं तो वह एक बहुत अच्छा कार्य करेंगे. प्रतिमा उनके योगदान को चिन्हित करेगी और भावी पीढ़ी को उनके महान बलिदान की याद दिलाएगी. यह उनके प्रति एक योग्य श्रद्धांजलि होगी. 

भगत सिंह ने लाहौर में जेपी सांडरस गोलीकांड में भी हिस्सा लिया था. यहां उन्हें गलती से अमृतसर में जलियांवाला बाग में निर्दोष भारतीयों के नरसंहार में सबसे आगे समझ लिया गया था पर वह भगत सिंह की गदर पार्टी के सहयोगी ऊधम सिंह थे, जिन्होंने मार्च 1940 में, लंदन में माइकल डायर की गोली मार कर हत्या की और अंतत: जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लिया. भगत सिंह की तरह ऊधम सिंह को भी ब्रिटिश सरकार ने फांसी की सजा दी थी. उस समय ऐसा था क्रांतिकारियों का जोश व समर्पण, जो एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते थे और एक-दूसरे के बलिदान और सर्मपण से प्रेरणा लेते थे. 

अपने जीवन के अंतिम तीन वर्षों में वह क्लीन शेव रहते थे और उनका सर्वविदित चित्र उन्हें हैट पहने दिखाता है, जबकि संसद भवन परिसर में स्थापित प्रतिमा उन्हें पगड़ी में चित्रित करती है और स्वामी विवेकानंद से अधिक मेल खाती है. अब सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन लोगों ने वर्ष 2007 में, संसद भवन परिसर में भगत सिंह की प्रतिमा को खड़ा किया था, उन्हें जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए और दंडित किया जाना चाहिए क्योंकि वह प्रतिमा इस महान क्रांतिकारी के साथ बिलकुल मेल नहीं खाती. 1970 के दशक में, मुख्यमंत्री के रूप में ज्ञानी जैल सिंह ने भगत सिंह की मां को पंजाब माता का दर्जा प्रदान कर उनकी भूमिका को मान्यता दी थी जो उस समय जीवित थीं. लेकिन भगत सिंह केवल पंजाब की शख्सियत ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय नायक भी थे. उनके अंतिम शब्द थे ‘दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू ए वतन आएगी.’ भगत सिंह हमारे स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी धारा के प्रतीक हैं. एक ऐसी धारा, जो काफी हद तक अपरिचित रह गई है. यह वे साहसी पुरुष थे जिन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए लेकिन किसी से कुछ मांगा नहीं. वे हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
 पंकज वोहरा ‘द सण्डे गार्जियन’ के सम्पादक हैं.