संसद व पर्याप्त संख्या में राज्य विधानसभाओं में पारित होने के बावजूद भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) की स्थापना पर 99वें संवैधानिक संशोधन व साथ ही इसके उपनिगमन को भी निरस्त कर दिया है.स्पष्ट है कि राजग सरकार द्वारा नियुक्त विधि अधिकारी अपनी श्रेष्ठता व प्रवीणता के बावजूद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना और 99वें संवैधानिक संशोधन को बरकरार रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विश्वास में नहीं ले सके. दिलचस्प बात यह है कि एनजेएसी मामले की सुनवाई कर रही सर्वोच्च न्यायालय न्यायपीठ के समक्ष तर्क-वितर्क के दौरान राजग विधि अधिकारियों ने असामान्य रूप से आक्रामक व्यवहार का प्रदर्शन किया.उनमें से एक अधिकारी ने तो यहां तक कह डाला कि राजग सरकार ने 26 मई 2014 को शपथ लेने के साथ ही मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा द्वारा 1993 में शुरू की गई न्यायधीशों को नियुक्त करने की प्रणाली को ‘कब्रिस्तान में भेज दिया.’
 
यह तो साफ है कि कब्रिस्तान में गड़े मुर्दों को पुनर्जीवित तो नहीं किया जा सकता, इसलिए विद्वान विधि अधिकारी का आशय था कि कॉलेजियम का अंत जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसे देश का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिए जाने वाला निर्णय प्रभावित नहीं कर सकता.विधि अधिकारियों द्वारा खुली अदालत में वर्णित न्यायिक कार्यपद्धति के विवरण के अलावा यह खुलासा भी किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के एक विशेष न्यायाधीश ने 172 फैसलों में भाग लिया लेकिन उसने स्वयं इनमें से केवल दो फैसलों का निर्धारण अपनी कलम से किया.अदालती फैसला न लिखने का मतलब एक फैसले के गठन की प्रक्रिया में गैर-भागीदारी नहीं होता इसलिए विधि अधिकारियों द्वारा किया गया कटाक्ष थोड़ा अशुद्ध प्रतीत होता है. उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं उसके कामकाज में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने की अहमियत को स्वीकार करेगा.उदाहरण के लिए, देशभर में अदालती कार्यवाही का इंटरनेट पर सीधा प्रसारण सुनिश्चित कराने के माध्यम से जनता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच सीधा संपर्क स्थापित किया जा सकता है.सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा अदालत को पदोन्नत किए जाने वाले नामों की विचाराधीन सूची को नामित वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि कानूनी विलंब से अक्सर उलझन में फंसी जनता की टिप्पणियों को आमंत्रित किया जा सके. अगर राजग सरकार एकबार फिर विधायी प्रक्रि या के माध्यम से होकर गुजरने का निर्णय लेती है और निरस्त किए गए संवैधानिक संशोधन की तर्ज पर संविधान संशोधन को पारित कराने का प्रयास करती है तो सर्वोच्च अदालत द्वारा एक बार फिर उसी निर्णय को दोहराए जाने की प्रबल संभावना है.
 
जाहिर है कि सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि संविधान का मूल ढांचा कार्यपालिका से न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समावेश को अनिवार्य बनाता है और न्यायधीशों के चयन में से विधायी और कार्यकारी शाखाओं की भागीदारी को सीलबंद करके एक तरह की स्वायत्तता को सुनिश्चित किया जा सकता है.ऐसे मामले में सरकार के समक्ष बेहतर विकल्प यह होगा कि वो खुद पारदर्शिता और जिम्मेदारी में एक मिसाल कायम करे.अगर न्यायाधीशों द्वारा अपने ही भाइयों से संबंधित मामलों पर फैसला लेने की शिकायत आ रही है तो सूचना के अधिकार के कानून के तहत स्थापित अनगिनत सूचना आयोगों का क्या होगा? तब भी, सूचना आयोगों को चलाने के लिए सदैव सेवानिवृत्त अथवा सेवारत अधिकारियों की नियुक्ति की अनुपयुक्तता को न ही यूपीए और न ही राजग समझ सकी है.अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शीघ्र ही अपने कार्यकाल के तीसरे वर्ष में प्रवेश करेंगे, यह वांछनीय है कि वह ऐसे निकायों में नागरिक समाज की प्रधानता को सुनिश्चित करें. वर्ष 2011 से यूपीए सरकार द्वारा सूचना के अधिकार को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया था और सार्वजनिक हित में जानकरी छुपाने की अफसरशाही की औपनिवेशिक युग की आदत को दूर करके इस प्रवृत्ति को उलटने की आवश्यकता है.इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री मोदी को केन्द्रीय सेवाओं सहित प्रत्येक विभाग को गैर-सरकारी नियुक्तियों से भरने की आवश्यकता है ताकि चयन के लिए उपलब्ध इस जीवंत राष्ट्र के कहीं अधिक बड़े भंवर को महत्वपूर्ण पदों को भरने के लिए उपयोग में लाया जा सके.
 
जब हरियाणा के मुख्यमंत्री चेतावनी देते हैं कि गोमांस खाने वाले व्यक्ति भारत में रहने लायक नहीं हैं, तब क्या वह यह कहना चाहते हैं कि उनके राज्य में जापानी, दक्षिण कोरियाई व गोमांस खाने वाले अन्य निवेशकों को वापस चला जाना चाहिए? जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री चेतावनी देते हैं कि वह अदालतों की अवहेलना करेंगे और रेस्तराओं में नाच-गाने पर प्रतिबंध लगाने की आरआर पाटिन की विरासत को जारी रखेंगे, तब क्या वह नाच-गाने देखने के शौकीन उन इच्छुक निवेशकों को यह संदेश दे रहे हैं कि उन्हें अपना धन कहीं और निवेश करना चाहिए? चाहे यह गोमांस प्रतिबंध हो या भारत के लोगों को संतों में बदलने के लिए कानून और पुलिस का इस्तेमाल करने वाले अन्य प्रयास हों या फिर इंटरनेट से व्यापक सामग्री हटाने के नवीनतम प्रयास, यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐसे समर्थक उनकी छवि व उनके लक्ष्य को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. समय आ गया है कि उन चुनिंदा भ्रमित लोगों पर नकेल कसी जाए जिन्हें यह गलतफहमी है कि इस देश के लोग उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण को स्वीकार कर लेंगे.यह परिपक्व लोकतंत्र व्यवहार के सर्वथा विपरीत है.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)