सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में उल्लिखित पंक्तियों की तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने जस्टिस शाह विशेष जांच दल का गठन किया था और इसके गठन होने के बाद से यह कई बार बैठ चुका है. जैसा कि आशा की जाती है कि सामाजिक बीमारियों के लिए वकील आमतौर पर नए अथवा मौजूदा कानूनों को सर्वरोगना शासक औषधि के रूप में मानते हैं, एक ऐसी राय जिसे टीवी एंकरों द्वारा बड़े चाव के साथ ग्रहण किया जाता है. प्रेस रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि विशेष जांच दल की कई बैठकों ने अपचारी व्यवहार पर और अधिक कानूनी शिकंजा कसने के लिए परिकल्पित सिफारिशों की झड़ी लगा दी है.

भारत में कानूनों की संख्या को देखते हुए, जिनमें कुछ तो औरंगजेब के शासनकाल के दौरान प्रचलित कानूनों पर आधारित हैं. कई लोगों को शायद यह समझने में कठिनाई हो कि आखिर कानूनों का एक और संग्रह स्थिति में किस प्रकार सुधार लेकर आएगा, विशेष रूप से ऐसी स्थिति में जहां व्यापारिक अथवा राजनीतिक हितों के इशारों पर कार्य कर रहे अधिकारियों द्वारा लगाए गए आरोपों से खुद को निर्दोष करने की जिम्मेदारी नागरिक पर है.
विपरीत लिंग के साथ किसी भी प्रकार के संपर्क अथवा संचार का प्रयास कर रहे किसी भी असावधान पुरुष के खिलाफ मामला दर्ज करने को अपेक्षाकृत सरल बनाने के साथ, महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर मौजूदा कानूनों में संकलित जेएस वर्मा की सिफारिशों के कार्यान्वयन ने निश्चित रूप से स्थिति में सुधार नहीं किया है. 

भारत में हमारे औपनिवेशिक युग के कानूनों का इस्तेमाल अक्सर विदेशों में शिक्षा ग्रहण कर रहे बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन करने के लिए अथवा ऐसे शानदार एवं आलीशान मकान के निर्माण के लिए किया जाता है, जैसे घर में पूर्व प्रधानमंत्री के पूर्व मुख्य सचिव ने अपने पद से इस्तीफा देने के बाद प्रवेश किया जबकि इससे पहले वह वसंत कुंज के साधारण अपार्टमेंट में रहता था. उसके बच्चे भी उसी तरह से अधिक शानदार मकानों में रहने के लिए चले गए जैसा कि ऐसे कुलीन घराने की संतानों को करने के लिए अक्सर जाना जाता है, स्वाभाविक रूप से उन सभी सरकारी एजेंसियों से दमन की ओर, जिन्हें ठीक ऐसी ही जानकारियों पर नजर रखने के लिए और इस विषय पर कानून की भूल-भुलैया की उल्लंघना करने वालों को दंडित करने का काम सौंपा गया है. 

उस जानकारी के अतिरिक्त जो उसे अकस्मात् रूप से प्राप्त हुई है, इस देश के नागरिकों द्वारा विदेशों में अवैध रूप से संग्रहित धन को वापस लाने की दिशा में सरकार कुछ ठोस कदम नहीं उठा पाई है. ऐसे व्यक्तियों से उनके खुद के नाम से विदेशी बैंकों में खाते संचलित करने की आशा करना थोड़ा निष्कपट प्रतीत होता है. विदेशों में अवैध धन संग्रहित करने वालों में से लगभग सभी ने या तो अपने रिश्तेदारों अथवा मित्रों के खातों में पैसे रखे होंगे, जिन्हें किसी खास मकसद से अनिवासी भारतीय बनाया गया है, या फिर ऐसे खातों के लिए नामांकनों की शृंखला तैयार करने के लिए करमुक्त देशों में प्रचुर संख्या में उपलब्ध कानूनी और लेखा सेवाओं का लाभ उठाया होगा, जिनकी गोपनीयता को भेदना फलस्वरूप लगभग नामुमकिन होगा। जहां तक अमेरिकी बैंकों में खाताधारकों का संबंध है, ऐसे खाताधारकों के लिए अमेरिकी प्राधिकरण द्वारा नागरिकों के बैंक खातों का विवरण उनके संबंधित देशों को देने की खबर और अमेरिकी सरकार के साथ प्रोटोकॉल पर वास्तविक हस्ताक्षर करने के बीच कई महीनों का अंतराल उनके खातों को खाली करने के लिए पर्याप्त था.

इससे यह सुनिश्चित हो गया कि विदेशों में काले धन पर कानून के परिणाम के रूप में भारत सरकार अंतत: कुल मिलाकर वही कर पाएगी जिसका उल्लेख शाह विशेष जांच दल द्वारा किया जाएगा जो महज एक व्यंग्यात्मक आंकड़ा भर है और समापहारी करारोपण व कालेधन पर दंड का खुलासा करने के माध्यम से सरकार ने सुनिश्चित किया है कि विदेशों में  अवैध रूप से संग्रहित काले धन को वापस लाने में नए कानून की सफलदता दर शाह विशेष जांच दल की बैठकों से उत्पन्न सफलता दर जितनी कमजोर होगी. 
सौभाग्य से नॉर्थ ब्लॉक के दिग्गजों ने पहले से ही घोषणा कर दी है कि काले धन पर कानून ‘राजस्व जुटाने का उपाय’ नहीं था. अगर विदेशों में अवैध रूप संग्रहित काले धन को वापस लाकर धन जुटाना उद्देश्य नहीं था तो इस वर्ष के बजट भाषण में उल्लिखित कानून का मकसद, शायद, नॉर्थ ब्लॉक की नौकरशाही का मसौदा तैयार करने के कौशल को तीव्र करना था. जिस समय तक वर्ष 2017 में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव और दो वर्ष पश्चात लोकसभा चुनाव निकट होंगे, अगर भारत सरकार द्वारा वापस लाई गई रकम निरर्थक व तुच्छ हुई तो इसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भाग्य पर ठोस असर होगा जिनकी पार्टी में मतदाताओं ने काला धन वापस लाने का भरोसा दिखाया था. उनकी सफलता, अथवा इसका अभाव, भविष्य के चुनावी अभियान में प्रमुख कारक सिद्ध होगा. समस्या यह है कि जो लोग शासन की वर्तमान औपनिवेशिक व्यवस्था में दशकों से डूबे हैं, उन्हें शायद अपने तौर-तरीकों को बदलनें में कठिनाई हो.

हाल में सेवा कर में की गई बढ़ोतरी को लीजिए, एक ऐसा उपाय जिसका भारत में रोजगार सृजन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है. दरों में और अधिक बढ़ोतरी करने के बजाय, इसे कम से कम 10 फीसदी तक घटाने से अनुपालना व अत: संग्रह में वृद्धि होती. एक ऐसा तथ्य, जिससे व्यावहारिक दृष्टिकोण वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से अवगत होंगे. जब तक वह दिल्ली में शासन प्रक्रियाओं को उस तरह बदलने में सफल नहीं होंगे जैसे गुजरात में हुए थे, जो कुछ भी दिल्ली में हुआ वही भविष्य में भारत के शेष राज्यों में भी हो सकता है. साउथ बलॉक में विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय से भी अधिक यह नॉर्थ ब्लॉक और विशेष रूप से गृहमंत्रालय और वित्त मंत्रालय हैं जो 2019 के लोकसभा चुनावों का परिणाम तय करेंगे.
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
  प्रो. एम. डी नलपत वरिष्ठ पत्रकार हैं.