हम समृद्ध भारत के ख्वाब देखते हैं मगर उसके लिए करते कुछ नहीं हैं. हम ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की बातें करते हैं मगर हमारा आचरण उसके विपरीत ‘स्व हिताय, स्व सुखाय’ का होता है. हम ‘ईमानदारी और पारदर्शिता’ का पाठ पढ़ाते हैं मगर ‘बेईमान’ सोच के साथ काम करते हैं. हमारी स्थिति यह है कि हम किसी महिला के शरीर पर कम कपड़ों को देखकर उस पर आदर्शवादी टिप्पणी करते हैं जबकि उसको बार-बार देखने का बहाना खोजते हैं. हम झूठ न बोलने और पूरी जानकारी देने का ‘शपथ पत्र’ दाखिल करते हैं जबकि उसमें झूठ और तथ्यों को छिपाया गया होता है. इन सब के बाद हम अपेक्षा करते हैं कि हमें ब्रिटेन-कनाडा और अमेरिकी नागरिकों की तरह ‘ट्रीट’ किया जाए. 
आपको पता है कि यूरोपियन राष्ट्र हों या अमेरिकी सभी जगह वहां के नागरिकों का स्व प्रमाणन ही मान्य होता है. उन्हें सच कहने के लिए ‘कसम’ नहीं खानी पड़ती है क्योंकि वह झूठ नहीं बोलते. वह जो कहते हैं वही करते हैं. यही कारण है कि वहां के नागरिकों को यहां के नागरिकों की तरह अपने सेवकों यानि पब्लिक सर्वेंट (अधिकारियों) के सामने ‘याचक’ की तरह नहीं खड़ा होना पड़ता है.

हम राजनीतिक दलों के नेताओं और अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों पर इस बात के लिए सवाल उठाते हैं कि उनकी कथनी-करनी में अंतर है. हमारे नेता वायदाखिलाफी करते हैं और झूठ बोलते हैं. इन सवालों को उठाते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि वो नेता भी तो उसी मक्कार समाज से आए हैं, जिसमें लगातार झूठ बोला जाता है. जहां नैतिकता की दुहाई देकर अनैतिकता का व्यवहार किया जाता है. हम जब सच की राह चलेंगे, तभी तो दूसरे पर ऊंगली उठा सकेंगे मगर ऐसा ही नहीं हो रहा है. 
हम सभी को याद है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के तमाम विज्ञापन आ रहे थे. लोगों को यह समझाया और बताया जा रहा था कि पिछली सरकारों में वह ठगे गए हैं मगर अब उनके अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे. ईमानदार प्रशासन होगा. हर सुविधा लोगों के घरों तक पहुंचेगी. महंगाई-भ्रष्टाचार खत्म होगा और पारदर्शिता नजर आएगी. दुखद तो यह है कि जो कहा गया, पिछले 10 माह की सरकार में ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया. वही ‘लोक सेवक’ जो पहले अधिकारों का लुत्फ उठा रहे थे, अब उससे भी ज्यादा उठा रहे हैं. मितव्ययता और फिजूलखर्ची रोककर उसे विकास एवं जनकल्याण के कार्यों में लगाने की बातें व्यर्थ होती नजर आ रही हैं.

वीआईपी कल्चर खत्म करने की बातें हवा हवाई होती नजर आ रही हैं.ब्यूरोक्रेसी हमें अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाती है और कोई हमारी सुनने वाला नहीं है. यह दर्द है आमजन का, जो मुस्लिम आक्रांताओं की हुकूमत हो या राजपूताना अथवा अंग्रेजीराज सभी में ऐसे ही पीड़ित था और है. असल में वह झूठ नहीं बोलता बल्कि गाय-भैंस की तरह जो उसे अपने डंडे से हांक ले उसके साथ चल देता है. उसे सही गलत की परिभाषा का ज्ञान नहीं है. जिन्हें ज्ञान है वह ‘स्वहित’ की चिंता में झूठ बोलते हैं और छोटों पर चाबुक चलाते हैं जबकि बड़ों के आगे नतमस्तक होते हैं. जो उपदेश छोटों को देते हैं उसके बिल्कुल उलट बड़ों के सामने करते हैं. 

हम यह भूले नहीं हैं कि समाजवाद की बात करने वाले दलों ने अभिजात्यवाद को अपना लिया है. हम यह भी नहीं भूले हैं कि ईमानदार लोगों को सम्मानित करने और जिम्मेदारी वाले ओहदों पर बैठाने की बात करने वालों ने बेइमानों को गले लगा लिया है. हम हरियाणा का ही जिक्र करें तो पाते हैं कि छह माह पहले भाजपा नेता जिनको गलत बताते थे, सत्ता पाने के बाद उन्हीं फैसलों को सही ठहरा रहे हैं. कुर्सी पर बैठते ही जिनके खिलाफ एफआईआर की बात करते थे, अब उनको ही बचाते नजर आते हैं. जाति और धर्म के नाम पर आरक्षण को घातक बताने वाले अब उसी आरक्षण की पैरवी करते दिखाई देते हैं. यदि आपको याद हो तो यह बताने में हमें कोई गुरेज नहीं कि ‘किसानों’ के दर्द को बयां करने वाले नेता अब खुद किसानों को दर्द बांटने में लगे हैं.  हालात यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था के बजाय आमजन के हित की व्यवस्था स्थापित करने की बात करने वाले अब भूल चुके हैं कि उन्होंने क्या कहा था?

ईमानदारी से अपनी पगार की रोटी खाने वालों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं और अनुदानों को रोका जा रहा है जबकि बेइमानी और टैक्स चोरी करने वालों को सब कुछ मिल रहा है. एक नंबर और दो नंबर की कमाई के अंतर को मिटाने की बात करने वाले अब भूल चुके हैं कि ऐसी भी कोई बात हुई थी. एक सामान्य व्यक्ति अपनी आमदनी का पूरा ब्यौरा देकर तमाम तरह के टैक्सेस की मार भी झेल रहा है और सरकारी अनुदान भी खो रहा है जबकि अपनी 90 फीसदी आमदनी छिपाने वाला सब कुछ पा रहा है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? जब हम यह सवाल करते हैं तो सबसे पहले खुद पर निगाह जाती है मगर हमारे अंदर इतना साहस नहीं है कि हम सच बोल सकें, क्योंकि हम ‘मक्कारों’ के बीच रहते-रहते खुद मक्कार हो गए हैं.

नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और बातों पर देश के लोगों ने यकीन किया था क्योंकि उसे लगता था कि वह मक्कारों की इस दुनिया में कुछ अलग हैं. मोदी   कुछ ऐसा करेंगे कि चोर पकड़े जाएंगे और साहूकारों को सम्मान मिलेगा मगर अब तक इस दिशा में कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है. जो दिख रहा है वह सिर्फ बातें हैं, कभी मन की बात तो कभी आदर्श की बातें. हम अगर आंखें खोलें तो पाते हैं कि ‘हमाम में सभी नंगे’ हैं. राजनेता निज सुख सुविधाओं के लिए ब्यूरोक्रेट्स के आगे नतमस्तक हैं तो ब्यूरोक्रेट्स अपनी अय्याशी के लिए वह सब करते हैं जो वह चाहते हैं क्योंकि उनपर सवाल उठाने वाले तो पहले ही उनसे बेजा अनुदान ले चुके हैं. भाजपा का एक सांसद अफसरों से राजशाही वाली सुविधाएं लेता है तो देने वाले अफसर उससे दोगुना खुद ले लेते हैं। सुरक्षा के नाम पर अपने आगे-पीछे पुलिस कर्मियों की फौज ऐसे लगा ली जाती है कि मानो वह अपने देश और नागरिकों के बीच नहीं बल्कि दुश्मन देश और उसके नागरिकों के बीच हैं. अधिकारी अपने नंबर बनाने के लिए उसमें मानकों से चार गुना अधिक इजाफा कर देते हैं, जिससे वह जब ‘जन प्रतिनिधि’ के पास अपने हित साधने जाएं तो हक के साथ बोल सकें. इन सबका कारण सिर्फ एक है हमारी मक्कार प्रवृत्ति. 

‘हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा’. युगनिर्माण योजना का यह स्लोगन सच पर आधारित है. पहले तो जनता को यह दृढ़ निश्चय करना होगा कि वह कोई गलत काम नहीं करेगी और न ही अनैतिक काम में मददगार बनेगी, चाहे उसे इसके लिए किसी से भी लड़ना पड़े. जब यह असहयोग आंदोलन शुरू होगा तभी ब्यूरोक्रेसी भी सुधरेगी और हमारे राजनेता भी. हम न अनैतिक तरीके से खाएंगे और न खाने में मददगार होंगे, जब सभी इस दिशा में सोचेंगे तो कुछ देर भले ही कष्ट हो मगर इसके परिणाम सकारात्मक और सार्थक होंगे. इस सोच को बढ़ाने में अगर नरेंद्र मोदी मददगार बनें तो उन देशवासियों को अच्छा लगेगा जिन्होंने उन पर यकीन किया है. तभी लोक सेवक आमजन की सेवा करेगा न कि लूटेरा बनेगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

अजय शुक्ला ‘आज समाज’ के  ग्रुप एडिटर हैं.