यमन में जब चारों तरफ बमबारी हो रही थी, पूरा विश्व भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा था. अब भी वहां बमबारी जारी है. पर ऑपरेशन राहत ने कामयाबी की सर्वोच्च ऊंचाइयों को छूकर इतिहास रच दिया है. भारतीय सेनाओं ने अपने पराक्रम का जौहर दिखाते हुए युद्ध क्षेत्र से 4600 भारतीयों सहित करीब एक हजार विदेशी नागरिकों को वहां से निकालकर कर्तव्य की अद्भुत मिसाल पेश की है. इन सबके बीच एक शख्स भी उस भयानक युद्ध क्षेत्र में भारतीय वीर सपूत की तरह खड़ा रहा. जब तक बचाव दल ने अंतिम व्यक्ति को विमान में नहीं बैठाया, तब तक वह शख्स वहीं डटा रहा. नाम के आगे जनरल लगाने का गौरवप्राप्त करने वाला यह शख्स भले ही अब राजनेता बन गया है, पर इस जनरल रूपी राजनेता ने वह पराक्रम दिखाया है जिस पर पूरी दुनिया को नाज रहेगा.

जनरल (रि.) वीके सिंह शायद वह पहले शख्स बन गए हैं जो राजनेता की भूमिका में सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्र में रहे. न केवल अपने नेतृत्व में ऑपरेशन राहत को सफलता दिलाई, बल्कि नेताओं के लिए एक बड़ी मिसाल पेश की. यह जनरल वीके सिंह के ही नेतृत्व का परिणाम था कि 41 देशों ने भारत सरकार से संपर्क साधा. उन्होंने भारत सरकार से मदद मांगकर अपने नागरिकों को उस युद्ध क्षेत्र से निकालने की गुहार लगाई, जहां तक पहुंच पाना हर किसी के वश में नहीं है. भारत सरकार ने भी हर एक देश को मदद पहुंचाई जिन्होंने गुहार लगाई थी. पर इन सबके बीच जनरल वीके सिंह ने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसा भी लिख डाला, जिससे उन्हें आलोचना के दौर से भी गुजरना पड़ा.  

चुंकि जनरल की कड़वी बातें मीडिया इंडस्ट्री से जुड़ी थी, इसीलिए जिसे देखो वही जनरल की बुराई में जुट गया। हर किसी को एक ही शिकायत थी आखिर वे ऐसा कैसे कह सकते हैं? सवाल यह नहीं है कि जनरल क्या कह सकते हैं या उन्होंने क्या कहा? बल्कि मंथन तो इस बात पर होना चाहिए कि आखिर ऐसा कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी. सही तो किया उन्होंने कि मीडिया को उसका वह चेहरा दिखाया जिसे दिखाने की हिम्मत कोई नहीं करता. एक राजनेता के तौर पर जब वे पाकिस्तानी दूतावास में जाते हैं तो यही मीडिया तिल का ताड़ बनाता है. वही राजनेता जब युद्ध क्षेत्र में लगातार बरस रहे बमों के धमाकों के बीच राहत दिलाता है तो उसकी चर्चा भी नहीं होती. निंदा उन्हीं को अखरती है जो इस निंदा के पीछे रहते हैं. उन्हें कोई परवाह नहीं, जो अपना कर्तव्य बखूबी निभाना जानते हैं और लगातार निभा रहे हैं. 

ऑपरेशन राहत कोई छोटा मोटा अभियान नहीं था. यह एक ऐसा अभियान था जहां हर वक्त  मौत आपके सिर पर खड़ी रहती. ऐसे में एक राजनेता के रूप में युद्ध क्षेत्र में साहस के साथ जुटे रहना किसी पराक्रम से कम नहीं है. शायद यह खबर मीडिया के लिए उतनी सनसनीखेज नहीं थी जितनी पाकिस्तानी दूतावास में किसी भारतीय राजनेता का जाना. यही कारण था कि आपॅरेशन राहत प्राइम टाइम में हमेशा मिसिंग ही रही. ऐसे में अगर जनरल वीके सिंह ने अपनी बात को किसी एक खास मीडियाकर्मी के लिए कही तो क्या बुरा किया. मीडियाकर्मियों को भी इस बात को समझने की जरूरत है कि किसी एक शख्स पर की गई टिप्पणी किसी की निजी राय हो सकती है. वैसे भी काफी पहले कबीरदास ने लिखा था कि निंदक नियरे राखिए, बिन पानी सब सुन… जब कोई व्यक्ति आपकी कमियों को बता रहा है तो उसे सार्थक रूप से लेने की जरूरत है, यह नहीं कि कुतर्क करने की. मीडिया हाउस कहीं न कहीं कॉरपोरेट जगत की चपेट में हैं.

सरकार के खिलाफ लिखने के लिए भी सौ बार सोचना पड़ता है. हर तरफ मीडिया मैनेजमेंट का दबाव है. बावजूद इसके कलम के सिपाही अपनी बातों को कहने में नहीं हिचक रहे हैं. सरकार को आइना दिखा रहे हैं. अच्छे कामों के अलावा बुरे कामों को भी जनता के सामने ला रहे हैं. ऐसे में चंद मीडियाकर्मी अगर अपने स्वार्थों के लिए इस पेशे को बदनाम कर रहे हैं, तो उन्हें भी एक्सपोज किया जाना जरूरी है. ऐसा तो नहीं है कि मीडिया में हैं तो आप भगवान हो गए. आपकी आलोचना नहीं की जा सकती. अगर आप किसी की आलोचना करते हैं तो आलोचना सहने की शक्ति भी होनी चाहिए. संवाद का अर्थ वैसी ही परिस्थिति में सार्थक हो सकता है जब बातें दोनों तरफ से हो. यह कहां का न्याय है कि आप लगातार आलोचना करते रहें और दूसरा पक्ष चुपचाप सुनता रहे. जनरल वीके सिंह ने यही तो किया. फिर इसमें इतनी हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है. नेताओं से और सरकार से हमेशा सवाल होते रहे हैं. होने भी चाहिए. ये सवाल खुलकर होने चाहिए. यह नहीं की स्क्रीप्टेड. मीडिया की सार्थकता भी इसी में हैं. जब जवाब मिले तो उसे भी वैसे ही जनता के सामने लाना चाहिए. मीडिया को अपनी ताकत पर मंथन करने की जरूरत है. चंद बेवकूफों की हरकतों पर जबर्दस्ती का बवाल काटने का यह दौर नहीं है. यह आत्ममंथन का दौर है. 

(लेखक ‘आज समाज’  अखबार के  एसोसिएट एडिटर हैं)