एक वक्त था कि हम कहते थे कि ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं.’ अब हम उस गर्व का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं. इसका कारण हिंदू धर्म में कोई विकृति आना नहीं बल्कि हिंदू धर्म के ठेकेदार बने घूम रहे लोगों का आचरण है. वास्तव में हिंदू धर्म नाम का तो कोई धर्म था ही नहीं. पहले प्राकृत धर्म और फिर वैदिक तथा सनातन धर्म के रूप में स्थापित हुए धर्म का मुस्लिम आक्रांताओं ने नामकरण ‘हिंदू धर्म’ किया था क्योंकि हिंदूकुशा पर्वत श्रेणियों के इस तरफ रहने वाले लोगों को उन्होंने हिंदू कहकर संबोधित किया और क्षेत्र को हिंदुस्तान. हमारे प्राकृत धर्म से लेकर सनातन धर्म तक जो अब हिंदू धर्म के नाम से पहचाना जा रहा है, में दी गई शिक्षाएं और व्यवस्थाएं नकारात्मक नहीं थीं. यह एकमात्र ऐसा धर्म है जो सभी को अपने में समाहित करने और हर किसी के हित के बारे में सोचने का पाठ पढ़ाता है. इस धर्म में किसी पर हमला करने की नहीं बल्कि सुधारात्मक बदलाव लाने की बात की जाती है.
 
सनातन धर्म में ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ को ही अपनाया जाता है. जो धर्म न गैर धर्म को मानने वालों के विरुद्ध हिंसात्मक होने को कहता है और न ही उनका अस्तित्व नष्ट करने की बात करता है. ऐसा सिखाने वाला ही हमारा हिंदू धर्म था. हम अतिथि को देवता और पड़ोसी को अपने भाई की दृष्टि से देखते हैं. हम किसी को जबरन हिंदू बनाने की संस्कृति का सृजन नहीं करते बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं. जो वैदिक ऋचाओं में विश्वास करे और उनके अनुसार आचरण करे वह भी हिंदू है और जो कुछ न करे वह भी हिंदू है. वह हिंदू कदापि नहीं है जो किसी दूसरे धर्म को मानने वाले पर हमला करे और बलात अपने नियम थोपने की कोशिश करे. हिंदू धर्म में मंदिरों में लाउडस्पीकर लगाने और मंत्रों के उच्चारण को तीव्र ध्वनि से प्रसारित करने का कोई प्रावधान नहीं है. अजान मस्जिदों में होती है तो वहां यह व्यवस्था होती थी. अब जिस तरह से मंदिरों में लाउडस्पीकर लगाकर ध्वनि प्रदूषण फैलाया जा रहा है उसे कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि हिंदू धर्म का उद्भव प्राकृत धर्म से हुआ है जो प्रकृति को संरक्षित करने का पाठ पढ़ाता है. सूर्य हमें ऊर्जा देता है तो हम उसे पूजते हैं. वृक्ष, नदियां और पहाड़ हमें जल, वायु और जीवन प्रदान करते हैं तो हम उन्हें पूजते हैं. आकाश, पृथ्वी हमें आधार प्रदान करते हैं तो हम उन्हें पूजते हैं. शांति हमारे मन और मानवता को संरक्षित करती है, इसलिए हम उसे अंगीकृत करते हैं, मगर शोर मचाना हिंदू धर्म का तो हिस्सा कभी नहीं था क्योंकि हमारा हिंदू धर्म हमें कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है. हमारे धर्म में तो चौकीदार यानी द्वारपाल की पूजा का भी प्रावधान है, क्योंकि वह हमारी रक्षा करता है. ऐसे महान धर्म के पोषकों ने कब मंदिरों में लाउडस्पीकर लगाने शुरू कर दिए और क्यों इसका कोई जवाब किसी के पास नहीं है. इन लाउडस्पीकरों के जरिए असल में कुछ लोगों के हितों को साधा जाता है. कुकुरमुत्तों की तरह उगे कथित मंदिर असल में कुछ लोगों की कमाई का जरिए बन गए हैं. मंदिरों में धार्मिक कृत्यों से ज्यादा दूसरे धंधे हो रहे हैं जो हिंदू धर्म की मूल भावना के पोषक नहीं बल्कि भक्षक बन गए हैं. हम गर्व करते थे कि हम हिंदू हैं मगर अब हमें यह कहते वक्त हिचक होती है, क्योंकि हमारे धर्म ने तो हमें कभी यह नहीं सिखाया. हमें तब और भी तकलीफ होती है जब हम पाते हैं कि वह लोग धर्म विस्तार और उसके पोषण की बात करते हैं जो खुद कभी न तो वेदों का पाठ करते हैं और न ही उन्हें उनका ज्ञान है. न वह धर्म के उन ग्रंथों के बारे में जानते हैं जो वेदांग हैं. इसका नतीजा यह हो रहा है कि ऐसे लोग हिंदू धर्म को बढ़ाने के बजाय उसकी जड़ें काट रहे हैं. 
 
यूपी के दादरी में एक मंदिर से लाउडस्पीकर पर यह ‘अजान’ होती है कि फलां घर में गोमांस खाया जा रहा है. भेड़ोें की तरह बगैर सत्य जाने लोग असुरी प्रवृत्ति का शिकार हो जाते हैं. हमें समझ नहीं आता कि हमारा धर्म किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करने का पाठ कहां पढ़ाता है. हमारे धर्म में तो यह कहीं नहीं लिखा है कि दूसरे धर्म को मानने वालों से जबरन अपने धर्म में पूज्य बातों को मनवाया जाए. हमारा धर्म शिक्षा देने वाले यानी विश्व गुरू का है न कि बलात क्रियान्वयन कराने वाला. इस अजान में कितनी सत्यता है यह आकलन किए बिना ही उन्मादी भीड़ ने एक बुजुर्ग को बेरहमी से मार डाला और उसके बच्चों-महिलाओं के साथ वह सब किया जो हमारे धर्म में निषेध है. आखिर यह किस धर्म की शिक्षा है. छत्रपति शिवाजी के सैनिकों ने जब मुस्लिम महिलाओं और बुजुर्गों को कैद किया था तो उन्होंने सभी को ससम्मान वापस भेजा था. हम यह बात क्यों भूल जाते हैं. हिंदू धर्म की रक्षा आक्रामक और हिंसक होने से नहीं होगी बल्कि उसके अनुसार आचरण करने से होगी. हमारा धर्म शरणागत को संरक्षण देना सिखाता है. हमारा धर्म अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना सिखाता है. हमारा धर्म सर्वजन के हितों का पाठ पढ़ाता है. हमारा धर्म सभी को अपने में समाहित करने की क्षमता होने का प्रमाण देता है. हमारा धर्म लकीर पीटने वाला नहीं बल्कि वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने वाला है जो हमें लोकहित में नित नए प्रयोग करना  सिखाता है. गऊ हमारे धर्म में पूज्य है तो उसे पूजिए और संरक्षित करने के लिए गौशालाओं का निर्माण कीजिए. आवारा घूमती गायें और खाने के लिए गंदगी में मुंह मारती गायें ऐसे उन्मादी हिंदुओं के मुंह पर तमाचा हैं जो गऊरक्षा की बात करते हैं. इससे बेहतर है कि उन गायों को काटकर किसी का पेट भरने का साधन बना दीजिए, क्योंकि हमारा धर्म ऋषि दधीचि का धर्म है जो यह सिखाता है कि अगर हमारे शरीर के अंगों से मानवता का हित होता है तो हम अपने सभी अंग जीते जी काटकर उन्हें भी दान कर देते हैं. 
 
हिंदू धर्म को त्याग और प्रेम के धर्म के प्रतीक रूप में देखा जाता है. यह धर्म सहिष्णुता और सहभागिता का पाठ पढ़ाता है. यह धर्म किसी के हक मारने का नहीं बल्कि दूसरे का हक दिलाने के लिए संघर्ष करने की शिक्षा देता है. यह धर्म सभी पशुओं, जीवों, महिलाओं और बुजुर्गों को सम्मान के साथ उनके प्रति दया भाव रखने की प्रेरणा देता है. हिंदू धर्म आने वाले का स्वागत करने और जाने वाले को सम्मानजनक विदाई देने की सीख देता है. यह अपने धर्म को लाउडस्पीकर पर चिल्लाकर बढ़ाने या रक्षा की बात नहीं करता, बल्कि वैदिक रीतियों के अनुसार आचरण करके जीवन जीने की प्रेरणा देता है. 
दूसरों की रक्षा और हितों के लिए अपने प्राणों तक की आहुति देने की सीख देने वाले इस धर्म में अगर ऐसे हिंसक, क्रूर और अमानवीय लोग होंगे तो हमें यह धर्म मंजूर नहीं है. हम तो अपने वास्तविक वैदिक-सनातन-प्राकृत धर्म को ही अपना धर्म मानते हैं न कि कुछ लोगों, वर्गों और समुदाय के हितों को साधने वाले हिंदू धर्म को अपना धर्म मानेंगे. ऐसे धर्म से तो बेहतर है कि कोई धर्म ही न हो. दूसरों की अच्छाइयों से सीखने और अपनी बुराइयों को नित त्यागने वाला ही हिंदू धर्म है न कि मानवता की हत्या करने वाला हिंदू धर्म है. अभी वक्त है धर्म के नाम को नहीं बल्कि धर्म की भावना और सीख को पहचानें. उन्मादी नहीं बल्कि सहिष्णु बनें और विश्वबंधु-विश्वगुरु की भूमिका में दिखें. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)