बिहार विधानसभा चुनाव सांप्रदायिक भावना और आर्थिक तर्क के बीच एक शक्तिशाली बहस बन गया है. हर कोई इस हकीकत से सहमत है कि यह चुनाव विकास के महत्वपूर्ण मुद्दे पर केंद्रित है. लेकिन यहां नीतीश ने व्यक्तिगत और आधार-समर्थन स्तरों पर परस्पर चरित्र हनन और स्पष्ट शब्दों में असंतोष की अभिव्यक्ति के इतिहास के साथ लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ आनन-फानन में एक बेमेल गठबंधन बनाया है जबकि भाजपा की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन स्पष्ट रूप से मजबूत आधार पर खड़ा है और मतदाताओं के बीच बिहार का कुशलतापूर्वक संचालन करने का विश्वास जागृत करता है. बिहार के विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘सब के लिए विकास’ के निरंतर दिए जाने वाले संदेश पर बिहार के मतदाताओं ने जोशीली और सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है.
 
‘बिहार पैकेज’ की घोषणा राज्य की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था क्योंकि इसने चुनाव में महत्वपूर्ण भिन्नताओं के रूप में जाति और समुदाय के पुराने और निरर्थक बुलबुले को फोड़ दिया. वैसे भी सड़कों की कोई जाति नहीं होती और बिजली का कोई धर्म नहीं होता. गरीबी का कोई रंग अथवा पंथ नहीं होता. गरीबों की सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई ‘जनधन योजना’ और ‘बीमा योजना’ जैसे राष्ट्रीय उपक्रम प्रत्यक्ष प्रभाव को और अधिक बढ़ाते हैं. बिहार का युवा वर्ग एक स्थिर और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार चाहता है. इसमें कुछ भी हैरान करने वाला नहीं है क्योंकि बिहार को अगर एक मजबूत व स्थिर सरकार न मिल पाई और हालात पहले जैसे ही रहे तो इसका सबसे बड़ा नुकसान युवा वर्ग को ही होगा, उनका जीवन दांव पर लगा है. उनका भविष्य राज्य की अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ा है. जिन युवाओं का जन्म 1990 और 1995 के बीच हुआ है, आगामी पांच वर्ष उनके भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यही वह समय है जब उनकी रोजगार की तलाश चरम पर होगी. अगर नरेंद्र मोदी उनका ध्रुवतारा हैं तो इसलिए क्योंकि वह उस भाषा में बात करते हैं जिसे बिहारी युवा सुनना चाहता है. यहां तक कि नरेंद्र मोदी के कटु आलोचकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बिहार के युवा मतदाता के बड़े वर्ग का नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकाव हुआ है. यहां युवाओं ने एक नया जनसांख्यिकीय बनाया है जिसका असर कुछ जनमत सर्वेक्षणों पर दिखाई देने लगा है. इसकी तुलना में लालू प्रसाद यादव आज भी वही भाषा बोलते हैं जिसका इस्तेमाल वह आज से 25 वर्ष पहले किया करते थे. वही पुराने थके हुए मुहावरे, चुटकुले और आदतें जो समय बीतने के साथ अब अस्वीकार्य हो चुकी हैं. उनका व्यंग्य बिना शक्कर की चाय जैसा नीरस है. इस चुनावी नाटक में एकमात्र हास्य भूमिका आभासी-उदारवादियों द्वारा निभाई जा रही है जो जाति और समुदाय की लुप्त होती प्रासंगिकता को पुनर्जीवित करने के लिए बेताब हैं. उनके पास नवीन विचारों के नाम पर कुछ भी नहीं है और केवल इसलिए कि नरेंद्र मोदी इन चुनावों को आर्थिक तर्क पर लड़ रहे हैं, वे चाहते हैं कि बिहार वहीं रहे जहां आज से दो दशक पहले था. ऐसा नहीं है कि पुराने मानक पूरी तरह से लुप्त हो गए हैं, लेकिन अब उनकी भूमिका निर्णायक नहीं रही. उनका बाजार सिकुड़ गया है. मुख्यधारा के प्रवाह की दिशा बदल चुकी है. 
 
लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को जिन मतदाताओं पर पूरा भरोसा था कि वे कभी भाजपा का रुख नहीं करेंगे, वही मतदाता अब इनसे विमुख होकर भाजपा की ओर रुख करने लगे हैं. अन्य शब्दों में कहें तो उनके पुराने मतदाताओं को अब नीतीश और लालू की नेतृत्व क्षमताओं पर भरोसा नहीं रहा और इसलिए वे इन दोनों नेताओं के स्थानापन्न की तलाश कर रहे हैं. कोई भी भ्रम-मिथ्या पर भरोसा नहीं करता. यहां तक कि नीतीश और लालू प्रसाद के लिए स्वैच्छिक प्रचार करने की घोषणा करने वाले आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को भी अहसास हो गया है कि उनके पास करने के लिए और भी कई महत्वपूर्ण काम हैं. जाहिर तौर पर, बिहार चुनावों पर मेरी राय को पक्षपातपूर्ण समझा जाएगा और एक राजनीतिक दल का सदस्य होने के नाते मैं वास्तव में पक्षपातपूर्ण रहा हूं. आपको कुछ नहीं करना, केवल बिहार की यात्रा कीजिए और मतदाताओं के व्यवहार में आए परिवर्तन को देखिए और अनुभव कीजिए. भारतीय लोकतंत्र शांत मतदाता के लिए लोकप्रिय है. लेकिन बिहार इस बार काफी मुखर है. चीखना-चिल्लाना बंद है क्योंकि इसकी आवश्यकता नहीं है. केवल क्रोध में अथवा उत्तेजना में ऊंचे स्वर सुनाई देते हैं अन्यथा जनता का मिजाज शांत है. जनता जानती है कि उसे क्या चाहिए और अपनी प्राथमिकताओं की अभिव्यक्ति के लिए वह मतदान शुरु होने की प्रतीक्षा कर रही है. राज्य की राजनीति का भविष्य युवाओं के हाथों में है. युवा अब राजनीतिक चालबाजियों से ऊब चुके हैं. उन्हें एक नया नेतृत्व और एक नया आशावान और बेहतर संभावनाओं से परिपूर्ण जीवन चाहिए.
 
 (यह लेखक के निजी विचार हैं.)