नई दिल्ली: तालियों की गड़गड़ाहट में अपना दुःख संजोए किन्नर की ज़िन्दगी भी उस सूखे पत्ते की तरह होती है, जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता. वो केवल किताबों के पन्ने को याद रखने के लिए किताबों के बीच रखा जाती हैं. इसी बीच का अंतर ये आज तक खोज रहे हैं की आखिर ये स्त्री हैं या पुरुष? 
 
किन्नर समाज, जो हमारे समाज के लिए रोज़ खुशियों की दुआ करता है ताकि उनका पेट भर सके, पर अफ़सोस लोगों के लिए दुआ करने वाले इसी किन्नर समाज को लोग या ये कहिए कि हमारा समाज घृणा और तंजिया तौर पर देखता है. उनसे दूरी बनाने की कोशिश करता है. जबकि हम ये भूल जाते हैं कि ये वही लोग हैं जो आपकी खुशियों में बेबाक होकर नाचते, गाते और दुआ देकर चले जाते हैं.
 
आइए अब उस किन्नर समाज की उस अंधेरी ज़िन्दगी पर नजर डालते हैं जो मायूसी की कलम से और घृणा के आंसू से धुंधली पड़ी हुई है. न इनका कोई भाई-बहन है, न कोई मां-बाप, ना ही कोई रिश्तेदार. हकीक़त तो यह है कि कोई इनके बारे में बात तक करना नही चाहता. जबकि ये रोज गले में ढोलक डाले अपनी जिन्दगी को खोजने निकलते हैं कि शायद नई सुबह के साथ इनकी ज़िन्दगी का भी नया आगाज हो.
 
कुछ किन्नर ऐसे भी हैं, जो अपने पेशे को छोड़ कर आत्म निर्भर होना चाहते हैं पर उन्हें हमारे समाज मे काम ही नहीं दिया जाता न तो मजदूरी का न ही किसी ऑफिस का. आम लोगों की बात छोड़िये सरकार भी इनके विकास के लिए कोई ठोस कदम नही उठा रही है.
 
इनके लिए दूसरी सबसे बड़ी समस्या है इलाज की. इलाज में देखा जाता है कि जब भी इस समुदाय के लोग डॉक्टर के पास जाते है तो वहां भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है. सबसे ज्यादा परेशानी उस वक़्त होती है जब इन्हें कोई सेक्स सम्बन्धी बीमारी होती है. उस वक़्त तो कोई भी इन्हें देखना तक पसंद नहीं करता तो फिर इलाज कैसे हो. फिर भी बेचारे किन्नर अपने दुःख को छुपाए आंसू पोछते हुए सिर्फ इतना कहते हैं कि इसमें इस समाज का कोई दोष नहीं. हमारा नसीब ऐसा ही है जब ईश्वर ने ही हमें ऐसा बनाया तो हम और किसी को कैसे दोष दे सकते हैं?
 
बात आती है शिक्षा की. किन्नर बच्चों को किसी स्कूल-कॉलेज में दाखिला नहीं दिया जाता और अगर मिल भी जाता हैं तो वहा पढ़ाई नहीं कर पाता. एक किन्नर ने बातचीत में बताया कि हैं कोई उसके साथ खेलना, बात करना तक पसंद नहीं करता जिसकी वजह से उसका मानसिक विकास भी पूरी तरह से नहीं हो पाता हैं. किन्नर ने यह भी कहा कि उम्र में बड़े हो गए लोगों तो बच्चों के साथ भेदभाव कर सकते हैं लेकिन साथ में पढ़ रहे बच्चों की मानसिकता में भी यह भर दिया जाता है कि इनसे दूर रहे.
 
किन्नरों का असल समस्या वेश्यावृति में बढ़ता कदम है जो आज के दौर में समाज के लिए अभिशाप है. जब इस मुद्दे पर किन्नरों से बात की गई तो रात मे रेड लाइट के पास खड़ी किन्नर ने बड़े ही दुःख और मासूमियत से जवाब दिया कि हम नहीं चाहते किसी को परेशान करना, हम नहीं चाहते खुद से अपना सम्मान बेचना पर हम करे भी तो क्या करें? हमें तो कुछ मिलता ही नहीं करने को. वेश्यावृति भी कोई शौक के लिए नहीं करतें, सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए रोज़ खुद की आंखों में गिरना पड़ता है.
 
अगर इस सभ्य समाज के लोगों को हमसे नफरत है तो उन्हें एक बात खुद सोचनी चाहिए कि हमें वैश्यावृति मे डालने वाले आपके ही समाज के लोग हैं. उन्हें खुद से नफरत करनी चाहिए क्योंकि जिंदा रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है और जब कुछ न मिला तो यही सही. अगर इस समाज को हमें काम देने की ताक़त नही है फिर किस मुह से हमे बुरा कह सकते हैं?
 
दिल्ली के सुल्तानपुरी में रहने वाली किन्नर नलिनी जिसने दसवीं तक पढ़ाई भी की है, लेकिन बाद में मजबूरी की वजह से पढ़ाई बीच में ही उन्हें छोड़नी पड़ी. उन्होंने हमें बताया कि वो अपनी ज़िन्दगी का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं. उनके पास रहने के लिए न कोई घर है और न ही करने के लिए कोई काम. इसलिए मजबूरी में उन्हें चंद पैसों के लिए लोगो के घर जाना पड़ता है साथ ही उन्हें ना जाने कितनी जिल्लत झेलनी पड़ती हैं. वो खुद काम करना चाहती हैं पर उसे कुछ करने नहीं दिया जाता जबकि लोग उन्हें हिंजड़ा और छक्का जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर बहुत तकलीफ पहुंचतें हैं.
 
ये बाते सिर्फ नलिनी की ही नही पूरे किन्नर समाज की है. अब कोई भी जिल्लत भरी ज़िन्दगी नही जीना चाहता क्योंकि उन्हें भी चाहत है सम्मान और अपनों के प्यार की.
 
दूसरी तरफ जब किन्नरों के बारे में समाज के कुछ लोगों से बात की गई तो उन्होंने कहा ‘’किन्नरों से लोग इसलिए दूर रहना चाहते हैं क्योंकि कहीं वो कोई बद्दुआ न दे दें. उनका रहन-सहन भी हम लोगों से बिलकुल अलग है. उनके चीखने और लड़ने से दूर रहना चाहते हैं. कब वो गुस्से में आकर अपने कपड़े उतार कर सड़क पर बैठ जाएं, कोई नहीं जानता. 
 
अगर एक मायने में देखा जाए तो आम नागरिक को किन्नरों से डर लगता है. इसलिए वो उनसे दूरी बनाए रखना चाहते हैं. जब दोनो पक्षों पर गौर किया जाए तो एक बात बड़ी आसानी से समझ आ जाती है कि आज का किन्नर समुदाय भी खुद को बदलना चाहता है पर उसे भी एक मौके की तलाश है.
 
सबसे पहले किन्नर समुदाय को शिक्षित बनाना जरूरी है क्योंकि समाज और किन्नरों के बीच की खाई को खत्म करने के लिए शिक्षा, प्रगतिशील सोच जैसे सेतू की जरूरत है. साथ ही किन्नरों के लिए सरकार को नवोदय विद्यालय की तर्ज पर हजारों विद्यालय खोलने की जरूरत है. क्योंकि हमारा संविधान उन्हें भी बराबरी का और पूर्ण शिक्षा हासिल करने का अधिकार देता है, जिससे वो पढ़ लिख कर अपनी जिंदगी सवार सकें और देश की तरक्की मे अपना योगदान दे सकें.
 
हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्किल डेवलपमेंट, मेक इन इंडिया कैंपेन जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की है, जिसमें भारत सरकार को किन्नर समुदाय के लिए विशेष ट्रेनिंग देकर उन्हें भी स्किल डेवलपमेंट और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जा सके.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)