नई दिल्ली: क्यूबा की क्रांति के महनायक चे ग्वेरा को दुनियां भर के पॉलटिकल साइंस और डिफेंस स्टडीज के स्टूडेंट्स सालों से पढ़ते आ रहे हैं. चे ग्वेरा के गौरिल्ला वॉरफेयर की आज भी चर्चा होती है. लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि चे ग्वेरा कभी भारत की यात्रा पर भी आए थे और पूरे दो हफ्ते के लिए. जिसमें से पांच दिन वो दिल्ली में रुके और बाकी दिन वो लखनऊ, कोलकाता जैसे कई शहरों में घूमने निकल गए, तमाम लोगों से मिले. पूरे दौरे के दौरान चे ग्वेरा की सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखी गाय में.
 
उनकी दिलचस्पी इस बात से भी पता चलती है कि वो जहां भी गाय देखते थे, उसके फोटो निकाल लेते थे. इतना ही नहीं जब व् भारत दौरे से वापस क्यूबा लौटे तो 12 अक्टूबर 1959 को उन्होंने क्यूबाई पत्रिका Verde Olivo (Green Olive) में भारत के बारे में एक लेख लिखा, जिसमें आधे से ज्यादा लेख में उन्होंने गाय के बारे में चर्चा की. इतना ही नहीं गाय के नाम पवित्र पशु की सबहैडिंग से अलग से लिखे. दरअसल वो गाय को लेकर हैरान थे, कि गाय को यहां इतनी महत्ता क्यों मिल रही है. 
 
गाय के गोबर से कंडे-उपले पाथते लोग और उपलों का ऊंचा ढेर उनके लिए हैरत भरा था। वो लिखते हैं मेरे लिए कैरोसीन की जगह गोबर के उपलों का इस्तेमाल अनोखा है. इसको खाद की जगह इस्तेमाल करना चाहिए. हालांकि उनके लेख से पता चलता है कि उनको भारत के लोगों की गाय के प्रति आस्था के बारे में पूरी जानकारी थी. वो बताते है कि कैसे उस वक्त भारत में 180 मिलियन गाएं इस वक्त में भारत हैं, अमेरिका से 100 मिलियन ज्यादा. 
 
ये हिंदू धर्म को गाय के पवित्र मानने की वजह ही है कि इसको कोई मांस के लिए मारता नहीं है. एक तरफ उन्होंने जहां ज्यादा गायों के लिए गाय को पवित्र मानने के तरीके की तारीफ भी कि तो दूसरी तरफ कोलकाता की सड़कों पर बैठी गायों के चलते कितना ट्रैफिक जाम और परेशानी होती है, उसके बारे में भी लिखा, इतना ही नहीं बीच ट्रैफिक में बैठी कई गायों का उन्होंने फोटो भी खींचा. आप चे ग्वारा के लेख के कुछ अंश यहां पढ़ सकते हैं—
 
‘’Years, however, went passing by and turned into centuries, and now, in the age of mechanical plough and liquid fuels, the sacred animal continues to be venerated with the same fervour, and it multiplies freely with hardly anyone committing the sacrilege of eating its meat. One hundred and eighty million cows is what India has, almost 100 million more than the United States, which is the second producer in the world, and Indian leaders apply themselves to the terrible problem of making a people, religious and obedient to cultural commandments, cease their veneration of the sacred animal.’’
 
क्यूबा की सत्ता संभालने के बाद फिदेल कास्त्रो ने बाकी देशों से रिश्ते मजबूत करने के लिए अपने सबसे भरोसेमंद चे ग्वेरा को 3 महीनों में 14 देशों की यात्रा पर भेजा। 30 जून 1959 की रात को जब दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर चे ग्वारा उतरे तो उसी खास अंदाज में थे मिलिट्री यूनीफॉर्म, लोंग बूट और हाथ में मांटोकार्लो का सिगार. उनके साथ 6 लोग थे, एक मैथमेटीशियन, एक इकोनोमिस्ट, एक विद्रोही आर्मी का लीडर, एक बॉडीगार्ड पार्डो ल्लाडा, एक रेडियो ब्रॉडकास्टर और एक पार्टी कार्यकर्ता. 
 
बाद में पार्डो और उनमें कुछ तनातनी हुई और वो वापस लौट गए. अशोका होटल उस वक्त बनकर तैयार ही हुआ था, चे ग्वेरा को उसी नए होटल में ले जाया गया. अगली सुबह चे ग्वेरा की मुलाकात पंडित नेहरू से हुई, नेहरू ने उनको एक खुखरी बतौर उपहार दी, जिसकी मूठ पर मां दुर्गा की तस्वीर बनी हुई थी. वो आज भी क्यूबा में चे ग्वेरा के स्मारक में रखी हुई है. चे ग्वेरा ने नेहरू को सिगार का डिब्बा उपहार में दिए, जिसे खास तौर से नेहरू के लिए फिदेल कास्त्रो ने भेजा था. चे ग्वेरा अगले पांच दिनों तक दिल्ली में कई मंत्रियों, राजदूतों, विशेषज्ञों से मुलाकात की और कई जगह वे घूमने भी गए. मिलने वालों में डिफेंस मिनिस्टर वीके कृष्णा मेनन, कॉमर्स मिनिस्टर नित्यानंद कानूनगो, फूड एंड एग्रीकल्चरल मिनिस्टर एपी जैन से मिले.
 
अशोका होटल मे ही ऑल इंडिया रेडियो की जर्नलिस्ट केपी भानुमति ने चे ग्वेरा का इंटरव्यू किया. भानुमति ने चे ग्वेरा से कहा, “You are said to be a communist but communist dogmas won’t be accepted by a multi-religious society.” तो चे ग्वेरा ने लम्बा जवाब दिया, “I would not call myself a communist. I was born as a Catholic. I am a socialist who believes in equality and freedom from the exploiting countries. I have seen hunger, so much suffering, stark poverty, sickness and unemployment right from my very young days in [Latin] America. It is happening in Cuba, Vietnam and Africa – the struggle for freedom starts from the hunger of the people.’’
 
उसके बाद चे ग्वेरा दिल्ली के पास पिलानी गांव एक स्कूल में गए, एक कॉपरेटिव सोसायटी भी देखी. गांव में लोगों ने चे को माला पहनाकर स्वागत किया. हालांकि चे ग्वेरा एक तरफ इतनी गरीबी और दूसरी तरफ बीच बीच में पड़ने वाली बड़ी फैक्ट्रीज को देखकर हैरान थे कि किसी के पास कुछ भी नहीं और किसी के पास बहुत कुछ हैं. वे ओखला इंडस्ट्रियल एस्टेट भी गए, जहा मैन्युफैक्चरिंग मशीनें देखी, कारखाने का दौरा किया. वो एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट और नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी भी गए। वहां उन्होंने मैटल डिटेक्टर मशीन को भी अपने सीने पर चैक करके देखे. इस दौरान वो लगातार नोट कर रहा थे कि क्यूबा भारत को क्या निर्यात कर सकता है और भारत से क्या सामान मंगा सकता है.
 
भारत से कोल, कॉटन, जूट, टेक्सटाइल गुड्स, खाने के तेल, चाय, फिल्म और ट्रेनर एयरक्राफ्ट आयात करने के बारे में लिखा तो क्यूबा से भारत को कॉपर, कोकोया और चीनी भेजने की बात कही. ऐसा लग रहा था कि इस यात्रा के दौरान कोई ना कोई चे ग्वेरा के साथ था, जो उनसे योगा के बारे में लगातार डिसकशन कर रहा था, इस बात का अंदाजा तब लगा जब चिली के दूतावास में चे ग्वारा ने शीर्षासन करके दिखाया. आज भी लोग इस घटना की दिलचस्पी से चर्ची करते हैं.
 
उसके बाद पांच जुलाई को चे ग्वारा ने दिल्ली से देश के बाकी शहरों की यात्रा शुरू की, खासकर कोलकाता में, जहां की सड़कों पर उन्होंने कई फोटो गायों के खींचे. भारत के बाद भी वो कई देशों की यात्रा करते हुए 8 सितम्बर को वापस क्यूबा लौटे थे. लेकिन इस बात से खुश थे कि भारत के लोग उन्हें ब्रदर कंट्री की तरह मान रहे थे, भारत के साइंटिस्ट और तकनीकी की भी उन्होंने चर्चा की. 
 
साथ ही सफाई भी दी कि भारत के लोगों की सोच अलग है, युद्ध उनकी आदत में नहीं है, उन्होंने शांति पूर्ण आंदोलनों से ही अंग्रेजों को निकाल बाहर किया, हालांकि अपनी सफाई भी दी कि क्यों उनके लिए जंग जरूरी थी. यहां से लौटने के बाद अगले साल ही क्यूबा में भारतीय मिशन बना दिया गया, जिससे रिश्तों की एक नई शुरूआत हुई. हालांकि सालों बाद भी लोग चौंक जाते हैं कि चे ग्वेरा कभी भारत भी आए थे.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)