नई दिल्ली: देश आजादी के 71 सालों का जश्न मना रहा है. बुधवार को आप अपने दोस्तों, रिश्तेदारों  को  स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं भरे संदेश भेजेंगे और जश्न मनाएंगे आजादी का. लेकिन एक मिनट के लिए रुकिए और जरा सोचिए कि क्या आप वाकेई आजाद हैं? क्या आप वैचारिक तौर पर स्वतंत्र हो पाए हैं?

आज का वक़्त ऐसा है कि जहां अगर आप कुछ निष्पक्ष होकर बोलते हैं या लिखते हैं तो आपको किसी एक पक्ष का पक्षधर बना दिया जाएगा क्योंकि ये वो दौर नहीं है, जब पत्रकार की उठी कलम से क्रांति खड़ी हो जाया करती थी. आज अगर कोई क्रांति लिखना भी चाहे तो उसे बिका हुआ साबित करने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता. मगर फिर भी लोगों ने लिखना बंद नहीं किया, बोलना भी बंद नहीं किया. हालांकि, वे सभी बांट दिए गए एक-एक गुट में. कोई देशभक्त बना तो कोई देशद्रोही और किसी को बना दिया गया सिर्फ भक्त.

आज के दौर में शायद देश की राजनीति की तरह पत्रकारिता का मतलब भी बदल गया है. आज़ादी के बाद राजनीतिक दल इसलिए आयें ताकि आजाद हिंदुस्तान का नेतृत्व कर सके. उन करोड़ों लोगों की समस्याओं का समाधान कर सकें, जो बरसों की गुलामी के बाद आज़ाद हुए थे. पर हुआ क्या, कोई हिन्दू का नेता, कोई मुसलामानों का, कोई दलितों का, कोई सवर्णों का नेता बन कर बैठ गया. आज राजनीति में देश के विकास से ज्यादा जातिवाद और सम्प्रदाय की बातें होने लगी हैं. कोई एक पक्ष का पक्षधर हो गया तो कोई दूसरों का मसीहा. दरअसल, मकसद तो बीच में ही ख़त्म हो गया. गरीब आज भी गरीब हैं. बच्चे आज भी मजदूरी करने पर मजबूर हैं, पर उनके काम करने पर रोक है.
 
आज की राजनीति से देश के बड़े सवाल गायब:
 
एक समय नारा दिया गया था कि ‘बाल मजदूरी बंद हो’ पर शायद किसी ने ये नहीं सोचा की एक बच्चा आखिर क्यों मजदूरी करने पर मजबूर हुआ? और अगर किसी बच्चे को खाना तक नसीब नहीं हुआ तो वो क्या करेगा? या तो वो भीख मांगेगा या फिर उसका बचपन उन अपराध की गलियों में घुस जाएगा. जहां से वापस सिर्फ उसकी लावारिश लाश ही आती है. मगर अफसोस कि आज देश की राजनीति से ये सवाल कहीं गायब से हो गये हैं. ये एक तमाचा हैं उन सभी नेताओं के गाल पर, जिन्होंने जाकर देश की जनता से वोट मांगे थे.
 
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मगर अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों आज हिंदुस्तान का एक तबका सडकों पर रहने को मजबूर है? दरअसल, इस बात को साबित करने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं हैं. देश की राजधानी दिल्ली में लोग सड़कों पर खाना बनाते हैं. आपने भी सोते हुए लोगों को देखा होगा. पर शायद आज की भाग-दौड़ में किसी के पास इतना वक़्त नहीं, जो ये जानें कि वो कहां से आये हैं और क्यों उनको अपने घर से ज्यादा सुकून इन महानगर की सड़कों पर सोने में आता है?
 
एक बड़ी आबादी सड़कों पर सोने को मजबूर: 
 
दरअसल, वे कोई शौक से यहां ऐसी जिंदगी जीने नहीं आते. इसकी वज़ह उनकी और उससे भी ज्यादा ज़रूरी अपने बच्चों और परिवार की भूख मिटाने की ज़िम्मेदारी निभाने की कोशिश होती है, जिसे वो बड़ी इमानदारी से निभाते हैं. उनमें से कई अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए नशे में डूबे एक रईस की बड़ी गाड़ियों के पहियों तले रौंद भी दिए जाते हैं. पर मौत सिर्फ उनकी नहीं होती जो रौंदे जाते हैं, मौत होती है पूरे परिवार की. मगर अफसोस कि ये दर्द कौन समझे? वैसे भी बात जब इन्साफ की आती है तो उसमें भी बची हुई ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती हैं और मिलती हैं सिर्फ तारीख.
 
मगर बड़ा सवाल है कि आखिर क्यों एक तबका आज भी सड़कों पर जीता है, मरता है? आखिर इसका जिम्मेदार कौन है. वो जिसने कुचला या फिर वो जो तरक्की के नाम पर खुद को देश का महाराज समझ बैठे हैं. मगर देश की राजनीति में ये भी सवाल नहीं हैं. दरअसल  देश के ठेकेदारों के मुंह पर ये दूसरा तमाचा है.
 
जवानों की बेकार जाती शहादत:
 
किसी महान व्यक्ति ने कहा है कि बाहर से देश की रक्षा सरहद पर तैनात जवान करते हैं और देश के भीतर किसान. यही वजह है कि लाल बहादुर शास्त्री ने जवानों और किसानों के दर्द को समझा और नारा दिया ‘जय जवान जय किसान’. तो क्या अब देश में कुर्बानी का ठेका सिर्फ जवानों और किसानों ने ले रखा है? वहां सरहद पर जवान शहीद होता है, सिर्फ उस आदेश के इंतज़ार में जिसमें उसे ये आदेश मिलता है कि उसे लड़ना है या नहीं. 
 
फिर उसके परिवार को मिला क्या, एक शहीद की निशानी, मुआवजा और उसकी चिता पर सलामी. कुछ दिन की उसके बहादुरी के किस्से जो धीरे-धीरे सुनाई देने भी बंद हो जाते हैं. बचती है सिर्फ उसकी विधवा पत्नी, रोते-बिलखते बच्चे और बूढ़े माँ-बाप के आँखों से छलकते आंसुओं की धार, जो शायद लोग देख तो सकते हैं, मगर उस दर्द को महसूस नहीं कर सकते.
 
कर्ज में डूब आत्महत्या करता किसान: 
 
इतना ही नहीं, दूसरी ओर खेतों में खून बहाता क़र्ज़ में डूबा वो किसान शहीद होता है, जिसके खून से सिंची फसलों को कौड़ी के भाव की कीमत नहीं मिलती. और गिद्ध रूपी बैंक साहूकार उसके शरीर की बोटियों को नीलाम कर अपना क़र्ज़ वसूलना चाहते हैं. और अंत में हार कर वो किसान घुट-घुट कर अपने परिवार के साथ खुद को उन्हीं खेतों में दफन कर लेता है, जिसे उसने अपने खून से सिंचा था. या फिर बिना किसी गुनाह के खुद को सजाए मौत सुना कर चूम लेता उस फ़ासी के फंदों को, जिसे गले लगाया था देश की आज़ादी के खातिर भगत सिंह, बिस्मिल, अशफाकुल्ला जैसे देश भक्तों ने. मगर अफसोस कि खेत में शहीद होने वाले किसानों की हालत तो सेना से भी बद्तर है कि उन्हें न तो उनके जैसा मुआवजा मिलता है और न ही मिलती हैं सलामी. उसे मिलती हैं तो सिर्फ कुर्की और नीलामी. सच कहूं तो देश के भाग्य विधाताओं के मुंह पर ये तीसरा तमाचा है.
 
गौरतलब है कि देश को आज़ाद हुए सत्तर साल बीतने को हैं और हम आज भी लड़ रहे हैं भुखमरी और गरीबी से. सवाल ये है कि हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी अभी भी गरीबी में गुजर-बसर कर रही है, उसके पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ नहीं होता फिर हम उनसे शिक्षित होने की उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं? लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते, अगर वो गरीब शिक्षित नहीं होंगे, तो फिर उन्हें काम या फिर नौकरी कैसे मिलेगी? यही वजहें हैं कि गरीबों को काम नहीं मिलता, पैसे नहीं होते, जिसके कारण वे भूखमरी का शिकार बनते जाते हैं. मगर ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम और हमारे नेता इन बुनियादी ज़रूरतों को छोड़, सांप्रदायिकता, जातिवाद, आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं.
 
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देशभक्त और देशद्रोही की उपाधि:
 
लेकिन सच कहूं तो आज मैं पत्रकारों की बात करने वाला था, मगर अफसोस कि देश में इतनी सारी समस्याएं हैं कि मैं उन पर बातें किये बिना आगे बढ़ ही नहीं सकता. आजकल देश का माहौल ऐसा है कि कुछ भी बोलने से डरता हूं, कहीं लोग मुझे भी औरों की तरह देशभक्त या देशद्रोही न कह दे. कहीं कोई मुझे भी भक्त, चमचा, दलाल, जैसे महान उपाधियों से सम्मानित ना कर दें. इसलिए लिखने से डरता हूँ. मगर ऐसी बहुत सी बातें हैं जो दिल को कचोटती हैं. यही वजह है कि मैं अपने आप को आज लिखने से नहीं रोक पाया. हालांकि, मैं किसी को भी इन सभी घटनाओं का कसूरवार नहीं मानता क्योंकि हम सभी भटके हुए हैं. मगर सवाल ये है कि आखिर हम अपने बुनियादी सवालों की बात नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?
 
आजादी के इंतजार में तरसती आंखें: 
 
ध्यान रहे बुधवार 15 अगस्त 2018 को एक बार फिर से आजादी की मुनादी की जाएगी. देश अपनी आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ के जश्न मनाने में डूब जाएगा. उस दिन सब अपने किये गए थोड़े से कामों का गुणगान ऐसे करेंगे, जैसे की उन्होंने देश पर कोई बड़ा एहसान कर दिया हो. मगर ये पहली बार ऐसा नहीं होगा. हमेशा से यही होता आ रहा है. लेकिन याद रहे आप सब भी उनके गुणगान को ध्यान से सुनियेगा, जब वापास आने लगें, तो उस कार्यक्रम के बाद जो लड्डू और जलेबी मिलेंगे उसे थोड़ा ज़रूर बचा लीजियेगा, सड़क पर भीख मांगते लोगों के लिए, सडकों पर रहने वालों के लिए, मजदूरों के लिए, उन गरीब रेहडी वालों के लिए, दर्द से तड़पते अस्पताल के बाहर इलाज के इंतजार में मरीजों के लिए, बाज़ार में दुकानों के पास घूमते उन भूखे मासूम बच्चों के लिए, जिनके लिए लड्डू किसी छप्पन भोग से कम नहीं. 
 
इतना ही नहीं, अपनी गाड़ी से उतर कर इन लोगों के आंखों में आखें डाल कर इनके हाथों में 71वीं आज़ादी के जश्न का लड्डू रखकर सिर्फ एक बार कहियेगा Happy Independence Day, आपको खुद-ब-खुद एहसास हो जायेगा असल आज़ादी का मतलब. उस दिन आपको हकीकत से वास्ता होगा और आप भी कहेंगे- क्या हम सच में आजाद हैं?
 
( ये लेखक के निजी विचार हैं )