नई दिल्ली: वो 1925-26 का दौर था, सरदार भगत सिंह पर क्रांति का रंग पूरी तरह से चढ़ चुका था. वो नौजवान भारत सभा बना चुके थे और हिंदुस्तान सोशलिस्ट पार्टी के जरिए चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों से भी जुड़ चुके थे. उस दौर में भगत सिंह की जेब में एक फोटो रहती थी, जिसकी भगत सिंह पूजा करते थे. नौजवान भारत सभा की हर सभा से पहले उस फोटो पर पुष्प चढाए जाते और तब सभा शुरू होती थी. लेकिन वो किसी बाबा की फोटो नहीं थी, वो एक अठारह उन्नीस साल के नौजवान की फोटो थी, जिसे भगत सिंह अपना आदर्श, अपना गुरू मानते थे, नाम था करतार सिंह सराभा.
 
लुधियाना के पास सराभा गांव के रहने वाले करतार सिंह को अंग्रेंजों ने 19 साल की उम्र में ही फांसी दे दी थी. लाहौर कांस्पिरेसी ट्रायल के तहत जज ने सबसे खतरनाक करतार सिंह को ही बताया था, जज ने अपने फैसले में लिखा था, “He is very proud of the crimes committed by him. He does not deserve mercy and should be sentenced to death”. ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इतने खतरनाक थे करतार सिंह सराभा, जिसे भगत सिंह ने अपना गुरू माना. कोर्ट में ही जज तब निरुत्तर रह गए जब करतार सिंह ने अपना मैसेज पंजाबी में सुनाया था,
“Sewa desh di jinddhiye badhi aukhi
gallan karnia dher sukhalliyan ne,
jinha desh sewa ‘ch pair paya
ohna lakh museebtan jhalliyan ne.”
 
जज और सरकारी वकील जितना जिरह करतार से करते थे, उतना ही वो उनकी इंटलेक्चुअल क्षमता से लाजवाब हो जाते थे. केवल 19 साल को वो नौजवान जितनी अच्छी अंग्रेजी बोलता था, उतना ही देश के लिए अपनी लड़ाई के पीछे लाजवाब करने वाले तर्क देता था. जब फांसी की सजा का ऐलान हो गया तो एक दिन जेल में करतार के दादाजी मिलने आए, बोले बेटा, मिलने वाले रिश्तेदार तुझे बेवकूफ बता रहे हैं. ऐसा करने की तुझे जरूरत क्या थी? आखिर क्या कमी थी तेरे पास? तब करतार ने जवाब दिया, ‘उनमें कोई हैजे से मर जाएगा, कोई मलेरिया से तो कोई प्लेग से, मुझे ये मौत देश की खातिर मिलेगी, इतने नसीब उनके कहां है”. दादाजी चुपचाप चले आए.
 
पिता की मौत के बाद करतार को दादा ने ही पाला पोसा था, जवान बेटे की मौत के बाद ढंग से जवानी ना देख पाया पोता भी मरने जा रहा था, देश की खातिर. जबकि करतार के दादा काफी सम्पन्न थे, उनके घर में कोई कमी नहीं थी. करतार को अमेरिका पढ़ने भेजा था, जब तक वो भारत में था, उसे पता ही नहीं चला कि गुलामी क्या होती है. उसे पता तो तब चला जब जहाज से अमेरिका की सरजमीं पर उतरा तो बाकी सबको आसानी से जाने दिया गया लेकिन उससे काफी पूछताछ हुई, ढंगे से तलाशी हुई, बुरी तरह से व्यवहार किया गया. तो उसने किसी से पूछा कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब मिला कि तुम इंडिया से आए हो, जो एक गुलाम देश है.
 
जनवरी 1912 की घटना थी, केवल 15 साल के थे करतार सिंह, परिवार ने कैमिस्ट्री की पढ़ाई करने के लिए यूनीवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया बर्कले में भेजा था और उनके साथ ये वाकया अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को तट पर हुआ था. इस एक वाकये ने अमेरिका पढ़ने आए करतार सिंह की सोच को, जिंदगी की दशा को, जीने के उद्देश्य को पूरी तरह से बदल दिया. एडमीशन लेने के बाद वो बाकी भारतीयों से गुलामी से मुक्ति और अमेरिका में रहकर देश के लिए कुछ करने की बातें करने लगें. उस वक्त बर्कले यूनीवर्सिटी में नालंदा क्लब ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स एक अच्छा प्लेटफॉर्म था, जिससे करतार सिंह जुड़ गए. देश गुलाम है, उसको आजाद करवाना है, उसकी चिंता और मनन उस क्लब में होने लगा था. उसी वक्त पुणे के विष्णु गणेश पिंगले से भी उनकी दोस्ती हुई, जो बिना घर वालों को बताए अमेरिका से मैकेनकिल इंजीनियरिंग करने आया था और पहले वीर सावरकर के साथ आंदोलन में जुड़ा रह चुका था.
 
उस वक्त नॉर्थ अमेरिका में अलग अलग विचारों के भारतीय जमा हो रहे थे, कोई सोशलिस्ट था, कोई स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित था, कोई मार्क्स का अनुयायी था, कोई वीर सावरकर का फॉलोअर था, ज्यादातर पंजाबी थे. लेकिन सबका मकसद एक था, अमेरिका में रहकर भारत को आजाद किया जाए. कई छोटे छोटे संगठन पहले से काम कर रहे थे, श्याम जी कृष्ण वर्मा, भीखाजी कामा, तारक नाथ दास, बरकतुल्लाह, सोहन सिंह भाखना, बाबा ज्वाला सिंह सब जुड़ते चले गए. फिर लाला हरदयाल आए, और 1913 में शुरूआत हुई गदर पार्टी की, एक ही उद्देश्य था 1857 की तरह का गदर करके देश को आजाद करने का.
 
 फिर एक अखबार शुरू किया गया ‘गदर’, जिसके मस्ट हैड पर लिखा होता था, ‘अंग्रेजी राज के दुश्मन’. कई भाषाओं में इसे शुरू किया गया, गुरुमुखी एडीशन की जिम्मेदारी इस कम उम्र में भी करतार सिंह के जिम्मे आई. करतार सिंह सराभा ने पहले इश्यू में लिखा, “Today there begins ‘Ghadar’ in foreign lands, but in our country’s tongue, a war against the British Raj. What is our name? Ghadar. What is our work? Ghadar. Where will be the Revolution? In India. The time will soon come when rifles and blood will take the place of pens and ink.” . कई भाषाओं में ये छपने लगा, दुनियां भर में मौजूद भारतीय क्रातिंकारियों के बीच ये पेपर पहुंचने लगा. इधर कामागाटामारू कांड के बाद गदर पार्टी के बहुत से नेता भूमिगत हो गए. लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के इस मौके को कोई चूकना नहीं चाहता था, उनको पता था कि अंग्रेज इस समय युद्ध में व्यस्त हैं और यही मौका है उनको परास्त करने का. देश भर की कई छावनियों में 1857 की तरह विद्रोह करने की योजना बनाई गई. इधर अमेरिकी में भी जहां जहां भारतीय थे, उनसे मदद मांगने के लिए कई मीटिंग्स की गईं. ऐसी ही एक मीटिंग 31 अक्टूबर 1913 को कैलीफोर्निया के एक शहर में हुई. जोश के मारे आजादी के दीवाने करतार सिंह मंच पर चढ़कर गाने लगे, ‘चलो चलिए देश नूं युद्धा करें, एहो आखिरी वचन ते फरमान हो गए.‘ यानी आजादी की लड़ाई का आखिरी फरमान आ गया है, हमें चलना है.
 
तय हुआ कि बीह हजार सिख सैनिक गदर करने अमेरिका से भारत जाएंगे, लेकिन उससे एक महीने पहले करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले पहले ही कोलम्बो के रास्ते भारत आ गए. उससे पहले ही 5 अगस्त 1914 के गदर एडीशन में ब्रिटेन के खिलाफ ‘डिसीजन ऑफ डिक्लेरेशन ऑफ वॉर’ का ऐलान कर दिया गया, दुनियां भर में जहां जहां भारतीय सैनिक तैनात थे, उन सभी छावनियों में उस पेपर की कॉपीज पहुंचा दी गईं. इधर करतार सिंह कोलकाता पहुंचे. बंगाल में उनकी मुलाकातें बाघा जतिन से हुईं. बाघा जतिन का पत्र लेकर वो बनारस में रास बिहारी बोस से मिले. उस वक्त के ये कद्दावर क्रांतिकारी इस युवा के जोश को देखकर दंग थे. गदर की तारीख फरवरी में तय कर दी गई. जब तक करतार सिंह सराभा ने लुधियाना में अपने गांव सराभा को युगातंर आश्रम में तब्दील करने की ठान ली. भाई परमानंद दो महीने बाद दिसंबर 1914 में आए. इधर पिंगले के साथ करतार सिंह आगरा, बनारस, मेरठ, इलाहाबाद, अम्बाला, लाहौर और रावलपिंडी की छावनियों की खाक छानने में जुट गए, बंगाल के मशहूर क्रांतिकारी सचिन सान्याल ने भी उनकी काफी मदद की. हर जगह विद्रोह करवाने के लिए शुरूआती घुसपैठ कर ली गई, लुधियाना के ही दो अलग अलग गावों में बम बनाने की फैक्ट्रियां लगा दी गईं. 
 
रास बिहारी बोस 25 जनवरी 1915 को अमृतसर आए, सारे क्रांतिकारियों के साथ कई मीटिंगें रखी गई, तैयारियों को परखा गया. कौन कौन किस छावनी के विद्रोह की कमान संभालेगा ये तय किया गया. कितना हथियार है, कितने बम हैं, कितने सैनिक खुलकर अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा ले सकते हैं, सब तय किया गया, विचार किया गया और फिर 12 फरवरी को गदर की तारीख तय कर दी गई और वो तारीख थी 21 फरवरी 1915. 15 दिन रुकने के बाद रासबिहारी लाहौर कूच कर गए और वहां करीब 80 बमों का मैटीरियल जुटा लिया, साथ ही एक बंगाली क्रांतिकारी की सेवा गदर पार्टी को भी मिल गई बम बनाना सिखाने में. इधर जर्मनी से बाघा जतिन ने काफी हथियारों का इंतजाम किया था, जिसकी खेप आने वाली थी.
 
तय हुआ था कि सबसे पहले 23वी कैवलरी विद्रोह करेगी, उसके बाद 26वीं, लाहौर, आगरा, ढाका, फीरोजपुर, मेरठ एक पूरे चैन रिएक्शन का प्लान तैयार था, यहां तक कि बंगाल के क्रांतिकारी भी हावड़ा में पंजाब मेल पर अटैक का इंतजार कर रहे थे कि अचानक एक विद्रोही साथी बलवंत सिंह के अमेरिकी रिटर्न कजिन कृपाल सिंह ने गद्दारी कर दी. उसको पूरे षडयंत्र का पता चल चुका था, उसने अंग्रेजों को बता दिया और देश का सबसे बड़ा प्लान फेल होने के कगार पर आ गया. कृपाल सिंह 15 फरवरी को रास बिहारी बोस का लाहौर हैडक्वार्टर और सारे नेताओं को देख चुका था. पंजाब सीआईडी को खबर लग चुकी थी. एक एक करके 26वी पंजाब रेजीमेंट, 7वीं राजपूत रेजीमेंट, 130वीं बलूच रेजीमेंट, 24वीं जाट आर्टिलरी के साथ साथ फीरोजपुर, आगरा और लाहौर के विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया गया और विद्रोह दबा दिया गया. उस वक्त मेरठ की छावनी में विद्रोह करवाने की जिम्मेदारी करतार सिंह और विष्णु गणेश पिंगले के सर पर थी और 12वी कैवलरी रेजीमेंट उनके निशाने पर थी, लेकिन गद्दार कृपाल ने गदर की नींवें हिला दी थीं. विद्रोह नाकामयाब हो चुका था. करतार सिंह को लाहौर भागना पड़ा. रास बिहारी बोस भी निकल गए, बाद में उनके साथियों ने उनको सुरक्षित जापान निकाल दिया. बाघा जतिन की जर्मनी से हथियार मंगाने की योजना भी डेविडे हेडली जैसे एक डबल एजेंट और चेक जासूस के चलते फेल हो गई थी.
 
करतार सिंह अपने तीन साथियों के साथ बनारस की और निकले, गदर नेताओं ने उनको अफगानिस्तान जाने की सलाह दी. जहां हाथरस के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह बरकतुल्लाह के साथ मिलकर भारत की पहली अनिर्वासित सरकार बनाने का ऐलान कर चुके थे. कई गदर क्रांतिकारी थाइलैंड की तरफ निकल गए. करतार सिंह भी अफगानिस्तान जाने का मूड बना चुके थे. इधर विष्णु गणेश पिंगले के पास से पुलिस को वैसे दस बम बरामद हुए जैसा बम लॉर्ड हॉर्डिंग पर दिल्ली में घुसते वक्त रास बिहारी बोस और विश्वास ने फेंका था, मुंबई पुलिक की रिपोर्ट में इसका उल्लेख है. अचानक से ऐसा माहौल बन गया था कि गदर योजना फेल होने का नुकसान उन लोगों को होगा, जो उसमें छोटे तौर पर शामिल थे और बड़े नेता बच कर निकल जाएंगे, इससे गलत मैसेज जाने का डर था.
 
करतार सिंह ने वो किया जो एक वीर की आत्मा ने कहा, बचकर भागने का सुझाव उन्होंने नामंजूर कर दिया. वो अपने दो साथियों हरनाम सिंह टुंडीलत और जगत सिंह के साथ रास्ते से वापस लौटे और जंग जारी रखने का ऐलान किया और सालों बाद उनके शिष्य भगत सिंह ने भी असेम्बली में बम फोड़ने के बाद भागने से इनकार कर दिया था. लायलपुर की चक नंबर 5 में उन्होंने विद्रोह करवाने की कोशिश की और गिरफ्तार हो गए. वो चाहते तो बाकी नेताओं की तरह निकल सकते थे, लेकिन इससे गदर का नाम बदनाम होता और वो ये नहीं चाहते थे.
 
फिर चला लाहौर षडयंत्र केस के नाम से ट्रायल, जिस तरह भगत सिंह का ट्रायल चला था और लाखों देशवाली भगत सिंह की बातें सुनकर, अखबारों में पढ़कर आंदोलित होते थे, प्रेरणा लेते थे, उनके गुरू के ट्रायल की खबरों से खुद भगत सिंह भी हो चले थे. भगत सिंह और ऊधम सिंह जैसे ना जाने कितने नौजवानों ने देश की आजादी की राह में अगर हंसते हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी तो उसके पीछे इन गदर नेताओं खासकर करतार सिंह सराभा जैसे वीर क्रांतिकारी थे. मशहूर उपन्यासकार नानक सिंह ने उनकी जिंदगी पर एक किताब लिखी, एक म्यान दो तलवारां. करतार सिंह, विष्णु गणेश पिंगले, भाई परमानंद जैसे कई क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई, कई क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा देकर अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया गया. एक बार भारत में1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की तरह ये दूसरा स्वतंत्रता संग्राम भी दबा दिया गया, पंजाब की ही धरती के एक गद्दार कृपाल के चलते करतार जैसे वीर मन में आजादी का सपना लेकर फांसी पर झूल गए, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए दिल में धधकती लौ के साथ भगत सिंह जैसे कई वीर क्रांतिकारी.