नई दिल्ली: एक पाकिस्तानी ने पाकिस्तान के एक अखबर नेशन में लिखे एक लेख में गामा पहलवान के नाती को भारत में जिस तरह का सम्मान मिला और पाकिस्तान में यूथ जिसे जानते तक नहीं, इस बात को लेकर चिंता जताई है. ये लेख लाहौर में पैदा हुए और इंग्लैंड में रह रहे त्वचा विशेषज्ञ डा. आमिर बट्ट ने लिखा है, जो इतिहास में काफी रुचि रखते हैं. उनकी चिंता इस बात से भी थी कि आज उस गामा पहलवान को जिसने पूरी दुनियां में कुश्ती के तमाम मैडल्स जीते और एक कुश्ती भी हारा नहीं, नवाज शरीफ की बेगम का ग्रांड फादर होने के वाबजूद उसे पाकिस्तान के यूथ नहीं पहचानते.

डा. बट्ट ने अपने लेख की शुरूआत इसी बात से की है कि कैसे महाराष्ट्र के कोल्हापुर में कुछ साल पहले जब गामा पहलवान का नाती कुछ अन्य पहलवानों के साथ लाहौर से किसी कुश्ती दंगल में भाग लेने पहुंचा तो पूरे इलाके में चर्चा हो गई कि गामा पहलवान का नाती आया है. बट्ट लिखते हैं कि आस पास के जिलों के करीब 2 लाख गांव वाले उसकी कुश्ती के उस भगवान की एक झलक पाने के लिए 14 घंटे पानी में भीगते रहे. उनके मुताबिक भारत मे इतना सम्मान तो क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को भी नहीं मिलता.

क्यों मिला ये सम्मान? वो भी पाकिस्तान के एक पहलवान को? उसकी भी खास वजह थी, कई पीढियां गामा पहलवान का बस नाम सुनते ही बढ़ी हुई हैं. भारत-पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों में कुश्ती ही मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन है, ऐसे में गामा पहलवान और दारा सिंह का नाम बच्चे बच्चे की जुबान पर रहता है. अमृतसर के एक कश्मीरी परिवार में पैदा हुए गामा पहलवान की लम्बाई तो सुल्तान के सलमान खान जितनी ही थी यानी पांच फुट सात इंच, लेकिन ताकत ऐसी थी कि लोग अचम्भा करते थे. पचास साल के अपने कुश्ती कैरियर में गामा पहलवान एक कुश्ती कभी नहीं हारा, आजादी से पहले ही वो कई बार रुस्तम ए हिंद (यानी इंडिया चैम्पियन) और रुस्तम ए जहां (यानी वर्ल्ड चैम्पियन) जैसे खिताब अपने नाम कर चुका था.

गामा पहलवान का असली नाम गुलाम मोहम्मद था, लोग उसे ग्रेट गामा के नाम से जानने लगे थे. उसकी डाइट को लेकर लोगों के बीच चर्चा होती थी, वो एक बार में तीन तीन हजार दंड (पुश अप) और पांच पांच हजार बैठक (सिट अप) लगा देता था. आज के नौजवान से आप 100 ही लगवा कर देख लीजिए. यहां तक कि एक बार ब्रुशली तक ने उसकी तारीफ की थी. खास बात ये थी कि गामा पहलवान ने अपना डाइट चार्ट और फिजिकल ट्रेनिंग का शेड्यूल खुद ही तैयार किया था, ट्रेनिंग के नाम पर देश में उस वक्त देशी पहलवान ही होते थे.

वो दुनियां भर के अखबारों की सुर्खियों में तब आया था, जब उसने एक बार यूरोप और अमेरिका के 12 टॉप पहलवानों को एक ही दिन चैलेंज देकर बुलाया था और एक के बाद एक सभी पहलवानों को चित कर दिया था. जब देश आजाद हुआ, पाकिस्तान बना तो गामा ने पाकिस्तान को चुना और वो लाहौर की एक बस्ती में रहने लगा. चूंकि अमृतसर में उसका घर हिंदू परिवारों के बीच ही था, तो उसने लाहौर में अपने घर के आसपास के हिंदू परिवारों को आश्वस्त कर दिया था कि बंटवारे के बीच फैलती नफरत की आग अगर इस बस्ती की तरफ आई तो वो खुद उनकी रक्षा करेगा. एक दिन ऐसा हुआ भी एक मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ उस बस्ती में आ भी पहुंची, इससे पहले कि वो हिंदू परिवारों पर हमला करती, डा, आमिर बट के मुताबिक गामा खुद उनके सामने अपने पहलवान साथियों के साथ खड़ा हो गया. भीड़ के एक नेता ने गामा को धक्का दिया तो गामा ने उसे अपने एक घूंसे में चारों खाने चित कर दिया था, उसका हश्र देखकर भीड़ भाग गई.

उसके बाद जो हिंदू परिवार वहां से भारत जाना चाहते थे, डा. बट के इस लेख के मुताबिक गामा ने अपने खर्च से उनका एक हफ्ते के राशन का इंतजाम किया और वहां से सुरक्षित निकाल दिया. डा. बट लिखते हैं गामा के अंतिम दिन काफी परेशानियों में गुजरे, काफी पैसे की कमी रही. आज भारत के लोग उसके नाती के सम्मान में भी 14 घंटे बारिश में खड़े होकर इंतजार करते हैं और दूसरी तरफ पाकिस्तान के युवा हैं, जो उसे पहचानते भी नहीं. डा. बट के मुताबिक नवाज शरीफ की बीवी कलसुम शरीफ गामा पहलवान की ही नातिन हैं.

आप डा. आमिर बट के मूल लेख को इस न्यूज लिंक पर पढ़ सकते हैं—

http://nation.com.pk/blogs/08-May-2017/gama-pehalvan-the-man-who-singlehandedly-shielded-hindus-of-his-mohala-against-a-religiously-charged-mob-in-1947