नई दिल्ली: बढ़ी हुई दाढ़ी में आप इस लेख के साथ जो रेखाचित्र देख रहे हैं, वो अजीमुल्लाह खान का है, लेकिन ये आज की पीढ़ी के लिए खास इसलिए हो जाता है कि उस दौर में जब कैमरे नहीं थे, तब ये रेखा चित्रि जेम्स बॉन्ड के क्रिएटर आर्थर कानन डायल के अंकल रिचर्ड डायल ने तैयार किया था. ये उस व्यक्ति का रेखा चित्र है जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का सबसे सीक्रेट हैंड माना गया. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में झांसी की रानी, तात्या टोपे, नाना साहेब, कुंवर सिंह, मंगल पांडेय जैसे कई वीरों का नाम आता है, लेकिन किसने इन सबको एकजुट करने के बारे में सोचा, किसने क्रांति के तार पूरे देश भर में जोड़ने में अहम भूमिका निभाई या किसने ये अहसास कराया कि अंग्रेजों को हराया जा सकता है, उसको लेकर नई पीढ़ी के बीच कभी चर्चा नहीं होती.
 
कानपुर के पास पटकापुर में एक गरीब और मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे अजीमुल्लाह खान, पिता नजीब मिस्त्री को जब मामूली सी बात पर एक अंग्रेज अधिकारी ने छत से फेंक दिया तो अजीमुल्लाह के लिए ये अंग्रेजी जुल्म का पहला वाकया था. उसी वक्त पड़ा 1837 का बड़ा अकाल, अपनी मां के साथ उन्हें एक सरकारी कैम्प में सर छुपाने को जगह मिली. किसी ने उन्हें एक अच्छे दिल वाले अंग्रेज अधिकारी के यहां रखवा दिया. वो वाकई में नेकदिल बंदा था, उसने अपने बच्चों के साथ अजीमुल्लाह को भी एक अंग्रेजी स्कूल में पढाया, वहीं अजीमुल्लाह ने फ्रेंच और जर्मन भी सीख ली. देखते देखते अजीमुल्लाह कानपुर में अंग्रेजी अधिकारियों का चहेता बन गया, कई अंग्रेजों ने भारतीय समस्याओं को समझने के लिए उसे सचिव बनाया. अजीमुल्लाह ने केवल फ्रेंच और अंग्रेजी ही नहीं सीखी, मौलवी निसार अहमद से फारसी, उर्दू और पंडित गजानन मिश्र से हिंदी और संस्कृत भी सीखी. इतिहास पढ़ने में अजीमुल्लाह की खासी रुचि थी, शहर के अधिकारियों और विद्वानों के बीच अजीमुल्लाह की चर्चा होने लगी.
 
उसकी तारीफ सुनकर पेशवा खानदान के वंशज नाना साहेब, जो पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे, ने उनको अपना सचिव बना लिया. उस वक्त नाना साहेब को उनके राज से हटाकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया था, और वो पेंशन के सहारे जीवन काट रहे थे. लेकिन बाद में उनकी वो पेंशन भी रोक ली गई, सालाना 80,000 डॉलर की पेंशन थी वो. नाना साहेब ने अजीमुल्लाह को अपनी पेंशन बहाल करने की मांग बोर्ड ऑफ कंट्रोल में करने के लिए लंदन भेजा. ये वही वक्त था जब रानी लक्ष्मीबाई ने भी एक अंग्रेज वकील की सेवाएं इसी काम के लिए ली थीं, ताकि वो लंदन में उनका मुकदमा लड़ सके और माना जाता है कि वही वकील अकेला ऐसा विदेशी था, जिसने रानी को करीब से देखा और बाद में उनकी खूबसूरती के बारे में लिखा भी. इधर अजीमुल्लाह काफी नौजवान और आकर्षक युवा था, जब वो लंदन पहुंचा तो जो भी मिलता था उसे प्रिंस ही समझता था.
 
लंदन में अजीमुल्लाह की मदद लेडी डफ गार्डन लूसी ने की, जिनके पति सिविल सर्वेंट थे और ब्रिटिश प्रधानमंत्री उनका कजिन था. माना ये जाता है कि लूसी से अजीमुल्लाह का परिचय प्रख्यात फिलॉसफर जॉन स्टुअर्ट मिल ने करवाया था, जो ईस्ट इंडिया कंपनी का उस वक्त अधिकारी था और लूसी के बचपन का दोस्त. लूसी के जरिए अजीमुल्लाह की मुलाकातें लंदन के बड़े लोगों के साथ होने लगीं, ज्यादातर उनमें से महिलाएं थीं. नाना साहेब के काम के लिए अजीमुल्लाह ने महीनों तक कोशिशें की, लेकिन वो ब्रिटिश महिलाओं से रिश्तों के चलते भी चर्चा में रहे. शायत यही एक बड़ी वजह हो सकती है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लोग अजीमुल्लाह के नाम का जिक्र करने में थोड़ा हिचकिचाते रहे. जो भी हो, नाना साहब के लिए अजीमुल्लाह की सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं, और अस्सी हजार डॉलर की पेंशन लेने आए अजीमुल्लाह ने अपने राजा का करीब पचास हजार डॉलर खर्च कर दिया. कुल दो साल अजीमुल्लाह ने लंदन में काटे.
 
लंदन में ही अजीमुल्लाह की मुलाकात सतारा राज्य के प्रतिनिधि रंगोजी बापू गुप्ते से भी हुई. दोनों एक ही मकसद से आए थे और दोनों ही नाकामयाब हुए. पहले सतारा का और बाद में अजीमुल्लाह का भी दावा खारिज हो गया तो दोनों का दर्द भी मिल गया और दोनों जब लौटे तो एक जैसा विचार लेकर लौटे. माना ये भी जाता है कि इसी मुलाकात के जरिए दोनों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने का मन बना लिया था.
 
नाना साहेब के पैसे को पानी की तरह बहाने की वजह से अजीमुल्लाह को मन में खासी ग्लानि थी, अंग्रेजों ने जैसा बर्ताव उसके साथ किया, ये भी अजीमुल्लाह को चुभ गया. दूसरे लंदन में अजीमुल्लाह ने एक नई नजर से दुनियां को देखा, उसको लगा कि ये मुट्ठी भर लोग हम पर शासन कर रहे हैं. वैसे भी बचपन से अजीमुल्लाह मुगलों के राज के बारे में अपने पिता से सुनता आया था. अजीमुल्लाह लेने तो पेंशन आया था लेकिन लेकर क्रांति के बीज लेकर लौटा. अजीमुल्लाह रास्ते में तुर्की होकर गया, क्रीमिया के जंग के मैदान में भी गया, जहां उसने बुरी तरह हारकर अंग्रेज सैनिकों को लौटते देखा, उसको लगा अजेय समझे जाने वाले अंग्रेजों को हराना नामुमकिन नहीं, बस लड़ाई मिलकर लड़नी होगी. माना जाता है कि अजीमुल्लाह ने तुर्की और रुस के जासूसों से भी रिश्ते बनाए. इतना ही नहीं 1857 की क्रांति के लिए तुर्की के खलीफा और मिश्र के राजा से भी मदद मांगी, मिली या नहीं, इसका कहीं जिक्र नहीं मिलता है.
 
वो क्रांति का बीज एक विचार के तौर पर भारत लाया था, जिसे उसने नाना साहेब के मन में रोप दिया. उनको बाजीराव और शिवाजी की वीरता की याद दिलाई और ये भी कि मुगल बादशाह का राज फिर भी अंग्रेजों के विदेशी राज से लाख गुना बेहतर है, सबको जुटना होगा. अजीमुल्लाह अपने साथ एक फ्रेंच टाइपराइटर भी लेकर आया था. उसी टाइपराइटर के जरिए 1857 की क्रांति का साहित्य तैयार किया गया. मुगल बादशाह, तात्यां टोपे, रानी लक्ष्मीबाई जैसे राजाओं समेत तमाम सैनिक छावनियों में क्रांति का संदेश भेजा गया. मंगल पांडेय पहले ही बैरकपुर से क्रांति का बिगुल बजा चुके थे, क्रांति अधूरी थी, आग अब भी हर भारतीय सैनिक और राजाओं के अंदर सुलग रही थी. हर शहर में क्रांति के परवानों के बीच कमल और रोटी का संदेश पहुंचाया जा रहा था. हिंदुओं को शिवाजी और बाजीराव के नाम पर नाना साहेब की अगुवाई में और मुस्लिमों को मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नाम पर एक करने की कोशिश होने लगी. नाना साहेब और तात्यां टोपे का नाम आगे था, लेकिन अजीमुल्लाह का दिमाग पीछे से काम कर रहा था, वो अंग्रेजों की नस नस से वाकिफ था.
 
कानपुर में अंग्रेजों के दो बड़े नरसंहार हुए सती चौरा घाट और महिलाओं की रिहाइश बीवी घर में कत्लेआम. अंग्रेजों ने अजीमुल्लाह को उसका दोषी माना. दो सौ अंग्रेज महिलाओं और बच्चों की हत्या कर दी गई. जिसके लिए अजीमुल्लाह को दोषी माना गया, ये भी एक बड़ी वजह थी कि अजीमुल्लाह को इतिहास में सही जगह नहीं मिली. इधर 1857 की क्रांति जैसे होनी थी, वैसे नहीं हो पाई. उसके नाकामयाब होनी की कई वजहें थीं॰ लेकिन उसने अंग्रेजी सरकार की जड़ें हिला दीं. किसी ने उसे सैनिक विद्रोह माना तो किसी ने केवल राजाओं का अपना राज बचाने की कोशिश. लेकिन भारत की शासन व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए, कंपनी के हाथ से राज छीनकर ब्रिटेन की रानी ने अपने हाथ में ले लिया और 1858 में अपना दरबार भी लगाया.
 
इधर बहादुर शाह जफर को रंगून भेज दिया गया, रानी लक्ष्मीबाई मारी गईं, बेगम हजरत महल भी नाकामयाब रहीं, सतारा में भी कामयाबी नहीं मिली, कुंवर सिंह भी अपने किले पर दोबारा कब्जे के बाद घायल होकर स्वर्ग सिधार गए. कई लोग गद्दार निकल गए तो बहुत सारे लोग गिरफ्तार हो गए, तो कुछ को फांसी पर चढ़ा दिया गया. नाना साहेब और अजीमुल्लाह खां बचकर नेपाल निकल गए और बताया जाता है कि वहां अजीमुल्लाह की बुखार से मौत हो गई. जबकि किसी ने लिखा है कि वो एक ब्रिटिश लेडी के साथ बचकर देश से कहीं बाहर चले गए. अजीमुल्लाह खान को उसके चाहने वालों ने क्रांतिदूत की उपाधि दी. उस समय अजीमुल्लाह की उम्र केवल उनतालीस साल थी. बाद में 1857 की इसी क्रांति को सावरकर ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया, जबकि ज्यादातर लोग इसे सिपाही विद्रोह आदि कह रहे थे और हजारों लाखों क्रांतिकारियों ने इसी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेते हुए अपनी जिंदगियों की आहुति दे दीं, तब जाकर देश आजाद हुआ.
(यह लेखक के निजी विचार हैं)