हाल ही में चार केस ऐसे हुए हैं, जिनके बारे में कभी कभी चर्चा होती है लेकिन उन केसेज को आरएसएस या उससे जुड़े लोगों ने जिस आक्रामक मूड से फॉलो किया है, उससे लगता है कि अब आसानी से छोड़ने वाला नहीं संघ.  इन चार केसों में एक संघ के सबसे प्रतिष्ठित कार्यकर्ता यानी संघ प्रचारक की पिटाई का है, दो केस एक संघ कार्यकर्ता और एक पदाधिकारी की हत्या से जुड़े हैं और चौथा संघ के ऊपर एक बहुत बड़े इल्जाम का है, जो सीधे सीधे संघ की इमेज और आइडियोलॉजी पर हमला है. इन चारोंं ही केसों को ढीला छोड़ना या उनसे पीछे हटने का संघ का कोई इरादा नहीं है.

पहला मामला संघ के प्रचारक सुरेश यादव से जुड़ा है। संघ में प्रचारक स्तर के कार्य़कर्ता संगठन की रीढ़ है, जो घर परिवार को छोड़कर संघ के लिए पूरा जीवन दे देते हैं, मोदी, अटल बिहारी, भागवत आदि प्रचारक के तौर पर ही संघ के संगठन में आगे बढ़े. सुरेश यादव के साथ पुलिस के दो आला अफसरों में बदतमीजी की, वो भी उस मध्यप्रदेश पुलिस के अफसरों ने जहां बीजेपी की सरकार है. मामला सितम्बर 2016 का है, बालाघाट जिले के एएसपी राजेश शर्मा और बलिहारी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज (एसएचओ) जिया उल हक पर सुरेश यादव ने पुलिस कस्टडी में जमकर मारपीट का इलजाम लगाया. प्रचारक एक तरह से संघ की नाक होता है, फिर भी एमपी पुलिस उन्हें आज तक गिरफ्तार नहीं कर पाई, दोनों ही फरार हैं. 

लेकिन एमपी पुलिस ने दोनों के ऊपर अटैम्प्ट टू मर्डर का केस लगा दिया है. लेकिन फिर भी वो गिरफ्तारी ना होने से खुश नहीं, तो संघ कार्यकर्ता जबलपुर हाईकोर्ट चले गए. हाईकोर्ट ने सीधे बालाघाट के एसपी और सरकार के एडवोकेट जनरल को तलब किया.

हालांकि एसपी बालाघाट ने कोर्ट को बताया कि दोनों की गिरफ्तारी के लिए एक एसआईटी गठित कर दी गई थी, लेकिन कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा है कि अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई, अगले हफ्ते फिर सुनवाई है. दूसरा मामला बेंगलूरू का है और पिछले साल 16 अक्टूबर का है. जब संघ के एक पदाधिकारी आर रुद्रेश की दो मोटरसाइकिल सवार अपराधियों ने सुबह तड़के ही गोली मार कर हत्या कर दी थी. 

पुलिस ने रुद्रेश की हत्या के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार किया था. आप इस घटना से जोड़कर संघ की इस गम्भीरता को इस बात से समझ सकते हैं कि संघ के दवाब में होम मिनिस्ट्री को इस केस को एनआईए को सोंपना पड़ा. एनआईए ने सभी गिरफ्तार व्यक्तियों के खिलाफ चार्जशीट फाइल करने से पहले होम मिनिस्ट्री से इजाजत मांगी थी, जो आज से दो रोज पहले यानी 20 अप्रैल को होम मिनिस्ट्री ने एनआईए को दे दी है. चार्जशीट 27 अप्रैल तक फाइल होनी थी जो आज एनआईए ने फाइल कर दी. एनआईए नेे इस चार्जशीट में इस मर्डर को ‘एक्ट ऑफ टेरर’ बताया है. गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के नाम हैं मोहम्मद सादिक, मोहम्मद मुजीबुल्ला, वसीम अहमद और इरफान पाशा। इन चारों की गिरफ्तारी के बाद एक पीएफआई के लीडर को भी गिरफ्तार किया गया जिसका नाम था असीम शरीफ.

जिस तरह से रुद्रेश का केस एनआईए को सोंपा गया, पंजाब के वरिष्ठ नेता जगदीश गगनेजा की भी जब पिछले साल हमले के बाद मौत हो गई तो वो भी केस बाद में सीबीआई को सौंप दिया गया. संघ ये मैसेज देने को कतई तैयार नहीं है कि कोई भी आकर उनके कार्यकर्ताओं पर हमला करे और बचकर निकल जाए. ताजा मामले केरल के हैं, पिछली साल संघ के कई बडे नेता केरल में कार्य़कर्ताओं पर हमले के खिलाफ धरने पर बैठे थे, और इस साल भी लगातार इस मुद्दे को विभिन्न प्रदशर्नों के जरिए उठाने का प्रयास हो रहा है.

संध अपनी आइडियोजी पर उठने वाले सवालों का भी जबाल देने के मूड में है, इसी के चलते जब राहुल गांधी ने एक बयान दिया कि संघ के लोगों ने गांधीजी की हत्या की थी तो संघ ने इसे सीरियस ले लिया. मालूम हो कि गांधीजी की हत्या के बाद कुछ समय के लिए संघ पर बैन लगा था लेकिन बाद में कोर्ट ने क्लीन चिट दी और बैन भी सरकार ने उठा लिया था. जब राहुल का बयान आया तो भिवंडी के संघ कार्यकर्ता राजेश कुंटे ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी. राहुल गांधी को भी कोर्ट आना पड़ा, बयान वापस लेने की भी पहले बात की, लेकिन जब मीडिया में किरकिरी हुई तो राहुल फिर से जम गए. हालांकि संघ इस मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाला नहीं, आखिर नई पीढ़ी जो इतिहास के इस तथ्य से वाकिफ नहीं है, उसके बीच संघ की इमेज गांधी विरोधी की जा सकती है, इसलिए संघ इस केस को शिद्दत से लड़ रहा है. कहने का मतलब है कि संघ अब पंगा लेने वालों को आसानी से छोड़ने वालों में नहीं.